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    Home»इंडिया

    उत्तर प्रदेश की सियासत में नई इबारत लिख सकता है ‘भागीदारी संकल्प मोर्चा’

    ShagunBy ShagunJuly 17, 2021Updated:July 17, 2021 इंडिया No Comments7 Mins Read
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    बीजेपी से ही सभी प्रमुख दलों की सीधी टक्कर, भागीदारी संकल्प मोर्चा के घटक दल अगर एकमत रहे तो दे सकते हैं चौंकाने वाले परिणाम

    राहुल कुमार गुप्त

    जैस-जैसे उत्तर प्रदेश में लोकतंत्र के महारण का आगाज हो रहा है वैसे-वैसे सियासी दलों में चहल-पहल और उथल-पथल में तेजी देखने को मिल रही है। सूबे में चार प्रमुख दलों के अलावा अब कुछ छोटे दल भी उभर कर सामने आये हैं। जो इस महारण में अपनी भागीदारी सुनिश्चित कराने के लिए प्रतिबद्ध हैं।

    इन छोटे दलों में महत्वपूर्ण यह है कि यह गैर यादव पिछड़ी जातियों का नेतृत्व कर रहे हैं और सत्ता में बराबरी की भागीदारी करना चाहते हैं। इसके लिए जन अधिकार पार्टी के प्रमुख (कुशवाहा, शाक्य, सैनी, मौर्या बिरादरी के बड़े नेता) पूर्व कद्दावर मंत्री बाबूसिंह कुशवाहा, राजभरों के बड़े नेता पूर्व मंत्री ओमप्रकाश राजभर ने मिलकर लगभग दस दलों का भागीदारी संकल्प मोर्चा तैयार किया है जिसमें सभी पिछड़ी जातियों के लिए सत्ता में भागीदारी का संकल्प लिया गया है। इस मोर्चे में मुस्लिमों के फायर ब्रांड नेता ओवैसी के आने से भागीदारी संकल्प मोर्चा को और मजबूती मिल सकती है।

    अगर मोर्चा में सब ठीक-ठाक रहा तो हो सकता है यह मोर्चा सपा और बसपा का विकल्प बनकर यूपी में सबके समक्ष हो। गैर यादव पिछड़े और मुस्लिमों के एकत्रित होने का कारण यह है कि उन्हें न सपा में न ही भाजपा में सही भागीदारी मिली है। जिसके कारण अपनी अपनी जातियों पर पकड़ बनाये रखने वाले दलों ने आपस में मिलकर खुद ही अपनी ताजपोशी का रास्ता अख्तियार किया है।

    मोर्चा का घोषणपत्र सभी पिछड़ी जातियों और मुस्लिमों को भा रहा है। यूपी में नये क्षेत्रीय दलों के उदय का इतिहास सबके समक्ष है अगर भागीदारी संकल्प मोर्चा इसी क्रम में आगे बढ़ रहा है तो इसे अप्रत्याशित नहीं कहा जा सकता। क्योंकि अब लोग अपना भला-बुरा समझने लगे हैं और मोर्चा के घटक दलों के नेताओं के नेतृत्व पर भरोसा भी कर रहे हैं। तो इस बार के परिणाम बहुत ही चौंकाने वाले भी हो सकते हैं।

     

    सबका साथ सबका विकास का नारा देने वाली पार्टी में पद तो लगभग सभी को बराबरी से दिये गये हैं लेकिन पार्टी व बाहर के लोगों का भी आरोप है कि इस सरकार में बोलबाला ठाकुरों का ही रहा है फिर ब्राह्मणों का। जबकि सभी जातियों के प्रयास से ही यूपी की विधानसभा सीटों और लोकसभा की अप्रत्याशित सीटों में भाजपा ने अपना परचम लहराया है। बीजेपी में क्षत्रिय और ब्राह्मणों के अलावा अन्य जातियों को बराबरी का मलाल आज भी है। लेकिन बीजेपी के घटक दलों में पटेल बिरादरी पर अपना प्रभाव रखने वाले अपना दल की अनुप्रिया पटेल, पूर्वी उत्तर प्रदेश के निषादों पर अपना प्रभाव रखने वाले निषाद पार्टी के संजय निषाद बाहर से बीजेपी को मजबूत जरूर करेंगे। कई मामलों में फेल रहने वाली सत्ता दल जरूर विज्ञापनों के जरिए अपना इमेज सुधारने में लगी है।

    रोजगार, कोराना, कानून व्यवस्था आदि कई मामलों में सरकार के फेल होने का आरोप कई विपक्षी दल लगाते रहे वहीं यूपी की अधिकांश जनता का भी यही मानना है। जिसके कारण बीजेपी अभी से डैमेज कंट्रोल पर लगी है, जातियों को साधना और हिंदुत्व अहम मुद्दा बना कर चल रही है। बीजेपी आईटी सेल की कई पोस्टों से मुस्लिमों से खौफ व नफरत वाली पोस्टों का क्रियान्वयन तेजी से शुरू है साथ ही विकास के अप्रत्याशित उदाहरणों का विज्ञापन भी अपने चरम पर है।
    इधर सपा के बड़ी पार्टी के रूप में उभर कर आने के ज्यादा कयास लगाए जा रहे हैं और यह कयास अपनी पृष्ठभूमि पर खरे भी उतर सकते हैं।

    सपा जरूर बाहर से अन्य जाति के छोटे दलों के साथ मिलकर चुनाव लड़ने की बात कर रही है लेकिन सपा के ही कुछ लोगों के अलावा अन्य विपक्षी दलों का भी आरोप है कि संगठन में तमाम छोटे-बड़े पदों में यादवों के अलावा अन्य जातियों का अनुपात बहुत कम ही है। अभी हाल ही में सम्पन्न हुए पंचायती चुनावों में सपा ने एक ही जाति के लोगों का अम्बार लगा दिया था जबकि बीजेपी ने जातियों के समीकरण को सुलझाने का काम दिखाया है। हाँ! जिला पंचायत अध्यक्ष चुनाव और ब्लाक पंचायत अध्यक्ष के चुनाव में बीजेपी भी लोकतंत्र की मर्यादा को तार-तार करते नजर जरूर आयी है लेकिन इन चुनावों पर उसने अपने जातीय समीकरण को फिट करने का जुगाड़ भी पूरा कर लिया है।

    उधर सपा के एक अन्य बेसिक वोट मुस्लिमों पर ओवैसी की नज़र गड़ी है। भावुक और तथ्यात्मक भाषणों से वो यूपी में भी अपनी कौम के नेता के रूप में जल्द ही नज़र आने वाले हैं। जहाँ भी भाषण देते हैं वहां लोगों का हुजूम लग जाता है। कई मुस्लिमों के द्वारा यह सुनने में आता है कि बीजेपी को हराना ही मकसद होना चाहिए इसके लिए जो पार्टी जहाँ बीजेपी से टक्कर लेगी मुस्लिम उसी पार्टी को वहां सपोर्ट करेगा। लेकिन जो कट्टरपंथी हैं वो ओवैसी को ही अपनाने पर जोर दे रहे हैं। ऐसे में सपा के बेस वोटबैंक में भी सेंध लग रही है।

    आजम खान को राजनीतिक विद्वेष में फंसाये जाने के बावजूद सपा मुखिया का शांत रहना, यूपी के मुस्लिमों को जरूर अखर रहा है। अगर ओवैसी मोर्चा के साथ आते हैं तो मुस्लिम जरूर अपने कौम का मुख्यमंत्री और उपमुख्यमंत्री पाने के लिये तथा अपनी स्वतंत्र आवाज बनने के लिए ओवैसी और मोर्चा को जरूर परखना चाहेंगे।

    सपा जरूर पुराने विकास कार्यों का जिक्र जनता के बीच कर रही है लेकिन कानून दुर्व्यवस्था के मामले में सपा और बीजेपी दोनों एक-दूसरे से कम नहीं हैं। जनता में ही कई लोगों का कहना है कि जहां सपा सरकार में यादव और मुस्लिम के अलावा बाकी सब त्रस्त थे वहीं बीजेपी में क्षत्रियों, अधिकांश ब्राह्मणों और कुछ कुर्मियों के अलावा सब त्रस्त हैं।

    कानून व्यवस्था के मामले में कई लोगों का कहना है कि बसपा में कानून व्यवस्था बहुत अच्छी थी, हिंदू-मुस्लिम में भेदभाव भी नहीं था, बीजेपी हिंदुओं को लेकर भेदभाव करती है तो सपा मुस्लिमों को लेकर भेदभाव करती थी। लेकिन हाँ! बसपा सरकार में एससी-एसटी एक्ट का दुरुपयोग बहुत हुआ था।

    बसपा के सभी मिशनरी नेता एक-एक कर बाहर हो गये या कर दिये गये इनमें से कई पिछड़ी जातियों के प्रमुख नेता थे जिनका अपनी जाति पर अच्छा खासा प्रभाव था और आज भी है। बसपा नये लोगों को लेकर फिर से सोशल इंजीनियरिेंग को अजमाने की कोशिश में है लेकिन उन नये लोगों का अपनी जातियों में उतना प्रभाव नहीं है जितना कि पुराने मिशनरी नेताओं का था। जनता में ही कई लोगों का कहना है कि अगर सब नहीं तो केवल दो ही नेता बाबूसिंह कुशवाहा और नसीमुद्दीन सिद्दिकी बीएसपी में पुनः आ जाएं तो बीएसपी एक बार फिर महाप्रतिद्वंदी के रूप में बीजेपी और सपा के समक्ष होगी हो सकता है कि सत्ता में पुनः वापसी भी कर ले। किन्तु इन दोनों का बीएसपी से मिलना असंभव सा प्रतीत होता है।

    कांग्रेस यूपी में प्रियंका गांधी के सहारे है लेकिन यूपी में दशकों से निश्चेत पड़ी कांग्रेस के लिए संजीवनी की जरूरत है जो कि आज की तारीख में बहुत ही दुर्लभ है। कांग्रेस का वोट प्रतिशत कुछ जरूर बढ़ सकता है। केजरीवाल की आम आदमी पार्टी का प्रभाव दिल्ली से सटी कुछ विधानसभा सीटों पर जरूर दिख सकता है।

    कुल मिलाकर मिशन 2022 किसी के लिए इस बार स्पष्ट संदेश लेकर नहीं आ रहा। अगर भागीदारी संकल्प मोर्चा बसपा या सपा की ओर झुका तो बसपा या सपा को स्पष्ट बहुमत तो मिलेगा ही मोर्चा की सीटों में भी अप्रत्याशित वृद्धि होगी। अगर कांग्रेस के साथ आया तो कांग्रेस को कुछ सीटों में बढ़ोत्तरी मिल सकती है वहीं मोर्चा की भी कुछ सीटें बढ़ सकती हैं। अगर मोर्चा अकेले ही सफर तय करता है तो यह पूरब की एक बड़ी पार्टी के रूप में उभर कर सबके समक्ष होगा। मोर्चा के घटक दल या मोर्चा ने भाजपा से मिलकर चुनाव लड़ने की अभी तक कोई मंशा जाहिर नहीं की है।

    इस बार यूपी का चुनाव कुछ नया लेकर आने वाला है यदि भागीदारी संकल्प मोर्चा चुनाव तक टिका रहा और सही नियत के साथ चुनाव लड़ता है तो भागीदारी संकल्प मोर्चा भी यूपी में बढ़िया सीटें पाकर सत्ता के साथ भागीदारी कर सकता है। अब सत्ता में मुख्य दल का रोल कौन निभाएगा? चुनाव के नजदीक आते-आते इसकी परत दर परत खुलती जाएंगी अभी से कुछ कहना बहुत जल्दबाजी होगी।

    #भागीदारी संकल्प मोर्चा
    Shagun

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