- आलोक शुक्ला
हिन्दी पत्रकारिता दिवस है..पत्रकारिता पर कल तक शर्म करने वाले सभी लोग आज गर्व महसूस कर रहे हैं, वो भी सुबह की चाय के समय से ही… काफी सोचा कि छोड़ो कलम की स्याही यूं ही क्यूँ खर्च करूं?? ..क्या फर्क़ पड़ता है किसी को?? एक तारीख महज़ एक पुराने ऐलान के साथ आज कैलेंडर पर फिर से चमक ही तो रही है…जिसका नामकरण हुआ था हिन्दी पत्रकारिता दिवस के रूप में..फिर यही सोचा कि ज़रूरी नहीं हर चीज़ परिवर्तन ही लाए.. कोई भी विचार एक दृष्टि भी तो प्रदान कर सकता है.
इसलिए सबसे पहले आपको ढेरों शुभकामनाएं.. हां-हां, आप सभी को जो भी पढ़ रहे हैं और उनको भी जो इसमे एंगल ढूंढ रहे हैं या ये सोच रहे कि आगे क्या लिखा होगा?…कहीं किसी और का कॉपी पेस्ट तो नहीं है? हो ही नहीं सकता है.. विचारों के मामले मे बचपन से किराये की सोच का आदी नहीं रहा हूं…तो जो भी आप पढ़ेगें, वो पूरी तरह से मेरे अपने विचार होंगे।

आज हिंदी पत्रकारिता दिवस है तो गुरुर हर भारतीय को होना चाहिए, ना कि महज़ हिन्दी कलम को पकड़ने वाले लेखकों को.. क्यूंकि आप किसी भी परिवेश से आते हो… किसी भी भाषा को बोलते हो, लेकिन आपकी एक पहचान हिन्दुस्तानी की है.. वही हिन्दुस्तान जिसमें हिन्दी पत्रकारों ने बंद कमरों में छिपाकर क्रांति को बड़ा किया और भगत-सुखदेव-चन्द्रशेखर जैसे महान आज़ाद क्रांति के महापुरुषों को इस देश की धरती के ऊपर खड़ा कर दिया.. पूरा मुल्क अगर इतिहास को पढ़ेगा तो जान पायेगा कि तमाम भाषाओं में पत्र छपते थे…लेकिन हिन्दी पत्रों का उपयोग सबसे व्यापक हुआ.. और उन्होंने क्रांति को आजादी का रास्ता दिखाया.. हालांकि गुरुमुखी, उर्दू, इंग्लिश और हिंदी सबमें मे ही क्रांतिकारी आपसी सम्वाद करते थे…लेकिन आज मुझे हिन्दी पत्रकारों की तारीफ ज्य़ादा करनी होगी क्यूंकि कैलेंडर में चमकती हुई तारीख का यही आदेश है.
ये हिन्दी पत्रकार ही थे जो कठोरता से अंग्रेज-अंग्रेजी और उसके विधानों का विरोध करते थे..तभी बड़े साहब यानी गवर्नर जनरल को कठोर ऐक्ट बनाने पड़े थे.. पत्रकार कारागार मे डाले गए, पीटे गए लेकिन अब पत्रकार ठहरे ढीठ…जब अंग्रेज सामान ले जायें या सीलिंग कर दें..तो कहीं और से, किसी दूसरे नाम से छपाई शुरू कर देते.. अंग्रेजो ने अंत मे यही सोचा कि ऐसे तो मानेंगे नहीं, तो फिर कुछ रियायतें देकर कहा कि प्रकाशन की जगह और प्रकाशक का नाम छपना चाहिए और शासन के विरूद्ध या भड़काऊ कुछ भी नहीं छापना है.. क्या लगता है आपको मान गए होगें ये पत्रकार?????
अजी ना ना ना.. बिल्कुल नहीं..ये नहीं माने…अजीब संयोग ही कहा जाएगा कि पहले हिन्दी अख़बार का नाम उद्दंड मार्तण्ड था…नाम से ही ज़ाहिर है कि हिन्दी पत्रकार अंग्रेजों की नाक मे हमेशा दम करते रहे.. और आजादी तक सबको समझाते रहे, जूझते रहे और कम आमदनी पर भी गर्व से खद्दर के कुर्ते की ऊपरी जेब में एक लाल पेन लगाकर गलियों मे घूमते रहे….गरीबी में चल बसे लेकिन अपनी कलम को अंत तक सरस्वती मानते रहे…कभी कलम की स्याही को लाल के अलावा किसी अलग रंग का नही होने दिया…एक विद्वान के लहज़े में कहूं तो पूंजीवादी अर्थव्यवस्था में भी पूंजी को सर्वस्व नही माना। सर्वहारा या प्रोलितारियत समाज की चिन्ता उनको और उनकी कलम को हमेशा बनी रही। जिन युवा पत्रकारों को सर्वहारा समाज का पूरा ना पता हो तो कृपया इसको पढिए। ये जानना आपकी पत्रकारिता के लिए बेहद ज़रुरी है।
साल 1947 भी आ गया और आज़ाद हुए हम.. जश्न मनाया हमनें कि अब तो खुलकर लिखेंगे, खुल कर आवाज़ उठाएंगे.. लेकिन अब अगर पीछे मुड़कर मैं देखता हूं तो नज़ारा कुछ ऐसा है जैसे सुबह-सुबह नदी के किनारे की धुंध.. ऐसी धुंध जिसने अब शायद सूरज से मिलना छोड़ दिया है…या यूं कहें कि अब सूरज इस किनारे पर चमकता ही नहीं है.. एक अजीब सी रेस चल रही है….एक दूसरे की पत्रकारिता को ही नीचा दिखाने की रेस.. नकल कर लेने की रेस.. रिपोर्टर, एंकर और सम्पादक के बीच प्रतिष्ठित बनने की रेस.. TRP आप खुद ही जोड़ लीजिए अपनी गणित के हिसाब से… तमाम ऐसे पहलू जिनका अब पत्रकारों की लेखनी से कोई संबंध नहीं है…या तो वो चिल्ला रहे है या किसी अपने स्वार्थ के चलते ख़ुद को 100 टका शुद्ध पत्रकार होने का ढ़ोल पीट रहे है.
कहते है कि बड़ो को इशारा काफी और बच्चों को गुब्बारा काफी…इशारा मैंने कर दिया है कि हिंदी पत्रकारिता अब तक एक संजीविनी की तरह काम करती आयी है…जिससे लक्ष्मण की मूर्छा टूटी थी…आज भी ये संजीविनी ही है, बस अब हनुमान रुपी पत्रकार नही है जो मूर्छित पडी हुयी पत्रकारिता को होश में लाने के लिए इस संजीविनी को ढूंढ कर ला सके।
अंत मे बस अपने तमाम सीनियर और जूनियर कलम के धनी पत्रकारों को यही कहूंगा कि पेशे के साथ हमेशा इंसाफ कीजिएगा….जिस दिन ये लगने की अब तो इंतहा हो गयी…छोड दीजिएगा इसे..और भी तमाम रास्ते है पैसे कमाने के….यकीन मानिए सुकून बहुत रहेगा जीवन में…जाते जाते कवि अवतार सिंह संधू ‘पाश’ को पढ़ते जाइए…धन्यवाद – (लेखक आलोक शुक्ला न्यूज एंकर हैं)
सबसे खतरनाक होता है
मुर्दा शांति से भर जाना
तड़प का न होना सब सहन कर जाना
घर से निकलना काम पर
और काम से लौटकर घर जाना
सबसे खतरनाक होता है
हमारे सपनों का मर जाना







