- मालिनी अवस्थी
बनारस एक नगर,शहर, एक धाम नहीं, एक संस्कृति का नाम है। जीना सीखना हो तो बनारस में कुछ दिन गुज़ारिये, बनारसी हो कर रहिए! शिवरात्रि महोत्सव की अंतिम निशा जब मैंने मंच को प्रणाम कर सुर का आह्वाहन किया, उस समय गंगा किनारे हजारों की संख्या में काशी के प्रबुद्ध रसिक श्रोताओं का अपार जनसमूह देखकर मन गदगद हो गया।
दिल्ली मुंबई जैसे मेट्रोज में आज भी वीकेंड देखकर कार्यक्रम रखने वाले वालों को काशी में आकर देखना चाहिए कि दिन कोई भी हो,श्रोता और दर्शक सिर्फ कला के गाहक हैं। उस दिन बाबा ने कृपा करी गुरु ने कृपा की, लोकनिर्मला सम्मान के आयोजन से थकी हुई मैं जब छह घंटे का सफर करके काशी पहुंची,तो मेरी सारी थकन,घाट पर गजगजाई भीड़ देखकर स्वाहा हो गई, लोग ही लोग,महिलाएं बच्चे, काशी के अनेक विद्वान कलाकार सामने श्रोता के रूप में बैठे हुए और फिर मैं बेसुध हो सिर्फ गाती रही नाचती रही…
बाबा के लोकभजन, फाग, होरी,जोगीरा, रसिया लांगुरिया, झूमर, चैता, इधर मैं थी…बाबा काशी विश्वनाथ जी की छाया में और उधर सामने से निरंतर निरंतर हर हर महादेव का जयघोष जो मेरे कानों में तब तक गूंजता रहा जब तक मैं मंच से विदा नहीं हो गई….







