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    पितृ पक्ष 2026: 26 सितंबर से शुरू होगी श्राद्ध परंपरा, 10 अक्टूबर को सर्वपितृ अमावस्या

    ShagunBy ShagunSeptember 27, 2026 धर्म-कर्म No Comments8 Mins Read
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    Pitru Paksha 2026: Shraddh rituals to begin on September 26; Sarvapitra Amavasya on October 10.
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    27 सितंबर से महालय पक्ष का आगाज, 10 अक्टूबर को होगा पितृ पक्ष का समापन; जानिए श्राद्ध की तिथियां, विधि, सामग्री और जरूरी मान्यताएं

    Anant Chaturdashi is on September 25; Lord Vishnu's 'Anant' (infinite) form will be worshipped.डॉ. शैलजा शर्मा दीक्षित

    लखनऊ। पितृ पक्ष केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि अपने पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता, स्मरण और सम्मान व्यक्त करने का अवसर माना जाता है। वर्ष 2026 में मुख्य पितृ पक्ष यानी महालय पक्ष 27 सितंबर, रविवार से शुरू होकर 10 अक्टूबर, शनिवार को सर्वपितृ अमावस्या के साथ समाप्त होगा।

    हालांकि 26 सितंबर को भाद्रपद पूर्णिमा श्राद्ध है। इसी वजह से कुछ पंचांगों में 26 और 27 सितंबर को लेकर अंतर दिखाई देता है। इसलिए पाठकों के लिए यह समझना जरूरी है कि 26 सितंबर पूर्णिमा श्राद्ध की तिथि है, जबकि मुख्य पितृ पक्ष की शुरुआत 27 सितंबर से मानी जा रही है।

    2026 में श्राद्ध की प्रमुख तिथियां

    तारीख  –दिन  –श्राद्ध
    26 सितंबर  -शनिवार  -भाद्रपद पूर्णिमा श्राद्ध
    27 सितंबर  -रविवार  -प्रतिपदा श्राद्ध
    28 सितंबर  -सोमवार  -द्वितीया श्राद्ध
    29 सितंबर  -मंगलवार  -तृतीया श्राद्ध एवं महाभरणी
    30 सितंबर  -बुधवार  -चतुर्थी श्राद्ध
    1 अक्टूबर  – गुरुवार  -षष्ठी श्राद्ध
    2 अक्टूबर  -शुक्रवार  -सप्तमी श्राद्ध
    3 अक्टूबर  -शनिवार  -अष्टमी श्राद्ध
    4 अक्टूबर  -रविवार  -नवमी श्राद्ध
    5 अक्टूबर  -सोमवार  -दशमी श्राद्ध
    6 अक्टूबर  -मंगलवार  -एकादशी श्राद्ध
    7 अक्टूबर  -बुधवार  -द्वादशी श्राद्ध
    8 अक्टूबर  -गुरुवार  -त्रयोदशी श्राद्ध
    9 अक्टूबर  -शुक्रवार  -चतुर्दशी श्राद्ध
    10 अक्टूबर  -शनिवार  -सर्वपितृ अमावस्या

    ध्यान दें: तिथियों के आरंभ और समाप्ति का समय स्थान के अनुसार बदल सकता है। किसी विशेष व्यक्ति का श्राद्ध करते समय स्थानीय पंचांग या आचार्य से तिथि की पुष्टि करना उचित है।

    आखिर क्यों किया जाता है श्राद्ध?

    ‘श्राद्ध’ शब्द का संबंध श्रद्धा से माना जाता है। हिन्दू परंपरा में देव ऋण, ऋषि ऋण और पितृ ऋण की अवधारणा मिलती है। माता-पिता, दादा-दादी और पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करना पितृ ऋण के स्मरण से जुड़ा है।

    श्राद्ध में परंपरा के अनुसार—

    • पितरों का स्मरण
    • तर्पण
    • पिंड अर्पण
    • अन्न और जल का दान
    • ब्राह्मण अथवा जरूरतमंद को भोजन
    • गौ सेवा एवं दान
    • पितरों की शांति के लिए प्रार्थना

    जैसे कार्य किए जाते हैं।

    इसका मूल भाव केवल कर्मकांड नहीं, बल्कि अपने पूर्वजों को याद करना और उनके प्रति कृतज्ञता व्यक्त करना है।

    कर्ण की कथा से जुड़ा है श्राद्ध का संदेश

    पितृ पक्ष की महत्ता समझाने वाली प्रसिद्ध कथाओं में महाभारत से जुड़ी कर्ण की कथा भी सुनाई जाती है।

    लोकप्रिय परंपरा के अनुसार, मृत्यु के बाद जब कर्ण पितृलोक पहुंचे तो उन्हें अन्न के स्थान पर स्वर्ण और अन्य धन प्राप्त हुआ। कर्ण ने इसका कारण पूछा। तब उन्हें बताया गया कि उन्होंने जीवन में खूब धन और स्वर्ण दान किया, लेकिन पितरों के लिए अन्न और जल का दान नहीं किया था।

    कर्ण ने बताया कि उन्हें अपने पितरों के बारे में पर्याप्त जानकारी नहीं थी। इसके बाद उन्हें पृथ्वी पर लौटकर पितरों के निमित्त श्राद्ध और अन्नदान करने का अवसर मिला।

    यह कथा परंपरागत रूप से इस संदेश से जोड़ी जाती है कि दान केवल धन का नहीं, बल्कि अन्न और जल का भी महत्वपूर्ण स्थान है।

    10 अक्टूबर को सर्वपितृ अमावस्या क्यों खास?

    10 अक्टूबर 2026 को सर्वपितृ अमावस्या होगी और इसी के साथ पितृ पक्ष का समापन माना जाएगा।

    यदि किसी पूर्वज की मृत्यु की तिथि ज्ञात न हो तो परंपरा में इस दिन उनका श्राद्ध करने की मान्यता है। इसलिए इसे ज्ञात-अज्ञात सभी पितरों के स्मरण का विशेष अवसर माना जाता है।

    श्राद्ध के लिए सामान्यतः क्या सामग्री चाहिए?

    श्राद्ध की सामग्री परिवार, क्षेत्र और परंपरा के अनुसार अलग हो सकती है। सामान्य रूप से इनमें शामिल हैं—

    कुश/दर्भ, काले तिल, जौ, अक्षत, तांबे का पात्र, शुद्ध जल, गंगाजल, सफेद फूल, तुलसीदल, चंदन, रोली, दीपक, घी, कपूर, दूध, दही, घी, शहद, गुड़, सुपारी, यज्ञोपवीत, मौसमी फल, केला, सात्त्विक भोजन और पिंड के लिए चावल या जौ का आटा।

    तर्पण में सामान्यतः जल, काले तिल और कुश का प्रयोग किया जाता है।

    सरल रूप में श्राद्ध-विधि

    1. स्थान की शुद्धि

    घर के स्वच्छ स्थान की सफाई कर गंगाजल का छिड़काव करें। पितरों के निमित्त स्थान तैयार करें।

    2. स्नान और संकल्प

    स्नान करके स्वच्छ वस्त्र पहनें। परंपरा के अनुसार जल, पुष्प, अक्षत और काले तिल लेकर गोत्र, पितर का नाम और श्राद्ध की तिथि का स्मरण करते हुए संकल्प करें।

    3. पितृ तर्पण

    तांबे के पात्र में जल, काले तिल, जौ और कुश लेकर पितरों का नाम और गोत्र स्मरण करते हुए श्रद्धापूर्वक तर्पण करें। नाम ज्ञात न होने पर परंपरा के अनुसार ज्ञात-अज्ञात पितरों का स्मरण किया जा सकता है।

    4. पिंड अर्पण

    चावल या जौ के आटे में तिल, घी और शहद मिलाकर पिंड बनाए जाते हैं। इन्हें परंपरागत विधि से अर्पित किया जाता है।

    5. भोजन और अन्नदान

    खीर, पूड़ी, सब्जी, दही-चावल और फल आदि सात्त्विक भोजन तैयार कर पितरों के निमित्त अर्पित किया जाता है। परिवार की परंपरा के अनुसार गौ, कौआ आदि को भोजन कराने तथा जरूरतमंद को अन्न देने की परंपरा भी है।

    6. ब्राह्मण अथवा जरूरतमंद को भोजन

    परंपरा और सामर्थ्य के अनुसार ब्राह्मण, साधु या जरूरतमंद व्यक्ति को भोजन, वस्त्र अथवा दक्षिणा दी जा सकती है।

    7. प्रार्थना

    अंत में पितरों का स्मरण कर परिवार के सुख, शांति और मंगल की प्रार्थना करें।

    पर्यावरण की दृष्टि से प्लास्टिक या अन्य ऐसी सामग्री जल में न डालें जो प्रकृति को नुकसान पहुंचाए।

    महिलाओं के तर्पण को लेकर क्या मान्यता है?

    Pitru Paksha 2026: Shraddh rituals to begin on September 26; Sarvapitra Amavasya on October 10.इस विषय में अलग-अलग परिवारों और धार्मिक परंपराओं में अलग-अलग नियम मिलते हैं। कई परंपराओं में महिलाएं पितृ स्मरण और धार्मिक अनुष्ठानों में भाग लेती हैं। इसलिए अपने परिवार की परंपरा और स्थानीय आचार्य की सलाह के अनुसार विधि अपनाना उचित है।

    क्या पितृ पक्ष में सूर्य को जल देना चाहिए?

    सूर्य देव को अर्घ्य देना अलग धार्मिक परंपरा का हिस्सा है। पितृ पक्ष के दौरान इसे रोकने का कोई सार्वभौमिक नियम नहीं है। जो लोग नियमित रूप से सूर्य को अर्घ्य देते हैं, वे अपनी परंपरा के अनुसार यह पूजा जारी रख सकते हैं।

    क्या तुलसी को जल देना चाहिए?

    कई परिवारों में तुलसी पूजा दैनिक धार्मिक परंपरा का हिस्सा है। पितृ पक्ष के कारण तुलसी पूजा बंद करने का कोई सार्वभौमिक नियम नहीं है। अपनी पारिवारिक परंपरा के अनुसार नियमित पूजा की जा सकती है।

    घर में पितरों की तस्वीर कहां रखें?

    पितरों की तस्वीर रखने को लेकर परिवार और वास्तु परंपराओं में अलग-अलग मान्यताएं हैं। यदि घर में तस्वीर या स्मृति स्थान बनाया गया है तो उसे स्वच्छ, शांत और सम्मानजनक स्थान पर रखना बेहतर माना जाता है।

    यह कहना उचित नहीं होगा कि पितरों का घर के किसी एक कमरे में निश्चित भौतिक ‘वास’ होता है। धार्मिक दृष्टि से अधिक महत्वपूर्ण पूर्वजों का सम्मान और स्मरण है।

    पितरों को दीपक कैसे जलाएं?

    यदि परिवार में पितरों के निमित्त दीपक जलाने की परंपरा है तो स्वच्छ और सुरक्षित स्थान पर श्रद्धापूर्वक दीपक जलाया जा सकता है। दीपक की दिशा, तेल या घी तथा स्थान को लेकर अलग-अलग पारिवारिक परंपराएं हो सकती हैं।

    पितरों की प्रसन्नता के लिए क्या करें?

    धार्मिक मान्यताओं में पितरों के प्रति सम्मान, श्राद्ध-तर्पण, अन्नदान, दान, जीव सेवा, गौसेवा और परिवार के बुजुर्गों का सम्मान महत्वपूर्ण माना जाता है।

    इस भावना को केवल एक दिन के कर्मकांड तक सीमित रखने के बजाय अपने पूर्वजों की स्मृति और उनके प्रति कृतज्ञता के रूप में देखना भी इस परंपरा का महत्वपूर्ण पक्ष है।

    पितृ पक्ष में किन बातों का ध्यान रखें?

    परंपरागत रूप से इस अवधि में—

    1. नशे और अत्यधिक तामसिक आचरण से बचने की सलाह दी जाती है।
    2. भोजन सात्त्विक रखने की परंपरा है।
    3. अनावश्यक विवाद और असंयम से बचने की बात कही जाती है।
    4. श्राद्ध की तिथि मृत्यु-तिथि के अनुसार निर्धारित की जाती है।
    5. तिथि ज्ञात न होने पर सर्वपितृ अमावस्या का महत्व माना जाता है।
    6. मुख्य श्राद्ध कर्म प्रायः अपराह्न काल में किए जाने की परंपरा है।
    7. मंत्र और पिंडदान की विस्तृत विधि संप्रदाय और परिवार के अनुसार अलग हो सकती है।

    यदि पूरी सामग्री उपलब्ध न हो तो अपनी परंपरा के अनुसार सरल तर्पण किया जा सकता है। धार्मिक दृष्टि से सामग्री से अधिक श्रद्धा और विधि की शुद्धता को महत्व दिया जाता है।

    सबसे महत्वपूर्ण बात—श्रद्धा ही श्राद्ध का मूल है

    “श्रद्धया दीयते इति श्राद्धम्”—अर्थात श्रद्धा से किया गया अर्पण ही श्राद्ध है।

    पितृ पक्ष हमें अपनी जड़ों, परिवार और पूर्वजों को याद करने का अवसर देता है। इस परंपरा का मूल संदेश केवल कर्मकांड नहीं, बल्कि स्मरण, कृतज्ञता, सेवा, दान और पारिवारिक संस्कारों को आगे बढ़ाना है।

    इसी दौरान लोग अपनी श्रद्धा के अनुसार भगवद्गीता, विष्णुसहस्रनाम या अन्य स्तोत्रों का पाठ भी कर सकते हैं।

    विशेषज्ञ की राय

    डॉ. शैलजा शर्मा दीक्षित, होम्योपैथिक चिकित्सक, NHMC, खाला बाजार, लखनऊ के अनुसार, पितृ पक्ष को श्रद्धा और पारिवारिक परंपरा से जोड़कर देखना चाहिए। धार्मिक अनुष्ठानों के साथ स्वच्छता, सात्त्विक आहार, संयम और बुजुर्गों के सम्मान जैसी सकारात्मक बातों को भी जीवन में अपनाना इस अवधि को सार्थक बना सकता है। विशेष धार्मिक विधि या तिथि को लेकर परिवार की परंपरा और स्थानीय आचार्य की सलाह को प्राथमिकता देना उचित है।

    Shagun

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