जी के चक्रवर्ती
अगर देखा जाये तो लद्दाख में भारत और चीन का विवाद काफी बड़ा है और सुलझने के आसार पर फिलहाल तो प्रश्नचिन्ह ही है लेकिन यह काफी संतोष की बात है कि भारत और चीन के संबंधों में करीब महीने भर से लगातार बढ़ता कड़वाहट का दौर अब कम होता दिखाई दे रहा है। पूर्वी लद्दाख में चीन की सेना ढाई किलोमीटर पीछे हट गई है। मीडिया के हवाले से सैन्य सूत्रों का यह भी कहना है कि चीनी और भारतीय सेनाओं ने गलवान, हॉट स्प्रिंग और गश्त के क्षेत्र पीपी-15 से अपने कुछ सैनिक वापस बुलाए हैं और साथ ही कुछ अस्थायी ढांचों को भी हटाया गया है।

दरअसल दोनों देशों के बीच तनाव को चीन ने जिस सीमा तक पहुंचा दिया था, उसमें ये कदम उठाए जाने बहुत जरूरी थे। आज जब वैश्विक रूप से प्रजातांत्रिक शासन पद्धति का दौर स्थापित हो चुका है, गिनती के देशों में ही इससे इतर व्यवस्था काम कर रही है तो ऐसे में चीन का साम्राज्यवाद और इसके लिए विस्तारवाद का अभियान खुद उसके लिए नुकसानदेह साबित हो सकता है और वह भी इस बात को ध्यान में रखते हुए कि अपने अभियानों को सही साबित करने के लिए उसके द्वारा दी जाने वाली दलीलें किसी भी तरह से नहीं टिकतीं। यह भी सही है कि चीन का ये कदम कोई नया नहीं है बल्कि काफी पहले से उसके ये अभियान चल रहे हैं जिनकी विश्व में किसी भी तरह की स्वीकार्यता नहीं है और आज के युग में हो भी नहीं सकती है।
अब विस्तारवाद की तो कोई बात ही नहीं रह गई है। इसकी जगह केवल लोकतांत्रिक ढंग से शासन पद्धतियां चल रही हैं और उनके ही माध्यम से अपने-अपने देशों को आगे बढ़ाने की कोशिशें की जा रही हैं। हालांकि चीन के पीछे हटने को यह नहीं माना जा सकता कि उसने वास्तविकता को स्वीकार कर लिया है क्योंकि चीनी विदेश मंत्रालय का कहना है कि दोनों देश वास्तविक नियंत्रण रेखा पर शांति कायम रखने और बातचीत के जरिए गतिरोध को सुलझाने पर सहमत हैं। यानी मुद्दा अभी उसने बनाए रखा है और कोई ताज्जुब नहीं कि मौका मिलते ही वह अपने पुराने रुख पर एक बार फिर आ जाय। फिर भी, यह देखते हुए कि फिलहाल उसने अपनी फौज को पीछे हटाया है, उम्मीद तो जगती ही है।








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