डेढ़ महीनों में उपग्रहों ने आग की सौ से ज्यादा वारदातें की दर्ज
उत्तरी ध्रुव के इर्द-गिर्द विशाल आर्कटिक क्षेत्र के बारे में हमारी राय एकरंगे सफेद बर्फीले इलाके वाली बनी हुई है। बाहरी छोर पर मौजूद इक्का-दुक्का घुमंतू एस्किमो बस्तियों को छोड़ दें तो दसियों लाख वर्गमील का यह पूरा इलाका निर्जन है। लोमड़ी, रेंडियर और कुछ छोटे-मोटे और जानवर भी यहां पाए जाते हैं लेकिन इसका नाम यहां के सबसे प्रसिद्ध निवासी सफेद भालुओं के आधार पर पड़ा है। लैटिन में भालू को आर्कटस कहते हैं। धरती की सबसे बड़ी आग ऐसे इलाके में लग सकती है, यह बात सामान्य बुद्धि में नहीं अंटने वाली। लेकिन यही आज की हकीकत है।

पिछले डेढ़ महीनों में उपग्रहों ने यहां आग की सौ से ज्यादा वारदातें दर्ज की हैं, जिनमें कुछ का फैलाव ढाई-तीन लाख एकड़ या इससे भी ज्यादा है। सबसे ज्यादा आग रूस के साइबेरिया इलाके, अलास्का (अमेरिका) और ग्रीनलैंड में लगी हुई है। रूसी आग से उठा धुआं उत्तरी-मध्य एशिया के आबादी वाले 45 लाख वर्ग किलोमीटर इलाके का दम घोंटने लगा है।
ग्लोबल वार्मिंग का प्रभाव अभी सबसे ज्यादा आर्कटिक क्षेत्र में ही देखा जा रहा है, जहां औसत तापमान वृद्धि ग्लोबल ऐवरेज की दोगुनी है। बीता जून आर्कटिक क्षेत्र में अभी तक दर्ज जून महीनों में सबसे ज्यादा गर्म रहा और जुलाई भी उसी राह पर बढ़ रहा है।
इस क्षेत्र के लिए ये इतिहास की सबसे गर्म गर्मियां हैं- औसत से 10 डिग्री ज्यादा गर्म। सवाल है कि यहां जंगल तो हैं नहीं, फिर आग लगी कहां है। जवाब यह कि बर्फ के नीचे पड़े दलदल दहक उठे हैं और नामनिहाद खर-पतवार धू-धू करके जल रहा है। – चंद्रभूषण







