जी के चक्रवर्ती
एक बार फिर से हमारे देश की न्यायिक व्यवस्था पर उंगली उठाई गयी है, जब 28 जनवरी, 2021 को इलाहाबाद हाईकोर्ट ने रेप के एक झूठे मामले में उत्तर प्रदेश के जिला ललितपुर के निवासी 43 वर्षीय विष्णु तिवारी पर आरोप लगा था उसमें उसे निर्दोष करार दिया गया था।
विष्णु तिवारी नाम का यह व्यक्ति जब मात्र 23 वर्ष का था उस समय उसे इस मामले में गिरफ्तार कर जेल में डाल दिया गया था लेकिन हमारे देश की न्यायिक प्रणाली ने उस व्यक्ति को उस मामले से वरी होने के आदेश देने में पूरे दो दशकों से भी अधिक का समय लगा दिया। अब यहां यह प्रश्न उठता है कि उस व्यक्ति ने उसके जीवन में महत्वपूर्ण स्थान रखने वाले अपने निकट संबंधियों यहां तक कि अपने भाई, माता- पिता जैसे महत्वपूर्ण लोगों को एक-एक कर खोता चला गया, ऐसे में क्या यह कहना गलत होगा कि जिस व्यक्ति ने उस पर यह आरोप लगाया था उस व्यक्ति को उस पर झूठे मामले में फसाने के लिये प्रयाश्चित के तौर पर उतने ही दिनों की सजा दिया जाना शायद उचित होता क्यूंकि इस तरह एक बार दूसरे व्यक्ति पर गलत या झूठे आरोप लगाने से पहले अलबत्ता व्यक्ति सौ बार सोचता या इस तरह की हरकत करने की दूसरे लोगों को हिम्मत ही नही होती।
हमारे देश की न्यायिक व्यवस्था की जब बात की जाये तो यहां पर किसी मामले में न्याय मिलने के समय का विष्णु तिवारी जैसा केवल एकमात्र उदाहरण नहीं है बल्कि वर्ष 2006 में उन्नाव के शंकर दयाल नाम के एक व्यक्ति को अपने मुकदमे में न्याय पाने के इंतजार में अपने जीवन के सुनहरे 45 वर्ष जेल में ही व्यतीत करना पड़ा था, उस व्यक्ति पर किसी अन्य पर चाकू से वार करने का आरोप लगा था, लेकिन यदि वह इस मामले मे दोषी भी करार दिया जाता तो उसे अधिकतम तीन ही वर्षों तक की ही सजा मिलती ऐसे में फिर एक बार यह प्रश्न उठता है कि जो जुर्म किसी के द्वारा किया ही नही गया हो उसे उस जुर्म में अग्रिम सजा भुगताने के लिये आखिर कौन जिम्मेदार है?







