एक बार की बात है लखनऊ चारबाग स्टेशन पर एक बहुत लंबा चौड़ा डीलडौल व्यक्ति अपना सामान लेकर प्लेटफार्म पर उतरा ट्रेन से उतरने के बाद एक कुली किया और वह स्टेशन से बाहर आकर अपने लिये टैक्सी तलाशने लगा। इतने में उसे एक सामने ही एक टैक्सी वाला खड़ा नजर आया। झट उसने टैक्सी वाले से कहा- ‘अरे भाई लालबाग जाना है, कितना पैसा लोगे?’
टैक्सी वाले ने कहा – 50 रु. लगेंगे, बाबूजी!
उस व्यक्ति ने चतुराई दिखाते हुए कहा- इतने पास के तुम 50 रूपए., भाड़ा लोगे! क्या लूट मचा रखी है तुम लोगो ने, मैं पैदल ही वहां पहुंच जाऊंगा। फिर क्या था वह आदमी भी जिद्दी किस्म का था और इसी कारण उसने अपना सामान उठाया और पैदल ही लाल बाग की ओर चलने लगा। आधे घंटे तक पैदल चलने के बाद उसे फिर से वही टैक्सी वाला दिखाई दिया।
उसने टैक्सी वाले को झट से रोका और कहने लगा कि भाई अब तो मैने आधी दूरी तय कर लिया है, अब कितना पैसा लोगे? टैक्सी वाला झट से बोला अब 100 रु. लगेंगे। यह सुन कर वह बहुत हैरान होते हुआ उसने टैक्सी वाले से पूछा कि पहले तुम चारबाग से 50 रुपये ले रहे थे और अब 100 क्यों मांग रहे हो?
इस टैक्सी वाले ने तुरन्त उत्तर दिया कि बाबूजी इस वक्त आप चारबाग के ठीक उल्टी दिशा में, सदर में 5 किलोमीटर दूर खड़े हैं। लालबाग चारबाग स्टेशन के दूसरी ओर है। उस व्यक्ति ने इसके बाद उससे कुछ नहीं कहा और चुपचाप उसके टैक्सी में बैठ कर लालबाग पहुंचा।
बात सच भी है सिर्फ ज्ञान होने से कुछ नहीं होता बल्कि ज्ञान के साथ विवेक भी जरूरी है। इसी तरह सिर्फ शक्ति होना पर्याप्त नहीं है बल्कि शक्ति का समझ के साथ इस्तेमाल जरूरी है।







