मैंने पैसे देने की कोशिश की, मना कर दिया, बोले – ‘बहन के लिए कुछ नहीं लेते’
बेंगलुरु। देर रात, एयरपोर्ट की तरफ़ जा रही एक कैब में 24 साल की नेहा (बदला हुआ नाम) फोन पर अपनी सहेली से लगभग रोते हुए बोली,“यार, मैं पिछले 12 घंटे से कुछ नहीं खाया… बहुत भूख लगी है। फ्लाइट तो रात 2 बजे की है, अब क्या करूँ? कुछ भी नहीं मिल रहा।”पीछे की सीट पर चुपचाप गाड़ी चला रहे कन्नड़-भाषी ड्राइवर श्रीनिवास (42) ने कुछ नहीं कहा। बस इलेक्ट्रॉनिक सिटी के पास एक जगह गाड़ी रोकी, उतरे और दो मिनट बाद हाथ में एक ब्राउन पेपर बैग लेकर लौटे।
नेहा ने हैरानी से देखा। श्रीनिवास ने शीशा नीचे किया और बैग आगे बढ़ाया।
“मैडम, सैंडविच ले लो। वेज है। मेरी बहन भी कभी-कभी लेट नाइट ड्यूटी करती है… अगर वो भूखी रहती तो मुझे बहुत बुरा लगता। आप भी किसी की बहन ही हो ना?” नेहा के हाथ काँप गए।

उसने सैंडविच लिया और बस इतना कह पाई,
“अंकल… मैं ये कभी नहीं भूलूँगी।”श्रीनिवास मुस्कुराए, “अरे कुछ नहीं मैडम, बस खा लो। फ्लाइट में नींद भी अच्छी आएगी।”ट्रिप खत्म होने पर नेहा ने कैब ऐप पर 5-सितारा रेटिंग के साथ जो लिखा, वो आज सुबह से लाखों लोगों की आँखें नम कर रहा है:“मैं आज तक नहीं जानती थी कि अनजान इंसान भी इतना अपना हो सकता है।
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मैंने पैसे देने की कोशिश की, मना कर दिया।
बोले – ‘बहन के लिए कुछ नहीं लेते।’
उस रात सिर्फ़ मेरा पेट नहीं भरा, मेरा विश्वास भरा कि इस भागती-दौड़ती दुनिया में अभी भी इंसानियत ज़िंदा है।
श्रीनिवास अंकल, आप जहाँ भी हैं – ढेर सारा प्यार और दुआएँ।”पोस्ट वायरल होते ही लोग लिख रहे हैं: “आज सुबह रोते हुए ऑफिस आया।”
“बेंगलुरु ने फिर साबित कर दिया – यहाँ टेक्नोलॉजी के साथ-साथ दिल भी बहुत बड़ा है।”
“काश हर शहर में एक श्रीनिवास अंकल हों।”
श्रीनिवास आज भी सुबह 5 बजे से अपनी सफ़ेद इंडिका चला रहे हैं।
जब उनसे पूछा गया तो बस इतना बोले,
“क्या बड़ा किया मैंने? बस एक सैंडविच था… मेरी माँ ने सिखाया था – किसी की बेटी को भूखा मत देखो।”आज बेंगलुरु की ठंडी रात में एक सैंडविच ने साबित कर दिया –
इंसानियत को न तो भाषा चाहिए, न रात के 1 बजने का इंतज़ार।
बस एक दिल चाहिए… जो किसी अनजान को भी अपनी बहन समझ ले। क्या आपको भी कोई ऐसा पल याद है जब किसी अनजान ने आपका दिल जीत लिया?






