वो किसान अपने सपनो से कितनी दूर बैठा है
एक ने खाली फांसी दुसरा मजबूर बैठा है
…..
मेनहताने में चुलहे का तवा आज भी खाली है
लगता है कुरसी पर सरकारी हुजूर बैठा है
……
कोई वकिल इनके लिये भी कर दो साहेब
किसी की ज़मीन किसी का गहने सिन्दूर बैठा है
…..
मत भूल इन्ही से चलता है तेरा घर ढी
सत्ता के दलाल किस चीज का लिये गुरूर बैठा है
…….
शौक से सज जाते है मन्दिर ओर मसजीदे सारी
एक कच्चे मकान का दीया अब भी बेनूर बैठा है
……
पिछले की मौत से किसी को क्या फर्क पडा
क्या फर्क पडेगा अगर एक ओर मजबूर बैठा है
– राकेश







