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    महादेवी हथिनी: आस्था, कानून और मानवता के बीच उलझा एक संवेदनशील विवाद

    ShagunBy ShagunAugust 5, 2025 Current Issues No Comments5 Mins Read
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    उपेंद्र राय/सुशील

    महाराष्ट्र के कोल्हापुर जिले के नांदनी गांव की 36 वर्षीय हथिनी महादेवी, जिसे ग्रामीण प्यार से ‘माधुरी’ कहते हैं, आज एक गहरे भावनात्मक और कानूनी विवाद का केंद्र बन गई है। यह हथिनी तीन दशकों से अधिक समय से नांदनी के श्री जिनसेन भट्टारक जैन मठ में धार्मिक रीति-रिवाजों का हिस्सा रही है। लेकिन हाल ही में, बॉम्बे हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर उसे गुजरात के जामनगर में रिलायंस फाउंडेशन द्वारा संचालित वनतारा वन्यजीव पुनर्वास केंद्र में स्थानांतरित कर दिया गया। इस फैसले ने स्थानीय समुदाय में आक्रोश और दुख की लहर पैदा कर दी है। हजारों लोग सड़कों पर उतरकर महादेवी की वापसी के लिए शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर रहे हैं। यह मुद्दा केवल एक हथिनी तक सीमित नहीं है, बल्कि यह आस्था, सांस्कृतिक परंपराओं और पशु कल्याण के बीच एक जटिल टकराव को दर्शाता है।

    कानूनी प्रक्रिया और नैतिक सवाल

    महादेवी को वनतारा भेजने का निर्णय पशु अधिकार संगठनों, जैसे PETA इंडिया और फेडरेशन ऑफ इंडियन एनिमल प्रोटेक्शन ऑर्गनाइजेशंस (FIAPO), की याचिकाओं के बाद लिया गया। इन संगठनों ने दावा किया कि मठ में महादेवी को कठोर परिस्थितियों में रखा गया, जिसमें उसे जंजीरों में बांधा गया और कंक्रीट के फर्श पर रहने के लिए मजबूर किया गया, जिससे उसके शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य को नुकसान पहुंचा। उनके अनुसार, हथिनी के शरीर पर चोट के निशान थे और वह अकेलेपन से पीड़ित थी। दिसंबर 2024 में गठित एक उच्च-स्तरीय समिति ने इन आरोपों की जांच की और वनतारा में स्थानांतरण की सलाह दी। बॉम्बे हाईकोर्ट ने 16 जुलाई 2025 को इस सिफारिश को मंजूरी दी, और सुप्रीम कोर्ट ने 28 जुलाई 2025 को इस निर्णय को बरकरार रखा, जिसमें पशु कल्याण को सर्वोपरि माना गया।

    वनतारा, जो 3,000 एकड़ में फैला एक आधुनिक पुनर्वास केंद्र है, महादेवी को प्राकृतिक वातावरण, विशेषज्ञ चिकित्सा देखभाल और सामाजिक माहौल प्रदान करता है। लेकिन नांदनी के लोग इसे अपनी धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान पर प्रहार मानते हैं। उनके लिए, महादेवी मठ की 1,200 साल पुरानी परंपराओं का जीवंत हिस्सा है, जो सैकड़ों वर्षों से हाथियों की देखभाल करता रहा है।

    ग्रामीण जनता का आक्रोश और भावनात्मक विदाई

    28 जुलाई 2025 को जब महादेवी को वनतारा पुनर्वास केंद्र ले जाया गया, नांदनी गांव में गहरी उदासी और गुस्से का माहौल छा गया। कई ग्रामीण आंसुओं में डूबे हुए हथिनी को अलविदा कहने आए, जबकि कुछ ने गुस्से में पुलिस वाहनों पर पथराव किया। यह दृश्य न केवल उनकी भावनात्मक लगाव को दर्शाता है, बल्कि उनकी सांस्कृतिक परंपरा से गहरे जुड़ाव को भी उजागर करता है।

    प्रदर्शनकारी ‘माधुरी को लौटाओ’ और ‘जियो का बहिष्कार’ जैसे नारे लगाते दिखे। दो लाख से अधिक लोगों ने एक हस्ताक्षर अभियान में हिस्सा लिया, जिसमें मठ में महादेवी की वापसी की मांग की गई। राजू शेट्टी ने वनतारा को “जानवरों का संग्रहालय” कहकर इस कदम को मठ की परंपराओं को कमजोर करने की साजिश बताया। स्थानीय लोगों का कहना है कि महादेवी उनके समुदाय की आत्मा है, और उसे जंजीरों में रखने के आरोप आधारहीन हैं। कुछ ग्रामीणों ने इस मामले को अंबानी परिवार के खिलाफ राजनीतिक साजिश के रूप में देखा, जिसके चलते ‘जियो बॉयकॉट’ का नारा जोर पकड़ रहा है।

    पशु कल्याण का दृष्टिकोण

    पशु अधिकार समूहों का तर्क है कि महादेवी ने मठ में कठिन परिस्थितियों में 33 साल बिताए। कुछ सोशल मीडिया पोस्ट्स में दावा किया गया कि उसे तंग रस्सियों में बांधा गया और उसके साथ क्रूर व्यवहार किया गया। वनतारा में उसे खुला वातावरण, हाइड्रोथेरेपी और विशेषज्ञ देखभाल मिल रही है, जो उसके स्वास्थ्य के लिए जरूरी है। PETA और FIAPO ने मठ को यांत्रिक हथिनी का उपयोग करने का सुझाव दिया ताकि धार्मिक अनुष्ठान बिना जानवरों को नुकसान पहुंचाए जारी रह सकें। लेकिन मठ प्रबंधन और ग्रामीणों ने इस प्रस्ताव को अपनी परंपराओं के खिलाफ मानकर अस्वीकार कर दिया।

    राजनीतिक रंग ले चुका है विवाद

    यह विवाद अब राजनीतिक रंग ले चुका है। भाजपा सांसद धनंजय महाडिक और शिवसेना सांसद धैर्यशील माने ने केंद्रीय पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव से मुलाकात की और सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा दायर करने की मांग की। महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने स्पष्ट किया कि यह निर्णय सुप्रीम कोर्ट का है, न कि राज्य सरकार का। फिर भी, जनता की भावनाओं को देखते हुए उन्होंने इस मुद्दे पर चर्चा के लिए एक बैठक बुलाई है।

    महादेवी को स्वस्थ और सम्मानजनक जीवन मिले

    महादेवी का मामला सांस्कृतिक विरासत और पशु कल्याण के बीच एक गहरे अंतर्विरोध को सामने लाता है। कोल्हापुर के लोग अपनी परंपराओं को जीवित रखने के लिए संघर्ष कर रहे हैं, जबकि पशु अधिकार समूह यह सुनिश्चित करना चाहते हैं कि महादेवी को स्वस्थ और सम्मानजनक जीवन मिले। यह विवाद हमें गंभीर सवालों से रूबरू करता है: क्या परंपराओं के नाम पर जानवरों का उपयोग नैतिक है?

    क्या यांत्रिक विकल्प इस टकराव को हल कर सकते हैं? और क्या हमारी आस्था हमें जीवों के प्रति जिम्मेदारी से मुक्त करती है?महादेवी की कहानी मानवता, परंपरा और कानून के बीच संतुलन की खोज है। इसका समाधान तभी संभव है जब सभी पक्ष आपसी समझ और संवेदनशीलता के साथ एक-दूसरे की चिंताओं को संबोधित करें। यह न केवल महादेवी के भविष्य को आकार देगा, बल्कि उन सभी परंपराओं को भी, जो जीव-जंतुओं पर निर्भर हैं।

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