हेमंत कुमार
आज देश का उत्तराखण्ड एक बार फिर से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बना हुआ है। स्मरण रहे वर्ष 2013 में केदारनाथ आपदा के दौरान यह हिमालयी प्रदेश पूरी दुनिया में चर्चित था लेकिन आज एक बार फिर से जोशीमठ नाम सुर्खियों में बना है। यह छोटा सा कस्बेनुमा शहर विश्व का ध्यान अपनी ओर आकर्षित कर रहा है, क्यूंकि आज यहां बसे शहर के अस्तित्व पर ही खतरा मंडराने लगा है। लगभग 17 हजार की जनसंख्या वाले इस शहर की इमारतों, सड़कों पर गहरी दरारें पड़ चुकी हैं। पूरा शहर कभी भी जमींदोज हो सकता है। जाहिर सी बात है कि ऐसा यकायक तो हुआ नहीं होगा बल्कि इस शहर पर मंडरा रहे खतरे के संकेत अरसा पहले ही मिलने शुरू हो गये थे।
आज यहां यह प्रश्न उठता है कि जोशीमठ का यह हश्र क्यों हो रहा है? इसके उत्तर में हमे सबसे पहले इस कस्बेनुमा शहर के ऐतिहासिक और धार्मिक महत्व को समझना पड़ेगा।

समुद्र तट से 6 हजार 150 फीट की ऊंचाई पर बसा हिन्दू संस्कृतिक का केंद्र जोशीमठ उत्तराखण्ड के चमोली जिले में स्थिति है। सातवीं से ग्यारहवीं शताब्दी के बीच इस इलाके में कत्यूरी वंश के राजा का आधिपत्य हुआ करता था।
प्रसिद्ध इतिहासकार बद्रीदत्त पाण्डे ने अपनी पुस्तक ‘कुमाऊं का इतिहास’ में लिखा है कि जोशीमठ कत्यूरी वंश की पहली राजधानी थी। कत्यूरी वंश की स्थापना वासुदेव कत्यूरी ने की थी और इन्हीं के नाम पर जोशीमठ में वासुदेव मंदिर स्थापित हुआ। राजा वासुदेव बौद्ध धर्म के अनुयायी थे और आदि शंकराचार्य के संपर्क में आने के बाद कत्यूरी राज परिवार हिंदू धर्म को मानने लगा। आदि शंकराचार्य ने इसी स्थान पर ज्योर्तिपीठ नाम से एक मठ स्थापित किया। इसी ज्योर्तिपीठ के कारण यह स्थान जोशीमठ कहलाया जाने लगा। कत्यूरी वंश ने कालांतर में यहां से अपनी राजधानी कुमाऊं क्षेत्र के कार्तिकेयपुर (वर्तमान में बैजनाथ, जिला बागेश्वर) में स्थानांतरित कर लिया था। इस स्थानांतरण के पीछे एक पौराणिक कथा भी प्रचलित है।
.. #JoshimathIsSinking at a dangerous pace, 5.4 cm in just 12 days!#Joshimath may sink completely! #Uttarakhand https://t.co/tr3sSwSgVK pic.twitter.com/WnIjV1fUQ5
— Meenakshi Sharan (@meenakshisharan) January 13, 2023
राजा वासुदेव भगवान विष्णु के अवतार नरसिंह के भक्त थे। एक दिन जब राजा शिकार पर गए हुए थे तब भगवान नरसिंह एक संन्यासी का वेश धर कर राजमहल पहुंचनें पर वासुदेव की पत्नी द्वारा उनका यथोचित स्वागत सत्कार किया गया। संन्यासी भोजन इत्यादि के पश्चात राजा वासुदेव की पलंग पर ही सो गये। जब राजा अपने महल वापस लौटे तो उन्होनें एक अंजान आदमी को अपने शयनकक्ष में पा कर बहुत क्रोधित हुये। उन्होंने सोते हुए भगवान नरसिंह का बायां हाथ अपनी तलवार से काट डाला। कथानुसार भगवान के कटे हाथ से रक्त के स्थान पर दूध की धारा निकलते देख राजा वासुदेव समझ गए कि यह व्यक्ति स्वयं भगवान हैं।
नरसिंह ने राजा को माफ तो कर दिया लेकिन एक श्राप भी दे डाला कि अब उसे इस स्थान को छोड़ कर कहीं अन्यत्र अपनी राजधानी बनानी पड़ेगी इसके साथ ही नरसिंह ने राजा को यह भी आदेश दिया कि उनका एक मंदिर का निर्माण कर भगवान की मूर्ति भी स्थापित करेगा लेकिन उस मूर्ति मे उसका बायां हाथ कमजोर दिखाया जाएगा। जैसे जैसे मूर्ति की यह हाथ कमजोर होता जायेगा वैसे वैसे कत्यूरी वंश का विनाश होता चला जाएगा।
कथानुसार ऐसा ही हुआ और ग्यारहवीं शताब्दी में कत्यूरी वंश के स्थान पर इस क्षेत्र में पंवार वंश की सत्ता स्थापित हो गई। जगत्गुरु आदि शंकराचार्य ने आठवीं शताब्दी में यहां ज्योर्तिपीठ नाम से एक मठ की स्थापना की जो शंकराचार्य के द्वारा स्थापित चार मठों में से एक है। जोशीमठ अपने धार्मिक महत्व के अलावा सामरिक दृष्टि से भी बहुत महत्वपूर्ण है। भारतीय थल सेना की यहां बड़ी छावनी है।

गढ़वाल राइफल्स की स्कॉउट बटालियन ‘गढ़वाल स्कॉउटस्’ का यहां मुख्यालय स्थिति है। भारत-तिब्बत अंतरराष्ट्रीय सीमा पर थल सेना का सबसे बड़ा ठिकाना जोशीमठ में ही है। यहां स्थापित नरसिंह मंदिर के बारे में ऐसी मान्यता है कि भगवान नरसिंह की मूर्ति का दायां हाथ लगातार कमजोर होता जा रहा है और जिस दिन यह हाथ मूर्ति से अलग हो जाएगा, उसी दिन बद्रीनाथ मार्ग पर पड़ने वाले दो पर्वत जय-विजय आपस में जुड़कर एक हो जाएंगे और उसी दिन बद्रीनाथ एवं केदारनाथ मंदिर भी गायब हो जाएंगे तथा केदारनाथ में स्थापित शिवलिंग एक नए स्थान जिसे ‘भविष्य केदार’ कहा जाता है, में प्रकट होगा। यह ‘भविष्य केदार’ जोशीमठ में स्थित है। इसी प्रकार से मान्यता है कि जोशीमठ से 10 किलोमीटर की दूरी पर ‘शालीग्राम’ के रूप में बद्री भगवान प्रकट होंगे। इस स्थान को लोग ‘भविष्य बद्री’ कह पुकारते है।
आज इस पौराणिक-धार्मिक और सामरिक महत्व वाले जोशीमठ का अस्तित्व ही खतरे में है, तो इसके पीछे किसी भगवान का या दैवीय शक्ति का श्राप नहीं बल्कि दैवीय शक्तियों ने तो इस स्थान को ‘भविष्य बद्री’ और ‘भविष्य केदार’ बनने का आशीर्वाद प्रदान किया है।
आज मनुष्य ने अपने लालच और कथित विकास के नाम पर इस दिव्य क्षेत्र में नित नये निर्माण से ताबाही लाने का काम कर डाला है। इस इलाके में दशकों पहले से ही भूस्खलन की घटनाएं घटित होती रहीं है। वर्ष 1976 में एक अठारह सदस्यीय कमेटी ने इस पूरे क्षेत्र को ‘अतिसंवेदनशील’ घोषित करते हुए यहां बड़े निर्माण कार्यों पर पूर्ण रूप से प्रतिबंध लगा कर, वृक्षों का कटान रोकने और जोशीमठ कस्बे में बारिश के पानी को नियंत्रित करने के लिए उचित नाली निकासी व्यवस्था किये जाने की सिफारिश की थी।
इस कमेटी के अध्यक्ष गढ़वाल कमीशनरी के तत्कालीन आयुक्त महेश चंद्र मिश्रा थे। इस कमेटी की रिपोर्ट में कहा गया ‘Joshimath is situated on a deposit of sand and stone, and is not suitable for a township. Vibrations caused by blasting and hcavy traffic, will also lead to disequilibrium in natural factors…heavy construction work should only be alllowed after examining the load bearing capacity of the soil. For road repair and other construction work, it would be advisable not to remove boulders by digging or blasting the hillside. In the landslide prone areas, stones and boulders should not be removed from the bottom of the hill, as it will cause loss of support’. जोशीमठ बालू और पत्थर के ढेर पर बसा हुआ है इस दृष्टिकोण से यहां किसी भी तरह की
शहरीकरण के लिए उपयुक्त नहीं है।
धमाकों और भारी यातायात से उत्पन्न होने वाले कम्पन यहां पर प्राकृतिक असंतुलन करने का काम करेगा, भारी निर्माण कार्यों की अनुमति केवल मिट्टी की भार वहन करने की क्षमता को ध्यान में रख कर ही दी जानी चाहिए। सड़कों की मरम्मत एवं अन्य प्रकार के निर्माण कार्यों को कराने की स्थिति में पहाड़ों को खोदकर अथवा विस्फोट कर नहीं कराया जाना चाहिए। भूस्खलन प्रभावित इलाकों में पत्थरों और बड़े शिलाखण्डों को पहाड़ी की तलहटी से नहीं हटाया जाना चाहिए क्योंकि इससे पहाड़ को मिलने वाली मजबूती प्रभावित होती है। आज से 47 वर्ष पहले आई इस रिपोर्ट को उत्तराखण्ड के किसी भी सरकार ने गंभीरता से नहीं लिये और जिन तरहों की गतिविधियों पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने की बात इस रिपोर्ट में कही गई थी, इसके उल्ट उन्हीं गतिविधि को बढ़-चढ़कर परवान चढ़ाया गया। चमोली जिला प्रशासन के अनुसार यहां मौजूदा समय में लगभग 3 हजार 900 आवासीय भवन एवं 400 व्यावसायिक भवन हैं जिनमें से लगभग 1 हजार 790 घर सरकार से अनुमती लेकर बनाए गए हैं बाकी सभी निर्माण बगैर किसी इजाजत के किये गये है। जिसका परिणाम आज हम सबके सामने है और एक ऐतिहासिक, धार्मिक एवं सामरिक महत्व वाले शहर विध्वंस के मुहाने पर आ खड़ा हुआ है।
फरवरी, 2021 में इसी इलाके में भारी बाढ़ से हुए तबाही का भयंकर मंजर पूरे विश्व ने देखा। जोशीमठ से मात्र 22 किलोमीटर दूरी पर बसे गांव रैणी, जोशीमठ, नंदा देवी नेशनल पार्क और यहां बन रहे तपोवन विष्णुगाड़ जल विद्युत परियोजना को इस बाढ़ ने तबाह कर डाला था। इस तबाही में 200 लोगों की जान चली गई थी। इस हादसे में मारे गए लोगों में अकेले 140 तपोवन विष्णुगाड़ विद्युत परियोजना के वर्कर थे। पर्यावरणविद् एक लंबे अर्से से सरकारों को इस संपूर्ण क्षेत्र (पूरे उत्तराखण्ड) की भौगोलिक संवेदनशीलता के मद्देनजर उन्हें चेताते रहे हैं लेकिन कथित विकास के नाम पर सरकारों ने अपनी आंख इस ओर से मूंद मूँदे रहें। वर्ष 2014 में सुप्रीम कोर्ट द्वारा नियुक्ति की गई एक वैज्ञानिक कमेटी ने इस क्षेत्र में बड़े बाँध और बड़ी विद्युत परियोजनाओं पर रोक लगाने की सिफारिश की थी लेकिन केंद्र सरकार ने इस समिति की रिपोर्ट को स्वीकारा नहीं किया। देहरादून स्थित ‘पीपल्स साइंस इंस्टीट्यूट’ के निदेशक डॉ. रवि चोपड़ा जो इस समिति के सदस्य थे, इस बाबत लगातार अपना प्रतिरोध दर्ज कराते रहे हैं। डॉ. चोपड़ा ने भारत सरकार द्वारा चारधाम की सड़कों के चौड़ीकरण (ऑल वेदर रोड प्रोजेक्ट) को भी इस इलाके के लिए अति घातक करार दिया था लेकिन सरकार अपने हठ पर कायम रही जिसका नतीजा इस कथित ऑल वेदर रोड में लगातार हो रहे भूस्खलन की घटनायें प्रति वर्ष देखने को मिल रहा है।
यह आश्चर्यजनक है कि जिन हिंदू तीर्थ स्थलों के नाम पर यह सब किया जा रहा है, उन तीर्थ स्थलों का अस्तित्व ही इस कथित विकास के कारण खतरे में पड़ चुका है। यदि पौराणिक कथाओं पर विश्वास करें तो उसके अनुसार एक समय ऐसा भी आने वाला है जब बद्रीनाथ और केदारनाथ अपने स्थलों से गायब हो जोशीमठ के निकट ‘भविष्य बद्री’ और ‘भविष्य केदार’ के रूप में उभरेंगे और ऐसा स्वयं भगवान के निर्देशन के अनुसार होगा। लेकिन उसी भगवान के अनुयायी इसे गलत साबित करने की ठाने हैं। जोशीमठ का वजूद आज मनुष्य जनित कारणों से खतरे में है तो यहां यह प्रश्न उठता है कि ‘भविष्य बद्री’ और ‘भविष्य केदार’ की भविष्यवाणीओ का क्या होगा? यह तय सी बात है कि सरकारें, चाहे किसी भी दल, किसी भी विचारधारा की क्यों न हो, इस कथित विकास के प्रति सभी का दृष्टिकोण एक ही समान रहा है। आज यदि उत्तराखण्ड को ऐसे विनाशकारी विकास से बचाना है तो एक बार फिर से जनता को ही पहल करनी होगी। अन्यथा आज जोशीमठ खतरे में है, कल यही हश्र नैनीताल का होगा और भविष्य में पूरे हिमालयी क्षेत्र का हो इस बात में कोई आश्चर्य की बात नहीं है।







