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    Home»उत्तर प्रदेश

    राष्ट्रभक्ति की जन्मभूमि टिकवांपुर सरकारी बेरुखी की शिकार

    ShagunBy ShagunJuly 24, 2026 उत्तर प्रदेश No Comments4 Mins Read
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    Tikwampur, the birthplace of patriotism, falls victim to government apathy.
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    महाकविभूषण फाउंडेशन ने घाटमपुर तापीय विद्युत परियोजना का नाम बदलने की मोदी से की मांग

    घाटमपुर : राष्ट्रवादी उद्घोष के महाकवि भूषण की जन्मभूमि टिकवांपुर अपने ही देश में अनाथ है। तहसील क्षेत्र के सजेती थानांतर्गत बसा यह गांव कभी देश के पाठ्यक्रमों का हिस्सा हुआ करता था। उत्तर प्रदेश से लेकर मध्यप्रदेश और महाराष्ट्र तक इस नाम की गूंज थी। महाराष्ट्र की धरती पर तो महाकवि भूषण को देवतुल्य माना जाता था। जिस कलम ने औरंगजेब के खिलाफ शिवाजी और छत्रसाल की तलवार को धार दी, उसी कलम की स्याही से सनी मिट्टी आज कूड़े और उपेक्षा में दबी पड़ी है।

    महाकविभूषण फाउंडेशन के अध्यक्ष रवींद्र कुमार मिश्र ‘विपिन’ ने यहां पत्रकारों से बातचीत करते हुए कहा कि कांग्रेस सरकारों के लंबे शासन में टिकवांपुर को जानबूझकर नक्शे से मिटाने की कोशिश हुई। नतीजा है कि बुंदेलखंड से सटा होने के बाद भी यह गांव विकास की हर किरण से वंचित है। यहां विकास नहीं हुआ, विनाश का इंतजार हो रहा है। उन्होंने कहा कि सबसे ज्यादा परेशानी महिलाओं को हो रही है। गांव से अस्पताल इतनी दूर है कि समय पर इलाज न मिलने के कारण अस्पताल पहुंचने से पहले सांसें थम जाती हैं। हर साल प्रसव के दौरान कितनी माताएं काल का ग्रास बन जाती हैं, इसका हिसाब किसी के पास नहीं है। इसी पीड़ा को देखते हुए मैंने अपना नवनिर्मित विशाल पैतृक आवास राज्य सरकार को दान कर दिया है।

    श्री मिश्र ने कहा कि महाकवि भूषण की स्मृति में इस भवन को अविलंब शैया-युक्त प्रसूति केंद्र और अस्पताल में बदला जाए। अगर सरकार में संवेदना बची है तो इस दान को कब्रगाह बनने से पहले जीवनदायिनी बना दे। यह अस्पताल सिर्फ ईंट-पत्थर नहीं होगा, यह भूषण की स्मृति का सबसे बड़ा स्मारक होगा।

    उन्होंने कहा कि जिलाधिकारी कानपुर ने पहल कर महाकवि की जन्मस्थली को अवैध कब्जे से मुक्त कराकर वहां आंगनबाड़ी और पुस्तकालय स्थापित करवाया। यह एक छोटा कदम है। लेकिन, महाकवि की बगिया आज भी गांव की कूड़ेदानी बनी हुई है। लोग उसी पवित्र भूमि पर गंदगी और गोबर फेंकते हैं जहां कभी राष्ट्रभक्ति के बीज बोए गए थे। यह बगिया नहीं, हमारे राष्ट्रीय चरित्र पर लगा धब्बा है।

    उन्होंने कहा कि विकास के नाम पर यहां सिर्फ धोखा हुआ है। हमीरपुर रोड से गांव को जोड़ने वाला एक किलोमीटर का मार्ग पूरी तरह अतिक्रमण की भेंट चढ़ चुका है। लोगों ने उस पर मकान बना लिए हैं। परिणाम है कि कोई बड़ा वाहन गांव तक नहीं पहुंच सकता। कभी आग लग जाए, दमकल भी शायद मातम मनाने ही पहुंच पाएगी। सरकार कब जागेगी? क्या किसी बड़े हादसे के बाद?

    ‘अमृत सरोवर योजना’ के तहत बने तालाब अमृत नहीं, जहर उगल रहे हैं। वे अतिक्रमण और गंदगी से पटे हैं। कई तालाबों में तो आज तक पानी की एक बूंद नहीं गिरी। श्री मिश्र ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को पत्र लिखकर कहा है कि घाटमपुर तापीय विद्युत परियोजना खड़ी है, लेकिन टिकवांपुर के युवाओं के हाथ में सिर्फ बेरोजगारी है। मांग साफ है – इस परियोजना का नाम बदलकर “महाकवि भूषण तापीय विद्युत परियोजना” किया जाए और गांव के लोगों को इसमें रोजगार में प्राथमिकता दी जाए।

    उन्होंने कहा कि टिकवांपुर भीख नहीं मांग रहा। वह अपना सम्मान मांग रहा है। सांसद देवेंद्र सिंह ‘भोले’ ने आदर्श ग्राम योजना के तहत स्मृति द्वार और स्मृति स्थल बनवाकर एक शुरुआत की है, जिसके लिए गांव उनका आभारी है। लेकिन द्वार बनाने से भाग्य नहीं बदलते। अब जरूरत है उस भवन के जीर्णोद्धार और ऑडिटोरियम निर्माण की ताकि महाकवि का विचार जिंदा रहे।

    क्षेत्रीय विधायक श्रीमती सरोज कुरील से उन्होंने अपेक्षा की है कि वे तालाबों के अतिक्रमण, सड़क और स्वास्थ्य जैसी बुनियादी समस्याओं की ओर ध्यान देंगी। उन्होंने कहा कि अगर सरकार को “शिवा बावनी” की एक पंक्ति भी याद है, तो वह इस गांव को कब्र से निकालकर इतिहास में उसका सही स्थान दे वरना आने वाली नस्लें पूछेंगी कि औरंगजेब को ललकारने वाले महाकवि की धरती को तुमने कूड़ेदान क्यों बना दिया?

    Shagun

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