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    Home»ब्लॉग»Current Issues

    भगवा पर प्रियंका का अप्रिय प्रवचन

    By December 31, 2019 Current Issues No Comments6 Mins Read
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    डॉ दिलीप अग्निहोत्री

    राहुल गांधी के बयानों में गम्भीरता का अभाव स्थायी तत्व है। ऐसा नहीं कि यह यह उनके विरोधियों का मन्तव्य है। कुछ समय पहले कांग्रेस के भीतर से भी यह आवाज उठी थी। जयराम रमेश सहित कई दिग्गजों ने माना था कि ऐसे बयानों से कांग्रेस को नुकसान उठाना पड़ा है। इसका लाभ तो भाजपा को ही मिला है। इससे कुछ और पीछे लौटे तो कांग्रेस में प्रियंका लाओ पार्टी बचाओ की मांग की गई थी। इसके बाद प्रियंका आ भी गई, सक्रिय भी हो गई,लेकिन शीर्ष बयानों के स्तर पर कांग्रेस आज भी वहीं है। इसके पहले राहुल अपनी धुन में कुछ बयान तय कर लेते थे, फिर महीनों तक वही दोहराया करते थे। मसलन मोदी सरकार के पहले कार्यकाल की शुरुआत का समय को याद करें, राहुल ने नरेंद्र मोदी को सूट पहने देखा, फिर क्या था उन्होंने सूटबूट की सरकार का नारा बुलंद किया। महीनों तक यह चलता रहा,फिर चौकीदार चोर का नारा लगाने लगे,आदि। इसके लिए उन्हें सुप्रीम कोर्ट में माफी भी मांगनी पड़ी।

    कांग्रेस के भीतर भी ऐसे बयान उत्साह का संचार करने में नाकाम थे। यह माना गया कि प्रियंका के सक्रिय होने के बाद बयान के स्तर में बदलाव होगा। लेकिन इसकी संभावना तभी समाप्त हो गई,जब प्रियंका ने भी चुनावी सभाओं में चौकीदार चोर है का नारा लगवाना शुरू किया था। तभी तय हो गया था कि प्रियंका के बयान भी राहुल की ही तर्ज पर चलेंगे। कुछ कुछ कार्यशैली भी वही है। राहुल जेएनयू के उस छात्र आंदोलन का बचाव करने चले गए थे,जिसमें भारत विरोधी नारे लगाए गए थे। इसी तरह प्रियंका नागरिकता कानून के विरोध में हिंसक आंदोलन के बचाव में आगे आ गई। वह नई दिल्ली के इंडिया गेट पर धरने पर पहुंची। इसे काला कानून बताया,हिंसक प्रदर्शन करने वालों पर खामोश रहीं, लेकिन सरकार पर लोगों की आवाज को दबाने का आरोप अवश्य लगा दिया।

    उनका यह वैचारिक अभियान दिल्ली तक सीमित नहीं रहा,वह उत्तर प्रदेश तक इसे हवा देने लखनऊ आ गई। यहाँ एक महिला पुलिस अधिकारी पर पीड़ित करने का आरोप लगा दिया। जबकि उस अधिकारी ने उनसे निर्धारित रूट को न छोड़ने का आग्रह किया था। प्रियंका जो जिस श्रेणी की सुरक्षा प्राप्त है,उसके मद्देनजर उक्त पुलिस अधिकारी का यह दायित्व भी था। इसके बाद एक अन्य पुलिस अधीक्षक के बयान को मुद्दा बनाया गया। उस अधिकारी ने यदि अपनी पहल पर ऐसा बयान दिया होता तो वह निंदनीय था, लेकिन इसके लिए पूरा संदर्भ देखना चाहिये था। वहां भारत विरोधी और दुश्मन मुल्क के जिन्दाबाज का कुछ लोग नारा लगा रहे थे। पुलिस अधिकारी का कथन इन्ही चंद लोगों के लिए था। इसके बाद प्रियंका ने सीधे मुख्यमंत्री पर निशाना लगाया।

    दिल्ली की तरह यहां भी उपद्रव करने वालों के विरुद्ध वह कुछ नहीं बोली,बल्कि उनकी नाराजगी अराजक तत्वों के खिलाफ होने वाली कार्यवाई को लेकर थी।

    प्रियंका यहीं तक सीमित रहती तब भी गनीमत थी, वह भगवा रंग पर व्याख्यान करने लगी। जाहिर है कि उनके निशाने पर योगी थे। लेकिन ऐसा करते समय वह भूल गई कि महाराष्ट्र में जिस शिवसेना के साथ वह सरकार ने शामिल गया उसका ध्वज भगवा ही है। उनका कहना था कि श्रीकृष्ण, राम करुणा के प्रतीक हैं, हमारे यहां शिव की बारात में सब नाचते हैं। इस देश की आत्मा में बदला जैसे शब्द की जगह नहीं है, श्रीकृष्ण ने कभी बदले की बात नहीं की। इस प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी के वस्त्र पहनते हैं, ये भगवा आपका नहीं है। ये भगवा हिंदुस्तान की धार्मिक आस्था का प्रतीक है, उस धर्म का पालन करना सीखिए। मुख्यमंत्री का भगवा उनका निजी नहीं देश की परंपरा है। भगवा हिंदू धर्म का चिन्ह है। हमारे धर्म हिंसा की कोई जगह नहीं।

    निश्चित ही प्रियंका को योगी आदित्यनाथ की आलोचना का पूरा अधिकार है। लेकिन यह आलोचना भी स्तरीय होनी चाहिए। प्रियंका को यह भी संकोच होना चाहिए था कि भगवा आदि के संबन्ध में उनकी जानकारी सीमित है। वह जिस मुद्दे को उठा रही थी उसमें भगवा, श्री राम कृष्ण शिव का प्रसंग उठाने की आवश्यकता ही नहीं थी। योगी आदित्यनाथ गोरक्षा पीठाधीश्वर है, श्री महंत है। इस रूप में उनके वस्त्रों की मर्यादा है। वह इसका पालन करते है,ऐसी मर्यादाओं का हल्के ढंग से उल्लेख नहीं होना चाहिए। नेताओ को यह समझ होनी चाहिए कि किस मुद्दे को कहा जोड़ना है। प्रियंका ने इसका ध्यान नहीं दिया। यही राहुल की आदत है, फिर बदलाव कैसे होगा।

    सरकारी संपत्ति का नुकसान करने वालों के साथ क्या होना चाहिए। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री ने किसी के साथ बदला नहीं लिया। सरकारी संपत्ति की रक्षा सरकार का दायित्व है। कम से कम इस संवैधानिक व्यवस्था पर तो पार्टी लाइन से ऊपर सहमति होनी चाहिए। उप मुख्यमंत्री डॉ दिनेश शर्मा ने ठीक कहा कि प्रियंका गांधी ने भगवा पर भी ही प्रश्नचिन्ह खड़ा किया है। उन्हें यह नहीं पता है कि कोई व्यक्ति भगवा क्यों पहनता है। यह सीधे सीधे धर्म की लड़ाई भड़काने की कोशिश है। इस लड़ाई को धर्म की लड़ाई के तौर पर न पेश किया जाए। दिनेश शर्मा का आरोप है कि विपक्षी पार्टियों को अपना वोट बैंक खिसकता दिखाई दे रहा है। प्रियंका अल्पसंख्यक तुष्टिकरण के नाम पर वो दंगाइयों को समर्थन देने का काम कर रही है। सार्वजनिक संपत्तियों को नुकसान पहुंचाने वाले उपद्रवियों के पक्ष में कांग्रेस के बड़े नेता खड़े हो रहे हैं।

    जाहिर है कि बयानों के स्तर पर कांग्रेस में यथास्थिति है। प्रियंका भी उसी रास्ते पर है। यह सही है कि कांग्रेस महाराष्ट्र व छत्तीसगढ़ में क्षेत्रीय पार्टियों की बी टीम बनकर सरकार में पहुँच गई है। लेकिन सफलता का यह एकमात्र आधार नहीं है। देश के शीर्ष नेताओं से इससे भी अधिक की अपेक्षा की जाती है। अनुच्छेद तीन सौ सत्तर की हिमायत से कांग्रेस का वैचारिक आधार कमजोर हुआ था। आज वही स्थिति नागरिकता कानून को लेकर है। क्या इसका विरोध अपरोक्ष रूप से अवैध घुसपैठियों की हिमायत जैसा दिखाई नहीं दे रहा है। फिर यह कहने में क्या कठिनाई है कि यह कानून भारत के हिन्दू, मुसलमान या किसी अन्य नागरिक के विरोध में नहीं है। यह कुछ उत्पीड़ित शरणार्थियों को मानवीय व राष्ट्रीय न्याय देने के लिए है।

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