एक गीत:
बोअले रहनी खेतवा में मरीचवा,
ओहि में छुपल रहे हमार कुल अरमान।।
जेईसे-जेईसे बढ़े हरियाली,
ओहिसे-ओहिसे हमार बढ़त जाव शान।।
मेहरारू के खरीदे के रहे झुमका,
लइका क साइकिल रहे फरमान।।
लागल बरसे एक ही दिन बदरिया,
कुल्ही मरिचवा हो गइल बेजान।
कोशिश करीं लेकिन
ना रूके आंसू,
आंखें से बही गईल कुल अरमान।
डूबी गईल खेतवा,
चली गईल कुल गुमान।
भाई हो जन कर अफसोस
एही क नाम ह किसान।
- उपेंद्र राय







