पूर्वी लद्दाख सीमा पर लगातार तनावपूर्ण परिस्थितियों के बाद आखिरकार भारत-चीन की सेनाओं के बीच टकराव वाले स्थानों से हटने पर सहमति बनी। दोनों देशों के सैन्य प्रतिनिधिमंडलों के बीच 11 घंटे तक चली वार्ता में तय हुआ कि दोनों ओर से सेनाएं टकराव वाले सभी स्थानों से पीछे लौट जाएंगी। यह निर्णय लिया गया कि दोनों पक्ष पूर्वी लद्दाख में टकराव वाले सभी स्थानों से हटने के तौर तरीकों को अमल में लाएंगे।
दोनों देशों के लिए इसे अच्छी खबर कहा जा सकता है। हालांकि पिछले लम्बे अनुभव यह बताते हैं कि चीन अपनी ही बात पर खरा नहीं उतरता है तथा मौका मिलते ही अपना छिपा एजेण्डा लागू करने के लिए हर संभव कोशिश करने में जुट जाता है। इसलिए भारत को चौकन्ना रहने की जरूरत भी है। दूसरी बात यह कि चीन की हरकत पर इस बार पूरा देश लामबंद हो गया था और उसे किसी भी तरह से सबक सिखाने की भावना यहां व्याप्त हो गई थी। सैन्य कार्रवाई से लेकर आर्थिक नाकेबंदी तक के कदम उठाने की मांग जोर पकड़ने लगी थी।
चीनी सामानों के बहिष्कार का दौर शुरू हुआ तो चीनी ठेकों को रद्द करने की कार्रवाई भी शुरू हो गई। इसी बीच संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में भारत को अस्थाई सदस्यता मिलने से इस विश्व संस्था में भारत की आवाज और बुलंद हुई तथा विश्व स्तर पर चीनी कार्रवाई की जमकर निंदा भी शुरू हो गई। चीन के साथ एक बात यह भी प्रमुख रूप से स्पष्ट होती जा रही है कि यह अपनी सीमा के साथ लगे देशों को किसी न किसी रूप में कमजोर करके वहां अपना शासन स्थापित करना चाहता है।
ताइवान, हांगकांग का उदाहरण सबके सामने है ही, चालबाजी करके वह पाकिस्तान, नेपाल, म्यांमार, बांग्लादेश व श्रीलंका को भी अपने प्रभाव में लेने के लिए कार्रवाई कर रहा है। इसके लिए इन देशों में विकास परियोजनओं को अस्त्र बना रहा है जिनकी आड़ में वह भारत की घेरेबंदी में जुटा हुआ है। चीन के इस विस्तारवादी रवैये को देखते हुए भारत के लिए जरूरी हो गया है कि वह उसके प्रति हमेशा सतर्क व सावधान रहे।







