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    Home»धर्म»Spirituality»Short Inspirational

    बाजीराव ने दिया मेवाड़ को सम्‍मान

    By December 28, 2019 Short Inspirational No Comments4 Mins Read
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    जनवरी का महीना और साल था 1736 ईस्‍वी। देश के शासकों के एक मजबूत संगठन के ध्‍येय को लेकर पेशवा बाजीराव (प्रथम, 1700-1740 ई.) ने मेवाड़ की ओर भी रुख किया। तब यहां के महाराणा जगतसिंह (द्वितीय) थे। महाराणा ने इस बात का समर्थन किया कि सभी शासकों को एक होकर पेशवा के साथ हो जाना चाहिए। हालांकि उसके यहां आने की एक वजह और भ‍ी थी। सदाशिव बल्‍लाल जो पिछले एक साल से पट्टे की सनद के लिए कोशिश कर रहा था, उसे पूर्णता देकर कर के बारे में एक समझौता करना। हां, मेवाड़ ने इसे एक परेशानी के तौर पर लिया।

    महाराणा ने मुलाकात उदयपुर से कहीं दूर ही करने के लिए प्रधान बिहारीदास पंचाेली को भेजा किंतु बाजीराव का इस ओर आगमन निरंतर था। उसने डूंगरपुर के शासक महारावल शिवसिंह से भेंट की और यह भरोसा कर लिया कि कोई उसके विरोध में नहीं है। उसने 25 जनवरी को मेवाड़ की सीमा में प्रवेश किया तो महाराणा ने सलूंबर के रावत केसरीसिंह के मार्फत उदयपुर निमंत्रित करने की पेशकश की। बाजीराव ने निमंत्रण स्‍वीकार किया और दूसरी फरवरी को उदयपुर पहुंचा। आहाड़ के पास ‘चंपाबाग’ में उसको शाही सत्‍कार के साथ ठहराया गया और भेंट आदि प्रदान की गई।

    वंश भास्‍कर में सूर्यमल्‍ल मिसण और सर यदुनाथ सरकार ने लिखा है कि दूसरे दिन महाराणा ने दरबार लगाया और अपने सामने ही बाजीराव के लिए गद्दी लगवाई। यही नहीं, दरबार भवन के दरवाजे तक पहुंचकर पेशवा की अगवानी की। तब यह बहुत सम्‍मान का सूचक था। पेशवा ने गद्दी को हटवा दिया और महाराणा को आदर देते हुए नीचे फर्श पर ही बैठ गया। महाराणा के सिर पर जब चंवर ढुलाया जा रहा था, तो महाराणा ने पेशवा के सिर पर चंवर ढुलवाने की आज्ञा दी और कहा, ‘ आप ब्राहमण हैं, आपकी तो हमें पूजा करनी चाहिए।’ पेशवा सम्‍मान में कहां पीछे रहने वाला था। उत्‍तर दिया, ‘आपको तो मुझे अपने साेलह उमरावों में स्‍वीकारना चाहिए।’ बातचीत आगे बढ़ी। मामला मेवाड़ से वार्षिक चौथ के लिए पट्टे की सनद लेने का था। महाराणा ने बनेड़ा का परगना अपने पास ठेका के रूप में रखकर वहां की आमदनी पेशवा को देना निश्चित किया। किंतु, घटनाक्रम ने बाजीराव को कुछ ज्‍यादा ही दिया।

    फरवरी 4 को महाराणा ने बाजीराव को पीछोला झील में बने जगमंदिर (यहीं पर शाहजहां भी कुमारकाल में रुका था) देखने काे न्‍यौता। इस बीच, यह बात फैल गई कि यह न्‍यौता उसकी जान लेने का षडयंत्र है। बाजीराव को यह नागवार गुजरा। बात बिल्‍कुल मिथ्‍या निकली। इस बीच, यह भी तय हुआ कि उसको महाराणा की दादी के स्‍वर्णदान के रूप में पड़े तीन लाख रूपए दिए जाएं। जब वह जगमंदिर देखने पहुंचा तो उसने रास्‍ते में दान पुण्‍य किया और नाव वालों को भी इनाम दिया। इस घटना का जिक्र पेशवा दफ्तर जिल्‍द 30 पत्र संख्‍या 321 में हुआ है, जैसा कि जमनेशकुमार ओझा ने अपनी पुस्‍तक ‘मेवाड़ का इतिहास’ में भी दिया है। बाजीराव 7 फरवरी को उदयपुर में अपनी छाप छोड़कर रवाना हुआ किंतु महाराणा ने उसकी सुरक्षा का पूरा ख्‍याल किया और रूपाहेली के ठाकुर शिवसिंह और उसके पुत्र अनूपसिंह को साथ भेजा और वे पूरी वापसी यात्रा में उसके साथ रहे। मेवाड़ ने संगठन के लिए एक मजबूत पहल की थी।

    बाजीराव के मन पर इस मेवाड़ यात्रा का बड़ा प्रभाव पड़ा। उसने मेवाड़ की उच्‍चता व महत्‍ता काे सार्वकालिक माना जबकि अन्‍य रियासतों को अपेक्षित सम्‍मान नहीं दिया। उसका कहना था कि मेवाड़ ने सदैव मुगलों का विरोध किया…। यह यात्रा इस अर्थ में भी बड़ी महत्‍वपूर्ण रही कि मेवाड़-मराठा संबंध मित्रवत हो गए। राजा शाहू व महाराणा के बीच कुशलता का पत्र-व्‍यवहार निरंतर होने लगा। वैवाहिक उत्‍सवों में भी एक दूसरे के यहां आना-जान लगा रहा। कुछ परिवार वहां बसने के लिए भी भेजे। महाराणा ने पेशवा की सहायता तब भी की जबकि बाजीराव ने दिल्‍ली पर आक्रमण की योजना बनाई। महाराणा ने तब देवीचंद पंचोली के नेतृत्‍व में अपनी सेना भेजी थी।

    यही नहीं, बाजीराव की मां राधाबाई ने भी इससे पहले मेवाड़ की यात्रा की। मेवाड़ महाराणा ने उसका अपनी मां की तरह सत्‍कार किया और सत्‍कार स्‍वरूप भेंट भी दी। वह 6 मई, 1735 को उदयपुर पहुंची थी। यहां वह बारह दिन रूकी और 18 मई को नाथद्वारा के लिए रवाना हुई। आगे जयपुर गईं। उसकी सुरक्षा के लिए महाराणा ने एक दल सलूंबर के रावत केसरी सिंह के नेतृत्‍व में जयपुर तक भेजा। जय‍सिंह शक्‍तावत व लच्‍छीराम मिश्र को उसकी पूरी ही यात्रा में सेवा पर ध्‍यान देने के लिए भेजा था…। इतिहास के कई पन्‍ने इस घटना से रंगे हैं, मगर मेवाड़ की गरिमा यहां भी देखने को मिलती है, वह राष्‍ट्रवाद के ध्‍येय का पक्षधर रहा।

    प्रस्तुति: श्रीकृष्ण जुगनू

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