- नवेद शिकोह
सारे फर्ज़ निभाकर मीडिया अपनी प्रतिरोधक क्षमता को मजबूत रखती तो संकट का वायरस उसके अस्तित्व को चुनौती नहीं देता। जितनी भी मंदी होती.. जितनी भी आर्थिक व्यवस्था गड़बड़ाती, जनता के विश्वास के पहियों से मिशन पत्रकारिता की गाड़ी सादगी से चलती रहती। लेकिन दुर्भाग्य कि भारतीय मीडिया ने अपने दायित्यों को भुलाकर खुद की प्रतिरोधक क्षमताओं को इतना कमज़ोर कर लिया कि आज कोरोना का क़हर सबसे ज्यादा मीडिया को घेरे है। भारत में कोरोना महामारी की दस्तक मे ही देश के बड़े-बड़े ब्रांड मीडिया घराने टाटा-बाय-बाय की स्थिति में आ सकते हैं। या सिकुड़ कर सीमित संसाधनों/कम खर्च में अपना अस्तित्व बचा सकते हैं।
सदी की एक बड़ी मुसीबत का ये दौर शायद खर्चीली/दरबारी और सामाजिक सरोकारों से दूर मीडिया की चमक-दमक कम कर दे। कोरोना की सबसे अधिक परेशानियां झेलने वालों में अखबार इंटस्ट्री आगे है।
97% छोटे और मंझोले अखबारों को तो भूल जाइये। ये पूरे तरीक़े से सरकारी विज्ञापनों के सहयोग/सब्सिडी/आर्थिक सहयोग पर निर्भर हैं। सिर्फ सरकारी विज्ञापन ही इनकी ज़िन्दगी है। जबरदस्त आर्थिक मंदी में सरकारें विज्ञापन का सहयोग नहीं दे सकेंगी। संभावना है कि सरकारी विज्ञापन का बजट साठ प्रतिशत से भी कम हो जायेगा। जो बड़े अखबारों के ही हिस्से में सिमटेगा।
ये तो हुयी लघु-मध्यम अखबारों और पत्रिकाओं की बात, पर देश के बड़े-बड़े अख़बार भी अब सिकुड़ते नज़र आने लगे हैं। जो अखबार 24 से 40 पेज के थे वे 12 से 16 पेज में सिमट गये हैं। टाइम्स ऑफ इंडिया से लेकर हिंदुस्तान, नवभारत टाइम्स और अमर उजाला जैसे सभी ब्रॉड समाचार पत्रों का प्रिंट एरिया आधे से भी कम हो गया है। बताया जाता है कि जिसके सिर्फ एक संस्करण की एक लाख से अधिक प्रतियां प्रसारित होती थीं वही अब दस हजार में सिमट गये हैं। इसकी तमाम वजहे हैं। सरकारी और ग़ैर सरकारी विज्ञापन आधे से भी कम हो जाना। डिस्ट्रीब्यूशन में दिक्कत आना। न्यूज़ प्रिंट(अख़बार) के जरिये घरों तक कोरोना वायरस पंहुच जाने के खतरो़ की चर्चाओं या अफवाहों के कारण लोगों का खुद ही अखबार बंद करवा देना। इसके अतिरिक्त न्यूज चैनल्स और डीजिटल मीडिया के जरिये पल-पल की खबरे मोबाइल फोन पर ही प्राप्त हो जाना। इन्हीं कारणों से प्रिंट प्रसार में पिछड़े सभी अखबारों ने अपने अस्तित्व को बचाने के लिए वेब संस्करण/ का दायरा बढ़ा लिया। वाट्सएप संस्करणों के जरिए अखबार वेबमीडिया/सोशल मीडिया में अखबारों ने अपनी मौजूदगी को सक्रिय कर लिया। लेकिन इन प्रयासों से अखबारों का डीजिटल वजूद भले ही बचा रहे पर घटता रेवेन्यू और भी घटेगा, इस बात का खतरा बना हुआ है। मालिकों/प्रकाशकों के पास इसका एक ही रास्ता अमल मे लाना तय है, वो ये कि खर्च कम करने के लिए संस्करण कम हों.. कॉस्ट कटिंग.. अखबार कर्मियो़ की छुट्टी.. इत्यादि इत्यादि।
इसी तरह छोटों को तो भूल जाइए अंबानी-अडानी जैसे बड़े पूंजीपतियों के शेयर वाले बड़े-बड़े न्यूज़ चैनल्स को भी ख़तरे की घंटी सुनाई देने लगी है।

यहां भी कॉरपोरेट और तमाम बिजनेस घरानो़ के विज्ञापनों के अलावा सरकारी विज्ञापन बेहद कम हो गये हैं। इन चैनल़ो में जिन बड़े कॉरपोरेट घरानों का शेयर है वो खुद मंदी के भंयकर खतरों के कारण अपना हाथ कभी भी खीच सकते हैं।
बताया जाता है कि इन बड़े मीडिया घरानों में जो लम्बी अवधि के विज्ञापन पैकेज चल रहे हैं वो आगे बर्करार नहीं रहेंगे। यानी अब विज्ञापनदाता अपने विज्ञापन आगे की समय अवधि के लिए जारी नहीं रखेंगे। यही कारण है कि देश के टॉप न्यूज चैनल्स के महत्वपूर्ण बुलेटिन और प्रोग्राम बंद होने लगे हैं।
ये तो बात हुई स्थितिवश मीडिया के शरीर को ग़िजां (भोजन)ना मिलने से उसके कमजोर हो जाने के खतरो़ की। लेकिन खुद के कमजोर चरित्र से मर रही मीडिया की आत्मा के कारण जनता का अविश्वास टूटना ज्यादा नुकसानदेह साबित हो रहा है।
नैतिक जिम्मेरियों और सामाजिक सरोकारों से दूर होती पत्रकारिता का इकबाल नहीं रहा। ब्लेकमेलिंग या नत्मस्तक जैसे दो सिरों वाला आचरण-व्यवहार.. चाटूकारिता, दरबारी रंग, झूठ और नफरत फैलाने के लिए बदनाम मीडिया की कमजोर प्रतिरोधक क्षमता से कोराना की मुसीबतें मीडिया पर पूरी तरह से हमलावर हो गयीं है।
इस नाजुक वक्त में कोरोना सेनानियों में शामिल ये वर्ग अपनी जिम्मेदारी किस तरह निभा रही है सब वाकिफ है। दुनिया सब देख रही है। जागरूकता फैलाने से लेकर सही सूचनाएं/जानकारियां कौन दे पा रहा है। जनता की तरफ से सरकार से कौन सवाल पूछ रहा हैं !
सब देख रहे हैं कि सुपर पावर अमेरिका की मीडिया जनता की सही नुमाइंदगी करते हुए राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से किस तरह से आंखों में आंखें डालकर सवाल कर रही है –
कोरोना महामारी से बचने के लिए अमेरिका की सरकार ने क्या-क्या इंतेजाम किये ह़ै !
बतायें टेस्ट और दवा की कमी कब तक दूर होगी !
जनता को साफ-साफ बताइये कि किन-किन लापरवाहियों से इस महामारी ने अमेरिका में प्रवेश किया !
लेकिन हमारी भारतीय मीडिया जो स्वतंत्रता और निष्पक्षता के लिए जानी जाती थी वो आज कहां खड़ी है। झूठ फैलाने, नफरत फैलाने और अफवाह़े फैलाने के उसपर आरोप लग रहे हैं।
बड़े- बड़े न्यूज़ चैनलों पर फेक न्यूज़ के आरोप के साथ एफआईआर दर्ज हो जाना बड़ी बात है। मीडिया घरानों को बार-बार सरकारों द्वारा गलत, झूठी और अपुष्ठ खबरें ना प्रस्तुत करने की ताकीद करना बड़ा इशारा है। जब सरकारें, न्यायालय और पुलिस बार-बार मीडिया को खबरदार कर रहे हैं तो अंदाजा लगाइये कि कोरोना महामारी के क़हर के दौरान मीडिया अपनी कितनी जिम्मेदारी निभा रही होगी ! अंदाजा ये भी लगाइये कि आम जनता का मीडिया के प्रति कितना विश्वास बचा होगा।
आज भले कोरोना सेनानियों ( इस महामारी से लड़ने वालों) में मीडिया कर्मियों को शामिल किया गया हो लेकिन जरा सोचिये कि इस महामारी से लड़ाई में मीडिया कितनी गंभीर रही ! कोरोना की हलचल के करीब पंंद्रह दिनों के दौरान देश के टॉप टेन मे शामिल न्यूज चैनल्स, अखबार और वेबसाइट्स इत्यादि पर कोरोना संबंधित मामलों में पंद्रह से अधिक एफआईआर दर्ज हो गयीं।
दिसम्बर से जनवरी के दौरान जब दुनिया में कोरोना वायरस का आतंक शुरु हो चुका था उस वक्त हमारे देश की सरकार इसको लेकर गंभीर नहीं हुई। करीब ढाई महीने सरकार सोती रही। विदेश से हज़ारों लोग बिना रोकटोक आते रहे। यहां दिल्री चुनाव.. दिल्ली दंगों.. शाहीनबाग.. जेएनयू.. जामिया… मध्य प्रदेश जोड़तोड़ और ट्रंप की खातिरदारी की व्यस्तता में कोरोना के गंभीर संकट से बचने की जरा भी तैयारी नहीं हुई।
मीडिया की जिम्मेदारी एक सशक्त विपक्ष जैसी भी होती है। यदि भारतीय मीडिया सरकार को सचेत करती तो शायद सरकार जाग जाती और भारत इस महामारी को दाखिल ही नहीं होने देता। लेकिन ऐसा नहीं हुआ।
एहतियात, सत्यता और निर्भीकता के साथ सीमित संसाधन और कम खर्च में चल रही वेब/डीजिटल मीडिया तमाम सरकारी निगरानियों के बीच भी मौजूदा हालात में मुख्यधारा की मीडिया साबित हो गई है। जबकि ज्यादा खर्च की बेड़ियों में बंधी टीवी मीडिया खतरे मे है। नैतिक जिम्मेदारियों.. निष्पक्षता.. मिशन को बिल्कुल ही भुला कर टीवी पत्रकारिता स्टूडियो के अंदर की तू-तू.मैं-मैं मे बेहद कमजोर पहले ही हो चुकी है। जनता का विश्वास खोने के बाद अब मंदी की आफत में व्यवसायिक जरूरत़ो के फिसलते स्त्रोत भी टीवी मीडिया को और भी कमजोर बना सकते हैं।
करीब तीन-चार दशक के जीवनकाल में शिखर पर आने के बाद डाउनफॉल की तरफ बढ़ रही इलेक्ट्रॉनिक (टीवी)मीडिया तो छोड़ये ये बुरा वक्त करीब सौ साल से ज्यादा पुराने प्रिंट मीडिया के अस्तित्व को भी चुनौती दे रहा है।
आज देश-दुनिया में महामारी का जो मातम मचा है शताब्दी में दो चार बार ही इस तरह की त्रासदी का सामना करना पड़ता है। विश्वयुद्ध.. इमरजेंसी.. इंदिरा गांधी की हत्या जैसी सदी की अत्यंत महत्पूर्ण घटनाओं में अखबारों की रीडरशिप में अस्सी प्रतिशत इज़ाफा होता है। कोरोना महामारी भी इस प्रकार ही सदी की अत्यंत महत्वपूर्ण घटना हैं। लेकिन ये क्या ! ऐसे मौकै पर अखबारों का प्रसार अस्सी प्रतिशत बढ़ने के बजाय अस्सी फीसद घट गया।
सबसे बड़े, विश्वसनीय और प्राचीन मीडिया के माध्यम अखबार का अस्तित्व ही खतरे में पड़ता दिखने लगा।
बीड़ी, सिगरेट और तस्बाकू खाने वाले.. शराब पीने वालों की प्रतिरोधक क्षमता इतनी कमजोर हो जाती है कि वो किसी वायरस रूपी मुसीबत से लड़ नहीं पाते और फिर ऐसे में नशा करने वाले का जीवन खतरे में पड़ जाता है। ऐसे ही इधर भी हुआ।
ज्यादा खर्चों की चमक-दमक, झूठ, पक्षपात, पक्षपात, ब्लेकमेलिंग, चाटूकारिता, दरबारी आचरण और व्यवहार, सामाजिक सरोकारों की जिम्मेदारियां ना निभाने.. जैसे कारणों से मीडिया की प्रतिरोधक क्षमता बेहद कमजोर हो गयी। नतीजतन कोरोना ने सबसे पहले इसे ही अपने चपेट में ले लिया।







