उत्तर प्रदेश में स्मार्ट प्रीपेड मीटर को लेकर विवाद गहराया
लखनऊ, 1 अक्टूबर 2025: उत्तर प्रदेश में स्मार्ट प्रीपेड मीटर लगाने की प्रक्रिया को लेकर विवाद लगातार गहराता जा रहा है। उत्तर प्रदेश राज्य विद्युत उपभोक्ता परिषद ने स्मार्ट प्रीपेड मीटर की खरीद प्रक्रिया और दरों को लेकर गंभीर सवाल उठाए हैं। परिषद का आरोप है कि केंद्र सरकार द्वारा इस योजना के लिए स्वीकृत ₹18,885 करोड़ की तुलना में ₹27,342 करोड़ में टेंडर जारी कर दिया गया, जो कि करीब ₹8,457 करोड़ अधिक है।
उत्तर प्रदेश राज्य विद्युत उपभोक्ता परिषद के अध्यक्ष और राज्य सलाहकार समिति के सदस्य अवधेश कुमार वर्मा ने कहा कि यह अतिरिक्त राशि न तो केंद्र सरकार वहन करेगी और न ही राज्य सरकार के पास इसका कोई स्पष्ट खाका है। ऐसे में यह संदेह उठना स्वाभाविक है कि कहीं यह भार आम जनता पर तो नहीं डाला जाएगा।
उधर, विद्युत नियामक आयोग ने स्पष्ट कर दिया है कि केंद्र सरकार की गाइडलाइंस के अनुसार स्मार्ट प्रीपेड मीटर की लागत उपभोक्ताओं से नहीं वसूली जाएगी। बावजूद इसके, उत्तर प्रदेश पावर कॉर्पोरेशन लिमिटेड ने नए कनेक्शन पर स्मार्ट प्रीपेड मीटर को अनिवार्य करार देते हुए आदेश जारी कर दिया है। आरोप है कि आरडीएसएस योजना के तहत खरीदे गए मीटरों का भुगतान अब आम उपभोक्ताओं से वसूला जा रहा है, जो कि नियामक आयोग के आदेशों और संविधान दोनों के खिलाफ है।
उड़ीसा मॉडल की बात करते हैं, लेकिन उसके नियम भी नहीं मानते
अवधेश वर्मा ने कहा कि निजीकरण को लेकर उत्तर प्रदेश पावर कॉर्पोरेशन अक्सर उड़ीसा मॉडल की बात करता है, लेकिन हकीकत यह है कि उड़ीसा में प्रीपेड मीटर अनिवार्य नहीं हैं। वहां के ऊर्जा विभाग ने सार्वजनिक रूप से स्पष्ट किया है कि उपभोक्ता अपनी सुविधा के अनुसार प्रीपेड या पोस्टपेड मीटर का चुनाव कर सकते हैं। साथ ही यदि कोई पुराना मीटर सही स्थिति में है और गारंटी अवधि (5 साल) में है, तो उसे बदला नहीं जाएगा।
पावर कॉर्पोरेशन को चाहिए पुनर्विचार करे, अन्यथा विरोध होगा
परिषद अध्यक्ष वर्मा ने पावर कॉर्पोरेशन को चेतावनी देते हुए कहा कि अगर वह अपने असंवैधानिक आदेश को वापस नहीं लेता, तो विद्युत उपभोक्ता परिषद आंदोलन का रास्ता अपनाएगी और विरोध को और तेज किया जाएगा।
उपभोक्ताओं के हितों की रक्षा के लिए परिषद लगातार सरकार और निगम से जवाब मांग रही है, लेकिन अब तक कोई संतोषजनक स्पष्टीकरण नहीं मिला है।







