प्रेरक प्रसंग:
गंगा और यमुना, दोनों हिमालय से निकलीं। लेकिन गंगा ठहरी कुछ गोरी और यमुना का रंग काला। गंगा को अपनी शुभ्रता का अभियान हुआ। वह ऊपर-ऊपर चली। बेचारी यमुना अपने श्यामल वर्ण के कारण उससे कुछ दूर-दूर चली। लेकिन गर्वीली गंगा ने आगे चलकर देखा कि बिना यमुना के वह शतमुख से सागर में नहीं मिल सकेगी। इसलिए नम्रभाव से गंगा रुकी। उधर से यमुना आई।

गंगा ने बड़े प्रेम से उसका स्वागत करते हुए कहा, “यमुना बहन, तू मेरे पास आ। मैंने तेरा रंग देखकर तुझे हेय माना। पर तेरे किनारे पर कृष्ण भगवान ने भक्ति की वर्षा की, छोटे-बड़ों को एक किया, अपनी वंशी से एकता का गान किया, मिल-बांटकर खाने की प्रेरणा दी। अरे, तेरी महिमा के क्या कहने!’ यमुना ने गद्गद् स्वर में गंगा से यह सुनकर कहा, “क्यों बहन, तुम मेरी बड़ाई करती हो, किन्तु तुम्हारी महिमा तो अपरम्पार है। मेरे किनारे पर भक्ति का विकास अवश्य हुआ, पर तुम्हारे किनारे से ज्ञान का प्रकाश फैला।
भगवान पशुपतिनाथ तुम्हारे किनारे पर साधनालीन हुए। असंख्य ऋषि-मुनि तुम्हारे ही तट पर तपस्या करते हैं। राजा-महाराजा अपना राजपाट त्यागकर ब्रह्मचिंतन करते हैं। बहन, तुम पूर्ण ज्ञान हो।” तभी गुप्त रहनेवाली सरस्वती बोली, “भक्ति और ज्ञान आवश्यक हैं, पर बिना कर्म के वे अधूरे हैं। इसलिए भक्ति का ज्ञान से और भक्ति-ज्ञान का कर्म से मिलन अनिवार्य है।”फिर क्या था!
ज्ञानमयी गंगा, भक्तिमयी यमुना और कर्ममयी सरस्वती बाहें फैलाकर एक दूसरे के आलिंगन में बंध गईं। तीनो नदियों का संयम ज्ञान, भक्ति और कर्म की धराओं का संगम है। भारतीय संस्कृति का यही अधिष्ठान है।







