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    Home»उत्तर प्रदेश

    श्रावस्ती सांसद का भव्य सम्मान करेगा बुंदेलखंड कसौंधन समाज

    ShagunBy ShagunApril 6, 2026Updated:April 6, 2026 उत्तर प्रदेश No Comments6 Mins Read
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    श्रीदाऊ जी गुप्ता के अहसानों का सम्मान तभी होगा जब समाज होगा संगठित: राम प्रताप गुप्ता

    लखनऊ। बुंदेलखंड कसौंधन समाज ने श्रावस्ती के सपा सांसद श्रीराम शिरोमणि वर्मा के प्रति अपनी कृतज्ञता जाहिर की है, उनके भव्य सम्मान की रूपरेखा भी तैयार कर ली गई है। यह सम्मान इसलिए है कि हाल ही में संसद सत्र में पहली बार किसी ने अति पिछड़ी जाति कसौंधन समाज के हक के लिए आवाज उठाई है। उत्तर प्रदेश कसौंधन समाज के संगठन मंत्री रामप्रताप गुप्ता ने बताया कि जल्द ही बुंदेलखंड से समाज के सैकड़ों लोग माननीय सांसद जी का सम्मान करने जायेंगे।

    Rampratap Gupta, Organizing Secretary, Uttar Pradesh Kasaudhan Samaj
    रामप्रताप गुप्ता, संगठन मंत्री उत्तर प्रदेश कसौंधन समाज

    उन्होंने आगे कहा कि विडंबना देखिए कि उत्तर प्रदेश सरकार ने कसौंधन समाज की सामाजिक और आर्थिक स्थिति को देखते हुए 1997 में ही एक ऐतिहासिक शासनादेश जारी कर इन्हें पिछड़ी जाति की श्रेणी में शामिल किया था, परंतु प्रशासनिक अमले की हीलाहवाली ने इसे महज एक कागजी औपचारिकता बना दिया।

    लखनऊ के सबसे लंबी अवधि के मेयर रहे पूर्व एम एल सी और कसौंधन समाज के हक की पहली लड़ाई लड़ने वाले श्री दाऊ जी गुप्ता के अथक प्रयासों और दलीलों के बाद बसपा शासन में तत्कालीन मुख्यमंत्री सुश्री मायावती जी ने इस समाज को पिछड़े वर्ग में रखकर न्याय के साथ साथ इनके अधिकारों का सम्मान किया।

    पिछले ढाई दशकों से यह समाज अपनी शराफत, एकता में कमी और झिझक के कारण मौन बना रहा, जिसका फायदा उठाकर निचले स्तर के अधिकारियों और लेखपालों ने सरकार के निर्देशों को ठेंगे पर रखा। आज स्थिति यह है कि एक ही प्रदेश में कहीं प्रमाणपत्र बन रहे हैं, तो कहीं लेखपाल उच्च स्तर के पत्रों को भी मानने से इनकार कर देते हैं। समाज के बहुत से लोगों को इसका लाभ मिला है, बहुत से लोग आज ओबीसी के चलते सरकारी नौकरियों में योगदान दे रहे हैं लेकिन जहां ये प्रमाण पत्र नहीं बन रहे वहां के लोग आज भी अपने हक के लिए असंगठित होकर लड़ रहे हैं। श्री दाऊ जी गुप्ता का यह अहसान बहुत बड़ा है, संगठित होकर ही उनके इस अहसान को सम्मान दिया जा सकता है। जहां ओबीसी के प्रमाणपत्र नहीं बन रहे हैं वहां यह विसंगति केवल प्रशासनिक शिथिलता नहीं, बल्कि उस कुशल नेतृत्व और राजनीतिक प्रतिनिधित्व के अभाव का परिणाम है, जिसने इस समाज को संख्याबल में निर्णायक होने के बावजूद हाशिए पर धकेल दिया है।

    sadhna ray
    श्रावस्ती सांसद का भव्य सम्मान करेगा बुंदेलखंड कसौंधन समाज

    संगठन मंत्री ने आगे कहा कि मौन की इस लंबी काली रात के बाद हाल ही में संसद के गलियारों से एक उम्मीद की किरण फूटती दिखाई दी है। श्रावस्ती के सपा सांसद चौधरी रामशिरोमणि वर्मा जी ने जिस मुखरता और संवेदनशीलता के साथ संसद सत्र में कसौंधन समाज की पीड़ा और उनके हक की बात रखी, उसने दशकों से सोई हुई चेतना को झकझोर कर रख दिया है। यह पहली बार है जब किसी जनप्रतिनिधि ने इस समाज के साथ हो रहे ‘प्रशासनिक अनदेखी’ को देश की सबसे बड़ी पंचायत के समक्ष प्रस्तुत किया है। यह हुंकार उस अन्याय के विरुद्ध एक शंखनाद है, जिसे समाज की कमजोरी समझकर नजरअंदाज किया जाता रहा था। इस साहसी पहल के लिए बुंदेलखंड कसौंधन समाज समेत समस्त प्रदेश का एक-एक परिवार सांसद महोदय का हृदय से शुक्रगुजार है।

    अब समय आ गया है कि कसौंधन समाज अपनी चुप्पी को तोड़े और ऐसे लोगों का पिछलग्गू बनने से बचे जो केवल इनका फायदा उठाता आया है। अपनी एकता की ताकत का प्रदर्शन करे। राजनीतिक प्रतिनिधित्व का शून्य तभी भरेगा जब समाज अपने अधिकारों के लिए संगठित होकर आवाज उठाएगा। कई नगर निकायों में कसौंधन समाज निर्णायक स्तर पर है, फिर भी बिना सही नेतृत्व के उसके हिस्से में राजनीतिक शून्य ही है। अब किसी एक ही दल की परिक्रमा छोड़कर, (जिसने इस समाज के हित का कभी ध्यान ही नहीं दिया) सही नेतृत्व के साथ सभी राजनीतिक दलों में अपनी पहुंच बनाए रखनी जरूरी है। कई क्षेत्रों में हार जीत के निर्णायक स्तर पर भी इस समाज की भागीदारी है। अब तो नीति यही कहती है जो समाज के लिए हितकर हो समाज उसके लिए लाभदायी हो न कि किसी एक दल का अधिकृत समर्थक बन कर रह जाए।

    Shravasti MP Chaudhary Ram Shiromani Verma

    श्रावस्ती के सपा सांसद चौधरी राम शिरोमणि वर्मा जी के प्रति कृतज्ञता प्रकट करने और इस संघर्ष को निर्णायक मोड़ तक ले जाने के लिए समाज की प्रतिनिधि टीम जल्द ही लखनऊ पहुंचकर उनका अभिनंदन करेगी। यह सम्मान केवल एक व्यक्ति का नहीं, बल्कि उस ‘हक की आवाज’ का सम्मान होगा जिसने हमें अपनी पहचान और अधिकारों के लिए लड़ना सिखाया है। हमें यह समझना होगा कि कश्मीर से विस्थापित होकर भारत के हृदय प्रदेशों में बसने वाला यह धैर्यवान समाज अब और उपेक्षा सहन नहीं करेगा। शासन और प्रशासन को यह स्पष्ट संदेश जाना चाहिए कि 1997 का वह शासनादेश अब फाइलों में नहीं, बल्कि जमीन पर लागू होना चाहिए।

    आज भी उपेक्षित कसौंधन समाज को देखते हैं इतिहास के आईने से

    इतिहास की धुंधली परतों में दफन कुछ गाथाएं जब वर्तमान के संघर्ष से टकराती हैं, तो कसौंधन समाज जैसे एक स्वाभिमानी और धैर्यवान कौम का चेहरा उभरता है। मूल रूप से सिंधुघाटी सभ्यता (कांस्य युगीन सभ्यता) और उसके पतन के बाद कश्मीर की तरफ रुख करने वाली इस आदिम मूल जाति ने अपना व्यवसाय यहां भी बरक़रार रखा। कांसे के बर्तन बनाना और उससे संबंधित व्यवसाय उन्हें विरासत के रूप में मिला। विरासत संबंधित व्यवसायों का इतिहास काफी पुराना है। कसौंधन जाति का अस्तित्व भी सिंधु घाटी सभ्यता काल का है।

    हड़प्पा सभ्यता एक व्यापारी प्रधान सभ्यता थी। कसौधन समाज जिस प्रकार के व्यापार (धातु, अनाज, मसाले) से जुड़ा रहा है, वह उसी प्राचीन वाणिज्यिक परंपरा का विस्तार माना जाता है।

    हड़प्पा सभ्यता में पशुपति शिव की मुहरें मिली हैं। बागेश्वर (पशुओं/बाघ के स्वामी) की पूजा उसी आदि-शिव परंपरा का हिस्सा है जो सिंधु घाटी से लेकर कश्मीर के शैव दर्शन तक फैली हुई है।

    पौराणिक ग्रंथों और ऐतिहासिक तथ्यों के अनुसार काश्मीर का संबंध कश्यप ऋषि से बताया जाता है। उस काल में कसौंधन समाज का भी संबंध काश्मीर से रहा, इस समाज के गोत्र भी कश्यप ऋषि जी हैं।

    हड़प्पा सभ्यता काश्मीर तक फैली रही, और काश्मीर में कई क्षेत्र ऐसे चिह्नित हैं जो तांबे की परित्यक्त खदानों के रूप में आज भी दिखाई देती हैं। प्राचीन काल से लगभग औरंगजेब के साम्राज्य विस्तार से पहले तक यहां नक्काशीदार तांबे के बर्तन का बड़ा व्यवसाय था। यह व्यवसाय कसौंधन समाज के तमाम लोगों का परंपरागत व्यवसाय रहा, औरंगजेब के शासन काल में जब यहां कुछ प्रताड़ना बढ़ी तो इस समाज के लोगों ने धर्म परिवर्तन की जगह पलायन करना उचित समझा।

    यहां भी इन्हें अपनी पैतृक जड़ों से उखाड़ने पर मजबूर कर दिया गया। अपनी संस्कृति और धर्म की रक्षा हेतु किए गए उस महान पलायन ने उन्हें उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, झारखंड और बिहार जैसे राज्यों की माटी में तो बसा दिया, लेकिन विस्थापन की वह टीस आज भी अब प्रशासनिक उपेक्षा के रूप में उनके सीने में दर्ज है।

    कालांतर में कांसे के व्यापार में अपनी निपुणता के कारण ‘कसौंधन’ के नाम से विख्यात यह समाज आज भी खुद को वैश्य समुदाय के एक उपवर्ग के रूप में मानता है जिसकी आर्थिक और सामाजिक स्थिति उसे पिछड़ों की श्रेणी में लाकर खड़ा करती है।

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