बतकही कउड़ा क
जमाना रहे एगो, जब सबेरहीं फुंका जाव कउड़ा,
भइया, का कहीं उ कउड़ा क बात।
घंटों बइठ के होखे बतकही,
सढ़वां बरसिंगवां सब चरी जात।
।भइया, का कहीं उ कउड़ा क बात।।
सब टोला लोग एक जगह जुटत रहे,
खुटवारी से दिनभर पतई बटोराव।
ओहिजे कुल विश्व क ज्ञान मिल जात रहे,
केतना आपस में मिलला क रहे भाव।
बोलावत-बोलावत थक जात रहली स माई,
हमनी क बस ई हे कहीं, रुक आवतनी भाई।
केतना लोग त दिनवा भर बइठे,
समझे में ना आवे कि कब हो गईल रात।
। भइया, का कहीं उ कउड़ा क बात।।
अब त ना उ गउवों में लोघ बा,
न त दिन भर खातिर कहीं कउड़ा बा फुंकात।
।भइया का कहीं उ कउड़ा क बात।।
भइया, अब त न घरवा में चूल्ह बा,
न बा कहीं पतई बटोरला क जमाना।
फैशन चरम पर बढ़ गइल बा उहवों,
का केहू होखे मेहरारू या मर्दाना।
ना बा मेर-भाव, बात-बात पर हो जाता झगड़ा।
कट्टा निकालत देर नइखे, हर जगह बा रगड़ा।
सब लगिए रह ता, तबो नइखे होत मुलाकात,
।भइया, का कहीं उ कउड़ा क बात।।
- उपेंद्र नाथ राय ‘घुमंतू’







