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    Home»ब्लॉग

    अब… सुर न सजें क्या गाऊं मैं…?

    By October 30, 2017Updated:October 30, 2017 ब्लॉग 1 Comment4 Mins Read
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    गिरिजा देवी का जाना शास्त्रीय गायिकी की एक समृद्ध परंपरा का समाप्त होना जैसे है


    ‘भीगी जाऊं मैं पिया बचाय लइहों’ और ‘नहीं आये घनश्याम घिर आई बदरी ‘ जैसे सावनी गीतों को उन्होंने अपने स्वर से अमर बनाया दिया। होली गाने में, भजन गाने में भी उन्हें महारत हासिल तो था ही इसके साथ ही ठुमरि में नये अर्थ भरने में उन्हें महारथ हासिल थी


    जी के चक्रवर्ती

    भारतीय शास्त्रीय संगीत की ‘ठुमरी क्वीन’ गिरिजा देवी का नाम आज अमरत्व में दर्ज हो चुका है उनके रिक्क्त स्थान की छति अपूर्णीय है उनका जन्म 8 मई, 1929 को काशी में हुआ था। गिरजा देवी का नाम बनारस घराने से तालुक रखने वालो में से एक बहुचर्चित जाने पहचाने नाम की अंतिम कड़ी थीं। वे काशी में ही रहीं और काशी की गायन परंपरा से वे अच्छी तरह वाकिफ हुईं। वे शिव जी की अनन्य भक्त होने के साथ सभी रागों में निपुण थी, राग भैरवी उनका सर्व प्रिय राग था। वह भारतीय शास्त्रीय संगीत में इस तरह की पहचान रखने वालों में से एक अलग शख्शियत थी जिनके अंतिम विदाई लेने के बाद शास्त्रीय संगीत में खाली हुये इस शून्य स्थान की भरपाई होना सहज संभव नहीं है उनकी जैसी गायिका की कमी सदैव भारतीय शास्त्रीय संगीत जगत महसूस करता रहेगा।

    बनारस घराने की शास्त्रीय संगीत परंपरा को आगे ले जाने वालों में से बड़े नाम रामदास, महादेव मिश्र, सिधेश्वरी देवी रसूलन बाई, अप्पा जी जैसे मूर्धन्य गायक गायिकाओं का नाम बड़े फक्र के साथ लिया जाता रहेगा। इस माला की अंतिम कड़ी गिरिजा देवी भारतीय शास्त्रीय संगीत की अनमोल रत्न थीं। उनके जैसा सिद्धहस्त गायिका कोई दूसरा नहीं हुआ और न होगा। भारतीय शास्त्रीय संगीत की चारों प्रकार की गायकी- ख्याल- टप्पा ख्याल, ध्रुपद-धमार, छंद-प्रबंध, ठुमरी-कजरी, जैसे राग रागनियों की वे एक पारंगत गायिका होने के साथ ही साथ बनारस घराने की वर्त्तमान समय की एकमात्र गायिका थीं। वे बनारस घराने के नाम से जानी पहचानी जाती रही।

    उनकी सबसे शानदार उपलब्धिओ में से एक यह है कि भारतीय शास्त्रीय संगीत को उन्होंने जनसाधारण के लिए सुलभ बनाया। कोई भी श्रोता यदि सबसे अच्छा दादरा या चैती सुनन का इछुक हो तो वह गिरिजा देवी जी के शास्त्रीय ख्याल में रचे-बसे दादरा एवं चैती सुन कर मन्त्र मुग्द्ध हो जायेगा।

    उन्होंने शास्त्रीय गायन की शिक्षा सरजू प्रसाद मिश्र के अलावा एक अन्य गुरु से भी शिक्षा ग्रहण किया, दोनों गुरुओं से उन्होंने शास्त्रीय संगीत की अनेकों दुर्लभ जानकारियां ली, जबकि गिरिजा देवी जी को सबसे प्रथम उनके पिता ने उन्हें संगीत की शिक्षा दी संगीत की शास्त्रीयता को आत्मसात करके उन्होंने कुछ ऐसी दुर्लभ प्रकार की गायिकी को तराशने का काम भी किया जो बनारस घराने के अन्य गायक गायिकाएं वह जौहर नहीं दिखा पाये यही कारण है कि उन्हें गायकी की विभिन्न विधाओ में महारत हासिल थी।

    अप्पा जी ने अपनी लीक पर ठुमरी के सनातन प्रवाह को तेज करने के लिए गिरिजा देवी जी के नाम को आगे बढ़ाया कजरी एवं सावन गाने में उन्हें महारथ हासिल थी। ‘भीगी जाऊं मैं पिया बचाय लइहों’ और ‘नहीं आये घनश्याम घिर आई बदरी ‘ जैसे सावनी गीतों को उन्होंने अपने स्वर से अमर बनाया दिया। होली गाने में, भजन गाने में भी उन्हें महारत हासिल तो था ही इसके साथ ही ठुमरि में नये अर्थ भरने में उन्हें महारथ हासिल थी। ‘बाबुल मोरा नइहर छूटो जाये…’ जैसे गीत को उन्होंने राग भैरवी में गाकर अमरत्व प्रदान कर किया।

    वैसे तो पूरी दुनिया में इस गीत को गाया बजाया जाता रहा लेकिन इस गीत की लोकप्रियता का आलम यह था कि इस राग पर आधारित अन्य बहुत सारे फिल्मी गीत भी बनाये गये, बहुत सारी फिल्मों में जो मुजरा गीत बनए जाते थे, वे राग खमाज पर ही आधारित होते थे. ऐसी ही सभी बातें उनको बहुत ऊँचे दर्जे की गायिका का स्थान प्रदान करती हैं। एक मंझे हुए कलाकार के रूप में उनकी उनकी लोकप्रियता का आलम इस बात से लगाया जा सकता है कि 88 साल की उम्र में उनका देहवसान हुआ, जिसमें 70 साल केवल उनकी गायिका का लंबा कालखंड रहा। उन्हें पद्म श्री, पद्म भूषण, पद्म विभूषण, गान सरस्वती, संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार, के साथ ही उन्हें अनेकों सम्मान एवं पुरस्कारों से नवाजा गया। लेकिन, शास्त्रीय गायन के क्षेत्र में यह् सम्मान-पुरस्कार नहीं, बल्कि गिरिजा देवी का नाम ही काफी है। भारतीय सहस्त्रीय संगीत के लिए यह बहुत दुर्भाग्यपूर्ण बात है कि उनके जैसी गायिका सदा- सदा के लिए मौन हो गई। हमसे विदा लेते ही शास्त्रीय गायिकी की एक समृद्ध परंपरा समाप्त हो गयी। गिरिजा देवी की गायिकी में जो पैनापन था शायद वर्त्तमान मे ही क्या अगले कई वर्षों तक ऐसी गायकी और यह आवाज हमें आसानी से शायद देखने को न मिले।

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    1 Comment

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