
चलो अब गूँगे हो जाते हैं।
हक को फिर भूल जाते हैं।।
आओ फिर से गुलाम हो जाते हैं।
चलो अब पालतू बन जाते हैं।।
हम कायरों को भी इज्जत मिलेगी।
इंसान का वेष आओ रख लेते हैं।।
अब मालिकों की नजर गंदी तो जय-जय।
अब मालिकों का कहर बरपे तो जय-जय।।
बच्चों की मौतों में भी जय-जय।
बेटियों की बेइज्जती में भी जय-जय।।
अन्नदाताओं की खुदकुशी में भी जय-जय।
बेरोजगारों की बेबसी में भी जय-जय।।
इतनी तो जय-जय चहुँओर है।
यहाँ यह कैसा मौन सा शोर है।।
आओ हम खुशी का पावन पर्व मनाते हैं।
चलो अपने आकाओं के गुण हम गाते हैं।।
आओ दासता की नई दास्ताँ लिखते हैं।
हक को फिर भूल जाते हैं।।
कहाँ गये वो लाखों की भीड़ बुलाने वाले।
जनता को अपना हमदर्द बताने वाले।।
यह सब सीधा ही करेंगे उल्लू अपना।
गुलामों को नहीं हक वो देखें सपना।।
अच्छा है…!
चलो अब गूँगे हो जाते हैं।
मालिकों का जयकारा गाते हैं।।
– राहुल कुमार गुप्त







