नई दिल्ली: एक 19 वर्षीय होनहार छात्र, महेश राणा, जो दिल्ली विश्वविद्यालय के ‘स्कूल ऑफ ओपन लर्निंग’ में बी.कॉम (ऑनर्स) के द्वितीय वर्ष में पढ़ रहा था, ने साइबर ठगी का शिकार होने के बाद अपनी जान गंवा दी। यह दिल दहला देने वाली घटना समाज के लिए एक चेतावनी है कि डिजिटल युग में ठगी किस तरह मासूम सपनों को कुचल सकती है।
महेश ने एक मोबाइल फोन खरीदने की छोटी-सी चाहत में ऑनलाइन ठगों के जाल में फंसकर 94,000 रुपये गंवाए। यह राशि शायद उसके परिवार की मेहनत की कमाई थी, जिसे उसने उम्मीद और भरोसे के साथ खर्च किया था। लेकिन ठगों ने न केवल उसका पैसा लूटा, बल्कि उसका आत्मविश्वास और जीने की उम्मीद भी छीन ली। 14 जुलाई को, उत्तरी दिल्ली के रोहिणी इलाके में अपने घर से लापता होने से पहले, महेश ने अपनी मां को एक दर्दनाक संदेश भेजा, जिसमें उसने बताया कि वह साइबर ठगी का शिकार हो गया है और घर छोड़कर जा रहा है। दो दिन बाद, 16 जुलाई को उसका शव बेगमपुर जल शोधन संयंत्र के पास मिला। पुलिस ने शव की तस्वीर सोशल मीडिया पर साझा की, जिसके बाद 19 जुलाई को उसकी पहचान हो सकी।
यह घटना केवल एक परिवार की त्रासदी नहीं, बल्कि समाज के लिए एक आईना है। एक छात्र के लिए पैसा सिर्फ नोट नहीं, बल्कि उसके सपनों, मेहनत और भविष्य का प्रतीक होता है। जब यह पैसा छल-कपट से छीन लिया जाता है, तो वह सिर्फ आर्थिक नुकसान नहीं, बल्कि मनोवैज्ञानिक और भावनात्मक आघात भी होता है। महेश जैसे युवा, जो अपने परिवार की उम्मीदों का बोझ कंधों पर उठाए चलते हैं, ऐसी ठगी का शिकार होने पर टूट जाते हैं।
साइबर ठगी का यह जाल आज लाखों लोगों को अपनी चपेट में ले रहा है। यह घटना हमें यह सोचने पर मजबूर करती है कि हमारी प्रणाली में कहां कमी है? क्या हम अपने युवाओं को डिजिटल दुनिया के खतरों से बचाने के लिए पर्याप्त जागरूक कर रहे हैं? महेश की कहानी हर उस व्यक्ति के दिल को झकझोरती है, जो अपने बच्चों के लिए एक बेहतर भविष्य का सपना देखता है। यह समाज से एक सवाल पूछती है- क्या हम इस तरह की त्रासदियों को रोकने के लिए तैयार हैं, या हमारी चुप्पी और लापरवाही ऐसी और जिंदगियों को लील लेगी?







