- चित्रकूट में है ऐसा कुंड जिसमे रविवार सप्तमी को नहाने पर दूर हो जाते हैं पाप
- चित्रकूट के इस कुंड पर युधिष्ठिर और यक्ष का यहीं हुआ था संवाद!
तीर्थनगरी चित्रकूट में एक ऐसा कुंड है जिसमे रविवार सप्तमी के दिन स्नान करने से पापों का शमन हो जाता है, जानकार लोग बड़े पैमाने पर इस दिन का इंतजार करते हैं और कुंड में स्नान करके पापों से मुक्ति पाते हैं।
इस अदभुत कुंड का नाम है अघमर्षण कुंड और यह पाठा क्षेत्र के धारकुंडी आश्रम में स्थित है। कथानक जुड़ा है महाभारतकाल से, पांडवों को अपने कुल के वध का पाप लगा था और उन्हें इसी कुंड में स्नान करने की सलाह भगवान श्रीकृष्ण ने दी थी। अघमर्षण ऋषि ने इस स्थल पर तपस्या की थी लिहाजा कुंड का नाम भी अघमर्षण कुंड हो गया, धारकुंडी आश्रम के सेवादार संत संजय बाबा बताते हैं कि युधिष्ठिर और यक्ष का संवाद भी यहीं हुआ था, आज रविवार सप्तमी थी, लिहाजा बड़े पैमाने पर यूपी-एमपी से आये श्रद्धालुओं ने धारकुंडी आश्रम के अघमर्षण कुंड में स्नान किया।
पन्ना नरेश बचनबद्ध थे:
पन्ना नरेश ने चित्रकूट में लगभग 4 सौ मंदिर बनवाये थे, कहा जाता है कि आज भी कामदगिरि परिक्रमा मार्ग से लेकर समूचे तीर्थ क्षेत्र में नजर आने वाले ज्यादातर मंदिर पन्ना नरेश के ही बनवाये हैं।
मान्यता के अनुसार पन्ना नरेश मान सिंह द्वारा 18 वीं शताब्दी में चित्रकूट में इतनी बड़ी तादाद में मंदिर बनाने की कथा भी विचित्र है, बताया जाता है कि एक बार राजा अपनी सुंदर रानी के साथ गया (बिहार) में दान पुण्य करने गए थे, यहां पण्डों ने विधिवत पूजा पाठ कराया और दक्षिणा के रूप में राजा से उनकी पत्नी मांग ली, पन्ना नरेश बचनबद्ध थे लिहाजा बोझिल मन से उन्होंने अपनी रानी पण्डों को सौंप दी, राजा सेना समेत वापस लौटने लगे। तब रानीं ने एक मंदिर के दुर्ग में चढ़कर आत्महत्या कर ली, रानी की मौत देखकर क्रोधित राजा और उनकी सेना ने पण्डों को दंडित किया और जमकर लूटपाट की, बड़ी तादाद में लूटा गया धन और रानी का वियोग लेकर राजा पन्ना वापस अपने राज्य लौट आये।
कुछ दिनों बाद उनके राज्य में सूखा, महामारियां और कई तरह की दैवीय आपदाओं के प्रकोप आ घिरे। राजा को राज्य पुरोहितों ने बताया कि गया के पण्डों से लूटे गए धन के कारण राज्य में संकट है, उस धन को जल्द से जल्द किसी पवित्र जगह में धर्मार्थ खर्च कर देने पर ही राज्य में शांति आएगी, इसी बात पर पन्ना नरेश ने चित्रकूट में छोटे-बड़े लगभग 400 मंदिर बनवाये। आज भी यह मंदिर चित्रकूट में कामदगिरि परिक्रमा मार्ग व परिक्षेत्र में स्थित हैं।







