इन्दिरा एकादशी 2026 : पितृपक्ष में आने वाली यह एकादशी भगवान विष्णु की आराधना के साथ पितरों के प्रति श्रद्धा और पुण्य-समर्पण का विशेष अवसर मानी जाती है
डॉ. शैलजा शर्मा दीक्षित
लखनऊ। पितृपक्ष के दौरान आने वाली इन्दिरा एकादशी सनातन परंपरा में विशेष आध्यात्मिक महत्व रखती है। मान्यता है कि भगवान विष्णु को समर्पित इस व्रत का पुण्य पितरों को अर्पित करने से उनके कल्याण की कामना की जाती है। इस वर्ष 2026 में इन्दिरा एकादशी मंगलवार, 6 अक्टूबर को मनाई जाएगी।
इन्दिरा एकादशी को केवल उपवास का पर्व नहीं, बल्कि भगवान विष्णु की भक्ति, आत्मसंयम और पितरों के प्रति कृतज्ञता से जोड़कर देखा जाता है। इस दिन श्रद्धालु विष्णु पूजा, जप, कथा, दान और पितरों के निमित्त पुण्य कर्म करते हैं।
अगले दिन होगा पारण
पंचांग परंपरा के अनुसार इन्दिरा एकादशी के अगले दिन द्वादशी तिथि में व्रत खोलने का विधान बताया गया है। पारण का सही समय स्थानीय पंचांग में दी गई द्वादशी तिथि और पारण मुहूर्त के अनुसार रखना उचित माना जाता है। अलग-अलग स्थानों पर सूर्योदय और तिथि के समय में अंतर होने के कारण स्थानीय पंचांग को प्राथमिकता देना बेहतर है।
दशमी से शुरू होती है तैयारी
इन्दिरा एकादशी की साधना की तैयारी एक दिन पहले यानी दशमी से शुरू मानी जाती है। दशमी को स्नान, पूजा और पितरों का स्मरण करने के बाद श्रद्धापूर्वक श्राद्ध किया जाता है। सात्त्विक भोजन करने, संयम बरतने और भगवान विष्णु का ध्यान करने की परंपरा है।
इस दौरान भगवद्गीता, विष्णु सहस्रनाम या भगवान विष्णु से जुड़े स्तोत्रों का पाठ भी किया जा सकता है। रात में जल्दी सोकर अगले दिन व्रत का संकल्प लिया जाता है।
एकादशी के दिन कैसे करें पूजा?
सुबह स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें और भगवान विष्णु या श्रीकृष्ण का पूजन करें। पूजा में दीप, धूप, पुष्प, फल, नैवेद्य और विशेष रूप से तुलसीदल अर्पित किया जाता है।
भगवान विष्णु के मंत्र “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” का जाप करना शुभ माना जाता है। इसके साथ इन्दिरा एकादशी की कथा का श्रवण या पाठ, विष्णु सहस्रनाम, भगवद्गीता अथवा श्रीमद्भागवत का पाठ किया जा सकता है।
व्रत अपनी शारीरिक क्षमता और स्वास्थ्य के अनुसार रखना चाहिए। सामर्थ्यवान श्रद्धालु निर्जल व्रत रखते हैं, जबकि अन्य फलाहार या सात्त्विक आहार के साथ व्रत कर सकते हैं। रात में भगवान के समक्ष भजन-कीर्तन और जागरण की भी परंपरा है।
विशेष रूप से एकादशी पूजा में भगवान को तुलसीदल अर्पित करने का धार्मिक महत्व बताया गया है।
क्या है इन्दिरा एकादशी की कथा?
इन्दिरा एकादशी की कथा भगवान श्रीकृष्ण द्वारा धर्मराज युधिष्ठिर को सुनाए जाने की मान्यता है। कथा के अनुसार प्राचीन काल में माहिष्मती नगरी में इन्द्रसेन नाम के धर्मात्मा राजा राज्य करते थे। वे भगवान विष्णु के भक्त थे और अपनी प्रजा का पालन धर्मपूर्वक करते थे।
एक दिन देवर्षि नारद उनके राज्य में पहुंचे। राजा ने उनका आदर-सत्कार किया। नारदजी ने राजा को बताया कि उनके पिता पूर्व जन्म के कर्मों के कारण पितृलोक में कष्ट भोग रहे हैं।
यह सुनकर राजा इन्द्रसेन अत्यंत दुखी हुए और उन्होंने पिता के उद्धार का उपाय पूछा। तब देवर्षि नारद ने उन्हें आश्विन कृष्ण पक्ष की इन्दिरा एकादशी का व्रत करने की सलाह दी।
राजा ने श्रद्धापूर्वक एकादशी व्रत का संकल्प लिया। भगवान विष्णु की पूजा की, पितरों के निमित्त श्राद्ध किया और व्रत का पुण्य अपने पिता को समर्पित किया।
कथा के अनुसार भगवान विष्णु की कृपा से राजा के पिता को कष्ट से मुक्ति मिली और उन्हें उच्च लोक की प्राप्ति हुई। राजा इन्द्रसेन ने भी लंबे समय तक धर्मपूर्वक राज्य किया और बाद में अपने पुत्र को राज्य सौंपकर स्वयं भी परम गति को प्राप्त हुए।
यही कथा इन्दिरा एकादशी को पितरों के कल्याण और भगवान विष्णु की कृपा से जोड़ती है।
व्रत : केवल उपवास तक सीमित नहीं :
इन्दिरा एकादशी का मूल भाव केवल भोजन का त्याग करना नहीं, बल्कि मन, वाणी और कर्म में संयम लाना भी है। धार्मिक मान्यता के अनुसार इस दिन किया गया जप, ध्यान, पूजा, दान और भगवद्-स्मरण व्यक्ति की आध्यात्मिक साधना को मजबूत करता है।
पितृपक्ष में पड़ने के कारण इस एकादशी में पितरों के प्रति कृतज्ञता का भाव और भी प्रमुख हो जाता है। श्रद्धालु अपने पूर्वजों के निमित्त पूजा-पाठ, दान और पुण्य कर्म करते हुए उनके कल्याण की प्रार्थना करते हैं।
इसमें भोग क्या लगेगा :
बता दें कि इन्दिरा एकादशी पर भगवान विष्णु को सात्त्विक और एकादशी-व्रत के अनुकूल भोग लगाया जाता है। सामान्यतः इनमें ये चीजें रखी जा सकती हैं:
- केला और अन्य मौसमी फल
- नारियल
- सेब, अमरूद, अनार आदि फल
- दूध, दही या पंचामृत
- मधु (शहद)
- मखाने की खीर – दूध और मखाने से, बिना सामान्य अनाज के
- मखाने, काजू, बादाम, किशमिश आदि
- शकरकंद
- मिश्री
- तिल- गुड़
- तुलसीदल – भगवान विष्णु को अर्पित करना विशेष रूप से महत्वपूर्ण माना जाता है।
एक आसान भोग थाली:
पंचामृत + केला + नारियल + मखाने की खीर + मिश्री + तुलसीदल। इसे भगवान विष्णु को श्रद्धापूर्वक अर्पित किया जा सकता है।
ध्यान रखें: यदि व्रत रखा जा रहा है तो सामान्यतः चावल, गेहूं, दाल और अन्य अनाज से बने भोग से बचा जाता है। अलग-अलग परिवारों और परंपराओं में एकादशी के नियम अलग हो सकते हैं।
इन्दिरा एकादशी का सार
भगवान विष्णु की भक्ति + एकादशी व्रत + पितरों के प्रति श्रद्धा + दान और पुण्य कर्म – यही इन्दिरा एकादशी की धार्मिक भावना का केंद्र है।
यह पर्व हमें यह संदेश भी देता है कि जीवन में अपनी आध्यात्मिक उन्नति के साथ पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता और परिवार की परंपराओं के सम्मान को भी स्थान देना चाहिए।
- डॉ. शैलजा शर्मा दीक्षित, होम्योपैथिक चिकित्सक, NHMC, लखनऊ







