प्रस्तुत कविता के रचयिता स्वर्गीय श्री रामधारी सिंह “दिनकर” हैं। उन्होंने अनेक फुटकर कविताएं तथा “कुरक्षेत्र”, “उर्वशी” आदि काव्यग्रंथ लिखे हैं। इस कविता में दिनकर जी ने चन्द्रमा की कलाओं का रोचक ढंग से वर्णन किया है।
पाठ-3: चाँद का कुर्ता
हठ कर बैठा चाँद एक दिन
माता से यह बोला,
“सिलवा दो मां,
मुझे ऊन का
मोटा एक झिंगोला।
सन सन चलती हवा रात भर
जाड़े से मरता हूँ,
ठिठुर ठिठुर कर किसी तरह
यात्रा पूरी करता हूँ।
आसमान का सफर और यह
मौसम है जाड़े का,
न हो अगर तो ला दो कुर्ता
ही कोई भाड़े का।”
- स्वर्गीय श्री रामधारी सिंह “दिनकर”







