सरकार ने 4 सितंबर को सोशल मीडिया के 26 प्लेटफॉर्म्स पर लगा दी थी रोक
काठमांडू, 9 सितंबर 2025: नेपाल में सत्ता का दुरुपयोग और जनता की अनदेखी ने आखिरकार प्रधानमंत्री के.पी. शर्मा ओली को सत्ता छोड़ने पर मजबूर कर दिया। युवाओं के गुस्से और हिंसक प्रदर्शनों के बाद ओली को मंगलवार को इस्तीफा देना पड़ा। यह घटना साफ दिखाती है कि जब कोई नेता जनता की आवाज को दबाकर अपने बिजनेसमैन दोस्तों के लिए काम करता है, तो सत्ता उसके लिए बोझ बन जाती है।
क्या हुआ नेपाल में?
पिछले कुछ दिनों से काठमांडू में ‘जन जेड’ (युवा पीढ़ी) के नेतृत्व में विरोध प्रदर्शन हो रहे थे। लोग भ्रष्टाचार, नेपोटिज्म (भाई-भतीजावाद) और सोशल मीडिया पर प्रतिबंध जैसे मुद्दों से नाराज थे। सरकार ने 4 सितंबर को फेसबुक, इंस्टाग्राम, एक्स और यूट्यूब जैसे 26 प्लेटफॉर्म्स पर रोक लगा दी थी, जिसे जनता ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर हमला बताया। सोमवार को प्रतिबंध हटा, लेकिन तब तक गुस्सा भड़क चुका था। प्रदर्शनकारियों ने संसद भवन और ओली के घर पर हमला किया, आगजनी और तोड़फोड़ की। इसमें 19 लोगों की मौत और 300 से ज्यादा घायल हो गए।

ओली का पतन
ओली, जो जुलाई 2024 में चौथी बार प्रधानमंत्री बने थे, पर आरोप था कि वे अपने कारोबारी दोस्तों के लिए देश के संसाधनों का गलत इस्तेमाल कर रहे थे। जनता की समस्याओं को नजरअंदाज करने का नतीजा यह हुआ कि सेना प्रमुख ने भी उनसे इस्तीफा मांगा। गृह मंत्री रमेश लेखक और अन्य मंत्रियों ने भी इस्तीफा दे दिया। प्रदर्शनकारियों के नारे “केपी चोर, देश छोड़” ने साफ कर दिया कि जनता अब और बर्दाश्त नहीं करेगी।
युवाओं की ताकत
नेपाल के युवाओं ने दिखा दिया कि उनकी आवाज को दबाना आसान नहीं है। काठमांडू की सड़कों पर गूंज रहे नारों ने सत्ता को हिलाकर रख दिया। अब लोग संसद भंग करने और नए चुनाव की मांग कर रहे हैं। काठमांडू में हवाई अड्डा बंद है और हालात तनावपूर्ण हैं। भारत ने अपने नागरिकों को सलाह दी है कि वे सड़कों पर न निकलें।
सत्ता के लिए सबक
यह घटना हर नेता के लिए चेतावनी है कि जनता की अनदेखी और सत्ता का दुरुपयोग भारी पड़ सकता है। नेपाल के युवा न केवल अपने देश, बल्कि पूरे दक्षिण एशिया के लिए एक मिसाल बन गए हैं। उम्मीद है कि यह संकट जल्द खत्म होगा और नेपाल में एक नई, पारदर्शी सरकार बनेगी, जो जनता की आवाज सुने।







