अभिनंदन! सौ बार बधाई! हम सबका अभिनंदन है।
हमारी सो चुकी चेतना पर, इंसानियत का यह करुण क्रंदन है।।
वजह-बेवजह राजनैतिक रैलियों में जुड़ती भीड़ का अभिनंदन!
नेताओं की जी-हुजूरी में झुकती उस रीढ़ का अभिनंदन!!
जाति-धर्म के जलसों में जो बढ़-चढ़कर हुंकार भरती है।
स्वार्थ और अधिकारों के हित जो सड़कों पर उतरती है।।
एक शब्द पर जी-जान लुटाती डिजिटल उस भीड़ का अभिनंदन!
दलों और आंदोलनों में बंधे, स्वार्थ के उस नीड़ का अभिनंदन!!
पर सुनो…
अभिनंदन उस हर हलचल का, जो केवल ‘अर्थ’ तक सीमित है।
जो भौतिक सुख-साधनों की, संकुचित शर्त तक सीमित है।।
अपनी-अपनी हिस्सेदारी पर लड़ती उस भीड़ का अभिनंदन!
जो बस अपने लिए जिए, उस संकीर्ण सोच का वंदन!!
पर कांप उठती है रूह मेरी, जब मौन यह दुनिया होती है।
जब किसी मासूम की अस्मत पर, मानवता कोने में रोती है।।
धर्म, मज़हब और जाति देखकर, जो नरपिशाचों का साथ निभाती है।
अपराधियों में भी जो अपना, नेता और भाई पा जाती है।।
उन नरपिशाचों के पक्ष में खड़ी, उस स्वार्थी भीड़ का अभिनंदन!
जिसने कुचल दी मर्यादा, उस हिंसक स्वार्थ का वंदन।।
कितनी खामोशी छा जाती है, जब बात न्याय पर आती है।
हैवानों के खिलाफ कभी, क्यों कोई भीड़ न जुड़ पाती है?
हम सबकी मरी हुई चेतना, और मरी हुई आत्मा का अभिनंदन!
सभ्यता के ऊंचे ग्राफ से गिरते, इस पतन-काल का अभिनंदन!!
छोड़ चले हम इंसानी बस्ती, नरपिशाचों की राहों पर।
गर्व करो इस बदले समाज की, बदल रही निगाहों पर।।
बधाई हो! हम सबने मिलकर, इंसानियत को मार दिया!
सभ्यता का चीर हरण कर, खुद को ही धिक्कार दिया!!
अभिनंदन! अभिनंदन! इस पतन का अभिनंदन!
मरी हुई रूहों के इस नए जग का, बारंबार अभिनंदन!!
- राहुल कुमार गुप्ता







