चीन के अड़ियल रुख को देखते हुए फिलहाल बातचीत से कोई समाधान निकलेगा ऐसी सम्भावना कम ही है। मालूम हो कि यदि अगर कोई भी गतिरोध लंबा खिंचे तो उसका मतलब यह है कि उसको हल करने की सम्यक कोशिशें नहीं की जा रही हैं। भारत और चीन के बीच की भी यही स्थिति है। दोनों देशों के बीच बीते साल पांच मई से पूर्वी लद्दाख में सैन्य गतिरोध चल रहा है । गतिरोध खत्म करने के लिए दोनों देशों में कई दौर की सैन्य और राजनयिक स्तर की कई वार्ताएं हो चुकी हैं लेकिन ये सभी बेनतीजा ही रही हैं।

इस बारे में भारतीय विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने कहा है कि अब तक हुई नौ दौर की वार्ता का कोई खास प्रभाव दिखाई नहीं दिया है। उन्होंने कहा कि एलएसी पर चीनी सैनिकों के पीछे हटने का मुद्दा बहुत पेचीदा है। हालांकि उन्होंने यह भी कहा है कि भारत और चीन की सेना के शीर्ष कमांडर पूर्वी लद्दाख में सैनिकों को पीछे हटाने की प्रक्रिया को लेकर भविष्य में वार्ता का दौर जारी रखेंगे। इस क्षेत्र में गतिरोध दूर करने के लिए हमारे सैन्य कमांडर काम कर रहे हैं।

उन्होंने कहा कि सेना के कमांडर अब तक नौ दौर की वार्ताएं कर चुके हैं और हमें लगता है कि कुछ प्रगति हुई लेकिन इसे समाधान के तौर पर नहीं देखा जा सकता। जाहिर है कि नौ दौर की वार्ताओं के बाद भी कोई समाधान न निकलने का मतलब ही यह है कि इनका कोई खास प्रभाव नहीं रहा है। इसके लिए वस्तुतः चीन हठवादी रवैया जिम्मेदार है जो अपनी विस्तारवादी नीति के तहत अधिकाधिक जमीन हड़पना चाहता है और इसके लिए कुछ भी करने के लिए तैयार है।
इसीलिए वार्ताओं में बेमतलब के तकर्षं की सहायता लेकर वह इनको किसी नतीजे तक पहुंचने देने में रोड़ा अटकाने का काम कर रहा है। इसके लिए जरूरी है कि भारत उसके ऊपर कूटनीतिक दबाव डालने का काम तेज करे ताकि वह मुद्दों के हल के लिए सकारात्मक रूप से व्यवहार करे तथा समस्या का समाधान निकल कर सामने आ सके।







