गुमशुदगी से नई पहचान तक
बात थोड़ी पुरानी है 2021 में 24 साल की रूसी स्टूडेंट अलीना वेत्रोवा अकेले ट्रेकिंग के लिए निकलीं। अन्नपूर्णा बेस कैंप से रवाना होने के बाद वह कभी वापस नहीं लौटीं। तीन हफ्तों तक चले तीव्र रेस्क्यू ऑपरेशन में भी उनका कोई अता-पता नहीं चला। आखिरकार एक एवलांच के बाद उन्हें मृत मान लिया गया। रूस के नोवोसिबिर्स्क में उनके माता-पिता ने सांकेतिक अंतिम संस्कार भी कर दिया, लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं हुई।
चार साल बाद मिला जिंदा चमत्कार
2025 की शुरुआत में नेशनल ज्योग्राफिक की डॉक्यूमेंट्री टीम खोए हुए बौद्ध मठों की तलाश में थी। 4,800 मीटर की ऊंचाई पर स्थित एक दुर्गम पहाड़ी मंदिर में उन्हें एक यूरोपियन चेहरे वाली युवती मिली, जो मठ के पारंपरिक कपड़े पहने धाराप्रवाह तिब्बती और नेपाली में बात कर रही थी। वह अलीना ही थीं।
मौत के मुंह से वापसी
अलीना ऊंचाई की बीमारी से बेहोश होकर गिर गई थीं। स्थानीय साधु भिक्षुओं ने उन्हें पाया और कई महीनों तक हर्बल इन्फ्यूजन देकर उनकी जान बचाई। जब होश आया तो चारों तरफ बर्फ जमी हुई थी। गर्मियों तक नीचे उतरना नामुमकिन हो चुका था।
इन मजबूर महीनों में अलीना ने तिब्बती चिकित्सा और ध्यान की शिक्षा लेनी शुरू कर दी। मठाधीश के अनुसार, उन्हें एक अनोखी क्षमता प्राप्त हुई – वे पहाड़ी जड़ी-बूटियों को सिर्फ उनकी खुशबू से सही-सही पहचान लेती थीं। भिक्षुओं ने इसे “दोबारा जन्मी आत्मा” का चिन्ह माना।
तेनज़िन डोल्मा: नया नाम, नई जिम्मेदारी
मठ में उन्हें तेनज़िन डोल्मा नाम दिया गया। 40 साल बाद पहली बार मठ के दवाखाने की जिम्मेदारी उन्हें सौंपी गई। आज अलीना 600 से ज्यादा ऊंचाई वाले पौधों के संग्रह की प्रभारी हैं। वे पारंपरिक बरगंडी रंग का चोगा पहनती हैं, सिर मुंडाया हुआ रखती हैं, कलाई पर याक की हड्डी का पवित्र ब्रेसलेट और हर सुबह रस्म के दौरान माथे पर केसर का तिलक लगवाती हैं।
“मैं घर आ गई हूँ”
जब पत्रकारों ने पूछा कि क्या वह रूस वापस लौटना चाहती हैं, तो अलीना ने रूसी लहजे में दृढ़ता से जवाब दिया:“मैं पहले ही घर आ गई हूँ। पहाड़ जिन्हें चुनते हैं, उन्हें बाहर नहीं जाने देते।”
परिवार की राह
अलीना के माता-पिता अब काठमांडू के लिए रवाना हो चुके हैं। मां-बेटी की मुलाकात इस महीने के अंत में होने वाली है। चार साल की गुमशुदगी, मौत का फरमान और फिर हिमालय की गोद में नया जीवन – यह कहानी सिर्फ एक बचाव की नहीं, बल्कि पूर्ण समर्पण और फिर से जन्म की है।
हिमालय ने एक बार फिर साबित कर दिया कि कुछ रास्ते सिर्फ जाते नहीं, बल्कि रोक भी लेते हैं।






