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    स्मृतियों के झरोखे से: अटल जी चौकन्ने होकर तुरन्त ही पूछने लगे, ‘‘कौन है ये आशा शैली? किसकी बात हो रही है भाई।’’

    ShagunBy ShagunAugust 16, 2020 Hot issue No Comments5 Mins Read
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    • आशा शैली

    बात 1983 के किसी दिन की है। माहौल तो सोगवार था ही, क्योंकि मेरे पति को दुर्घटनाग्रस्त हुए अधिक समय नहीं हुआ था। उस समय मेरी आयु मात्र चालीस वर्ष थी। सभ्यता के नाम पर निपट खिलंदड़ी। ऐसे ही समय हिमाचल में किन्हीं राजनैतिक गतिविधियों के कारण आदरणीय अटल जी का आगमन मेरे गृहनगर रामपुर बुशहर में हुआ।

    यहाँ यह स्पष्ट करना भी अति आवश्यक है कि भारतीय जनता पार्टी, अपने प्रारम्भिक दौर में जब जनता पार्टी के रूप में अस्तित्व में आई उस समय मैं सामाजिक सरगर्मियों में लिप्त थी अतः मैंने तत्कालीन जनता पार्टी की सदस्यता ली और शान्ता सरकार में कुछ दायित्व भी मेरे पास रहे। जिनमें प्रदेश कार्यकारिणी की सदस्यता एवं महिला शाखा की प्रदेश सचिव का पदभार भी मेरे पास था। ऐसे में शान्ता सरकार के मंत्रियों से सम्पर्क होना सहज स्वाभाविक था। कुछ मंत्रियों से निकटता भी रही है जिनमें से अपने समय के दबंग शिक्षामंत्री दौलतराम चौहान भी थे।

    यही दौलतराम चौहान जब कार्यवश मान्य श्री अटल बिहारी वाजपेयी जी के साथ रामपुर आए तो वहाँ कार्यकर्ताओं में मुझे न पाकर उन्होंने मेरी अनुपस्थिति का कारण पूछा। उन्हें पता था कि मैं किसी भी बैठक से कभी भी अनुपस्थित नहीं रही। अतः उनका प्रश्न स्वाभाविक था।
    उत्तर में उन्हें सारी जानकारी दी गई। वाजपेयी जी, जो उनके पास ही बैठे थे चौकन्ने होकर तुरन्त ही पूछने लगे, ‘‘कौन है ये आशा शैली? किसकी बात हो रही है भाई।’’

    मंत्री जी ने बताया कि ये हमारी कार्यकर्ता हैं। उस समय रामपुर बुशहर, जो कि पूर्व मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह का गृह नगर है, में भाजपा का कार्यकर्ता होना बड़े जीवट का काम था। क्योंकि वहाँ की जनता वीरभद्रसिंह को राजा साहब ही पुकारती है और आज भी अपने राजा का बहुत सम्मान करती है। अन्तर इतना पड़ा है कि आज भाजपा का वहाँ अच्छा-खासा प्रभाव है।

    आप कहेंगे कि यह क्या राजनीति छेड़ दी, पर इस संस्मरण के लिए यह बताना परम आवश्यक है। महिला तो दूर, पुरुष भी वीरभद्र सिंह के अतिरिक्त कुछ नहीं मानते थे। ऐसे में एक स्त्री का विपक्ष में बढ़-चढ़कर भाग लेना किसी अजूबे से कम नहीं था।

    सारी कहानी जानने के बाद वाजपेयी जी का आदेश हुआ कि यदि हमारी कार्यकर्ता हैं तो हमें इस विपत्ति के समय उनके घर चलना चाहिए न कि उन से शिकायत करें कि वे क्यों नहीं आईं। मेरा घर शहर से सोलह किलोमीटर दूर गौरा नाम के छोटे से गाँव में था, जहाँ मेरा खुद का सेब का बाग था।

    दूसरे दिन ही चार जीपों में, सारा काफिला मेरे घर पर था। घर के नीचे जीपें रुकने की आवाज़ से चौंक कर मैं बाहर निकली तो सबको अपने घर की चढ़ाई चढ़ते देखा। भला वाजपेयी जी को देखकर किसे होश रहता, आपनी आँखों पर ही विश्वास नहीं हो रहा था। यदि दौलत राम चौहान एवं स्थानीय कार्यकर्ता साथ न होते तो मैं अपनी खुद की आँखों पर भी विश्वास न कर पाती।

    वाजपेयी जी ने बड़े ही स्नेह से मेरी पीठ थपथपाई और मुझे हिम्मत रखने को कहा। पर मैं डॉक्टरों के दुर्वव्यहार के कारण भरी बैठी थी। जमाना इतना मंहगा नहीं था, अतः डॉक्टर ने शव परीक्षण के लिए तीन दिन लटकाया था। अंत में पाँच सौ लेकर शव परीक्षण किया था, पति की मृत्यु का क्षोभ और डॉक्टर का व्यवहार कहीं भीतर तक आहत किए थे।

    मैंने चौहान जी के सामने अपना त्यागपत्र रख दिया, जिसे वाजपेयी जी ने उठाकर एक नज़र देखा और काग़ज़ के टुकड़े करके मेरे हाथ पर रखते हुए बोले, ‘‘जला दो इन्हें। हम यहाँ त्यागपत्र लेने नहीं आए हैं। क्यों जाने देंगे हम आपको अपने से दूर? अब तो आपको और अधिक काम करना है। कैसे समय बितायेंगी आप? बच्चे तो बड़े हो गए हैं।’’ और मेरी पीठ पर एक हल्का धौल धर दिया। उनके साथ एक महिला राज्य मंत्री भी आई थी। दौलत राम चौहान ने बात बदलते हुए कहा, वाजपेयी जी, ‘‘ये कवयित्री भी हैं, दो कवि एक स्थान पर बैठे हैं तो हो जाए कुछ।’’

    यह सच है कि मुझे इससे पहले वाजपेयी जी के कवि होने का पता भी नहीं था। ख़ैर सब के आग्रह पर वाजपेयी जी ने छोटी-छोटी कुछ कवितायें सुनाईं और मुझसे भी सुनीं। मेरी कविता क्या थी, बस पति विछोह का गुबार था। पर उसे भी उन लोगों ने खूब सराहा। वहाँ से वे अपनी दत्तक पुत्री के बाग ;जो मेरे घर से आठ कि.मी. की दूरी पर थाद्ध से होते हुए किन्नौर चले गए।

    जिस दिन वे किन्नौर से वापस लौटे उस दिन मैं कार्यकर्ताओं के साथ रामपुर में उपस्थित रही। वहीं यह सारी कहानी कार्यकर्ताओं द्वारा मुझे पता लगी। वहाँ किसी ने कह दिया कि इनका क्या है, कभी कांग्रेस में जाती हैं तो कभी बीजेपी में। इतनी बात मेरे कान में पड़ते ही मेरा आपे से बाहर होना तो तय ही था। ताव में आकर मैंने भी कह दिया, ‘‘कोई माई का लाल मेरा एक भी फार्म निकाल कर दिखा दे कांग्रेस का तो पाँच हज़ार रुपए दूँगी।’’

    बहुत चौकन्ने रहते थे अटल जी, तुरन्त हमारी तरफ को घूम गए, मुझे पास बुलाकर पूछने लगे, ‘‘किसने कहा आप से यह सब?’’

    मेरे मुँह से बिना देर के निकला ‘‘फूड इंस्पेक्टर ने’’
    ‘‘फूड इंस्पेक्टर को हमने मिलावट रोकने के लिए रखा है या मिलावट करने के लिए?’’ उनके विनोदी उत्तर से पूरा हॉल ठहाकों से गूँज उठा। साथ ही वाजपेयी जी भी ठट्ठाकर हंस दिए।

    शत शत नमन ‘भारत रत्न’ को
    उजियारे में, अंधकार में,
    कल कहार में, बीच धार में,
    घोर घृणा में, पूत प्यार में,
    क्षणिक जीत में, दीर्घ हार में,
    जीवन के शत-शत आकर्षक,
    अरमानों को ढलना होगा।
    कदम मिलाकर चलना होगा।

    Shagun

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