निर्विषेणापि सर्पण कर्त्तव्या महती फणा ।
विषमस्तु न चाप्यस्तु घटाटोपो भयङ्करः।।
विषहीन सर्प को भी अपनी सुरक्षा के लिए अपने फन को फैलाकर भय दिखाना ही चाहिए क्योंकि सांप में विष हो या न हो, उसकी फुंफकार ही दूसरों को डराने के लिए पर्याप्त होती है।
दरिद्रता धीरतया विराजते,
कुवस्त्रता शुभ्रतया विराजते।
कदन्नता चोष्णतया विराजते,
कुरूपता शीलतया विराजते।।।
जिस प्रकार धैर्य धारण करने पर दरिद्रता भी चुभन पैदा नहीं करती, घटिया वस्त्र भी स्वच्छ हो जाने पर पहनने पर बुरा नहीं लगता, घटिया अन्न भी गरम रहने पर स्वादिष्ट लगता है, उसी प्रकार कुरूप होने पर भी अच्छे स्वभाव वाला व्यक्ति अपने सम्पर्क में आने वालों को बुरा नहीं लगता।
धनहीनो न हीनश्च धनिकः सः सुनिश्चयः।
विद्यारत्नेन हीनो यः सः हीनः सर्ववस्तुषु।।
धनहीन होने पर किसी को निर्धन नहीं कहा जा सकता, वह तो निश्चित रूप से धनिक है। जो व्यक्ति विद्यारत्न से हीन है, वह संसार की सभी वस्तुओं से हीन है, अर्थात सबसे बड़ा निर्धन है, क्योंकि सच्चा धन तो विद्या है।







