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    अपने आरम्भ से ही दूरदर्शन दिशासूचक यंत्र की भूमिका में: आलोक शुक्ला

    By May 15, 2020Updated:May 15, 2020 Current Issues No Comments5 Mins Read
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    Post Views: 766
    • आपकी बात आपके मुद्दों के साथ: न्यूज एंकर आलोक शुक्ला

     

    ये युग टीवी पत्रकारिता में शोर शराबे का काल खंड बन चुका है…टीवी के चैनल बदलते हुए दूरदर्शन पर एक पुराना धारावाहिक देखने लगा…जिसके चलते वर्तमान परिस्थितियों मे दूरदर्शन की प्रासंगिकता पर ध्यान गया तो एक ख़्याल आया कि वाकई इस पर तो विचार मंथन होना ही चाहिए…क्योंकि वर्तमान समय में लगभग सभी पत्रकार इस बात पर तो सहमत हो ही जाएगें कि मीडिया लगातार अपनी गरिमा खोता जा रहा है…इसका कारण सिर्फ ये है कि राजनीतिक हस्तक्षेप लगातार निजी मीडिया समूहों मे बढ़ रहा है…या यूं कहे कि इस चीज की चुनौती खड़ी हो गयी है कि कैसे राजनीतिक दबाव से मीडिया को बचाया जाए? ..लेकिन इस पर किसी और दिन विस्तार से लिखूंगा..आज का विषय दूरदर्शन की वर्तमान मे प्रासंगिकता पर मंथन है…पहले तो यही विचार आया कि आपको कुछ ऐसे कारण बताऊंगा कि आपको बहुत ही असामान्य और महान लगे ताकि आप भी इस बात पर सहमत हो जाए कि दूरदर्शन आज भी उतना ही उपयोगी और प्रासंगिक है…लेकिन अब अंतिम फैसला ये लिया कि आपको मेरी नज़र में सामान्य ही सही लेकिन वास्तविक कारण बताने चाहिए.

    सबसे पहला और बेहद सुलझा हुआ कारण यही है कि दूरदर्शन एक सरकारी संस्था है और मैं भारत का निवासी हूँ…जहाँ पर सरकारी संस्थाओं को बेहद सम्मानजनक बचपन से ही समझाया जाता है…जिसके चलते इसकी तरफ आकर्षित होना मेरी बाध्यता भी है…लेकिन अगर इसके आगे बढूं तो ये प्रासंगिक है क्योंकि राष्ट्रहित यहां व्यक्तिगत लाभ से बहुत ऊपर होगा…उसकी वजह जनता के प्रति जवाबदेही है.

    दूरदर्शन के पहले लोग सिर्फ अपने देश और समाज को पढ़ते थे और सुनते थे:

    अब आइये आपको अपनी शैक्षिक समझ के आधार पर दूरदर्शन क्यों मेरे हिसाब से ज़रूरी है ये भी बताना चाहूँगा…दूरदर्शन के पहले लोग सिर्फ अपने देश और समाज को पढ़ते थे और सुनते थे…जिसका परिणाम सिर्फ वैचारिक मंथन होता था…लेकिन दूरदर्शन के बाद से लोगों ने अपने भारत के कोने-कोने को देखा, सुना, महसूस किया, समझा…और शायद तब जाकर उत्तरप्रदेश को समझ आया की तमिलनाडु कैसे मेरा अपना ही भारत है…और तभी शायद पूरे भारत को समझ में आया कि पूर्वी भारत मेरे ही भारत का हिस्सा है… वही पूर्वी भारत जहाँ आज भी भारत सरकार की मूलभूत सुविधाएँ पहुंचने की जद्दोजहद कर रही है, वहां पर दूरदर्शन ने पहुँचकर उनकी आवाज़ हम तक पहुंचाई…और अगर मेरी स्मृति बहुत तेज़ है तो जहाँ तक मुझे याद है, मैंने दूरदर्शन से बचपन से लेकर आजतक बहुत कुछ सीखा है, समझा है और जाना है…वो दूरदर्शन ही था जिसने मुझे मेरी संस्कृति से मिलवाया जो सिर्फ मेरे आस-पास की नहीं पूरे भारत में बसती है.

    चाहे रामायण का प्रसारण हो जिससे जुड़कर पूरा भारत जान पाया कि सत्य और असत्य के बीच मे सर्वश्रेष्ठ कौन है? महाभारत से हर कोई ये समझ पाया कि समाज में नारी का सम्मान कितना आवश्यक है?  अलिफ लैला भी आपको याद होगा जिसमें सामाजिक और नैतिक शिक्षा के बहुत सारे पाठ पढ़े जा सकते है…और जंगल बुक का प्रसारण तो ज़रुर याद होगा आज भी, जिसमें जानवरों के प्रति प्रेम की ऐसी शिक्षा आपने पायी होगी जो किसी भी स्कूल या पुस्तक मे नही है.

    वो दूरदर्शन ही था जिसने मुझे आजतक एक भी अवसर नहीं दिया जिसमे मैं ये कह पाऊँ कि इस चैनल ने पूर्वाग्रह से ग्रस्त हो कर कुछ विषय सामग्री मेरे सामने पेश की…

    मीडिया समूहों को अपना सम्मान गंवाने से कोई नही बचा सकता है:

    राज्यसभा टीवी के डिबेट प्रोग्राम आज भी सिविल सेवा की तैयारी करने वाले अभ्यर्थियों के लिए बहुत मददगार है.. साथ ही संविधान की प्रस्तावना में जो लिखा गया है कि हम भारत के लोग…उन लोगों से मुझे दूरदर्शन ने मिलवाया…और उन लोगों में सबसे ज़रूरी था एक किसान जिसकी चर्चा आज भी दूसरी जगहों पर सिर्फ तब होती है जब वो दुःख और क़र्ज़ से परेशान होकर आत्महत्या करता है…लेकिन दूरदर्शन ने अपने जन्म के बाद से ही इन किसानों को फसल के तरीके बताये, तमाम जानकारी दी ताकि वो आगे बढे…तो बहुत ही आसान पहेली है कि दूरदर्शन ने आज अपना जो अस्तित्व बनाया है, उसके पीछे प्रचार-प्रसार से ज़्यादा एक दर्शन है…और वो इस बात पर कायम है कि भूमंडलीकरण के दौर में भी मीडिया की भूमिका और प्राथमिकता समाज के दायरे में है और इसको इसी के लिए काम करना है…नाकि सिर्फ विज्ञापनों की संख्या बढ़ाने के लिए…तमाम मीडिया समूह ये भूल चुके है कि विज्ञापनों की बाढ़ से सिर्फ धन आता है नाकि सामाजिक परिवर्तन…और जहां तक मेरा मानना है मीडिया की पूरी जिम्मेदारी समाज के प्रति ही होनी चाहिए…आप मानें या ना मानें आने वाले समय मे समाज तमाम न्यूज़ एंकरों और पत्रकारों से उनकी निभाई जिम्मेदारी का हिसाब ज़रुर लेगा…और जो इस दौर में सिर्फ़ धन कमाने में व्यस्त हो चुके है…उन मीडिया समूहों को अपना सम्मान गंवाने से कोई नही बचा सकता है.

    भले ही दूरदर्शन एक सरकारी चैनल है लेकिन आपने शायद ही कभी उसमें हिन्दू-मुस्लिम वाली डिबेट, वो भी खुद का गला खराब कर लेने के साथ श्रोता के कानों को क्षति पहुंचाने वाली ध्वनि पर होते नही देखी होगी…साथ ही आपने किसी भी प्रधानमंत्री या बड़े नेता के तारीफों के पुल बनते नही देखे होगें कि ऐसा लगने लगे जैसे कि चैनल नेता जी का ही है.

    कहने को बहुत कुछ है और यही वो बहुत कुछ है जिसके चलते मैं आज भी दूरदर्शन की उपयोगिता पर कोई प्रश्न नही खड़ा कर सकता हूं…हां अगर अवसर मिला तो मैं ज़रूर कुछ सुझाव दूरदर्शन को देना चाहूंगा कि आज भी बहुत कुछ करने को बाकी है और वो अधूरा काम हमारा आज भी इंतज़ार कर रहा है…और सबसे बड़ा बिंदु यही है कि पतले रास्तों पर अगर कोई पहुँचना चाहेगा तो वो सिर्फ दूरदर्शन है…क्यूंकि उस अनछुए जगत में अभी शायद बाज़ारीकरण नहीं पहुँच पाया है.

    कहने का अर्थ यही है कि भारत का निर्माण धीरे-धीरे हुआ है और इसमें दूरदर्शन ने भी काफ़ी भूमिका निभाई है…इसीलिए अपनी बात कवि फ़िराक गोरखपुरी की पंक्तियों से ख़त्म करुंगा..

    सर-ज़मीन-ए-हिंद पर अक़्वाम-ए-आलम के ‘फ़िराक़।
    ‘कारवां बसते गए हिन्दोस्ताँ बनता गया ।।

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