राहुल कुमार गुप्ता

तमाम सड़क हादसों पर अट्टाहस करती अकाल मृत्यु सुरसा की तरह अपना मुंह फैलाती ही जा रही है। प्रतिवर्ष लाखों लोग असमय ही काल के गाल में समा जाते हैं। क्या राजा क्या रंक!! जीवन की इस महाविभीषिका को जब हम रोज़ अखबार के पन्नों पर लहूलुहान आंकड़ों के रूप में देखते हैं, तो दिल दहल जाता है। लेकिन सबसे बड़ा दुर्भाग्य यह है कि हम इस महादु:खद समस्या को नियति मानकर बैठ गए हैं। इन सबका दोषी ईश्वर तब तक है जब तक हम अकर्मण्य बने बैठे हैं, संवेदना व्यक्त कर इतिश्री कर लेना ही इस संकट का समाधान नहीं है। यदि हम अतीत में चेचक, प्लेग और हैजा जैसी तमाम महामारियों को ईश्वर का प्रकोप मान कर केवल संवेदनाओं से ही इतिश्री कर लेते, तो आज महामारियों का वैज्ञानिक इलाज और उन पर विजय संभव नहीं होती। फिर हम सड़क पर बहते इस इंसानी खून को नियति का खेल मानकर हाथ पर हाथ धरे क्यों बैठे हैं? क्या सड़कों पर दम तोड़ती ज़िंदगियों को बचाना हमारी प्राथमिकता नहीं होना चाहिए?
भारत के संदर्भ में यदि सड़क हादसों के भयावह सच को आंकड़ों के आईने में देखें, तो स्थिति बेहद डरावनी और चिंताजनक नज़र आती है। देश का कोई भी राज्य इस त्रासदी से अछूता नहीं है। उत्तर प्रदेश, तमिलनाडु, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश और कर्नाटक जैसे बड़े राज्यों में तो स्थिति हर साल बदतर होती जा रही है। एक सरकारी अनुमान के मुताबिक, भारत में हर साल लगभग साढ़े चार लाख से अधिक सड़क दुर्घटनाएं होती हैं, जिनमें तकरीबन एक लाख सत्तर हजार से अधिक लोग अपनी जान गंवा देते हैं। इसका सीधा और दर्दनाक मतलब यह है कि देश में हर घंटे लगभग 18 से 20 लोग सड़क हादसों के कारण अकाल मृत्यु का ग्रास बन रहे हैं। इन आंकड़ों के पीछे सिर्फ संख्याएं नहीं हैं, बल्कि उजड़ते हुए हँसते-खेलते परिवार हैं, माताओं की सूनी होती गोद है, सुहाग का उजड़ना है और देश के उस युवा कार्यबल का असमय खत्म हो जाना है, जिसके दम पर राष्ट्र का निर्माण होना था।
वित्तीय और सामाजिक नुकसान के नज़रिए से देखें तो यह संकट भारत की अर्थव्यवस्था की रीढ़ को तोड़ रहा है। विश्व बैंक की एक रिपोर्ट के अनुसार, सड़क दुर्घटनाओं के कारण भारत को हर साल अपनी सकल घरेलू उत्पाद का लगभग 3 से 5 प्रतिशत तक का भारी-भरकम नुकसान उठाना पड़ता है। यह नुकसान सिर्फ गाड़ियों की टूट-फूट तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें उत्पादकता की हानि, चिकित्सा पर होने वाला बेतहाशा खर्च और पीड़ित परिवारों का आर्थिक रूप से पूरी तरह टूट जाना शामिल है। इन हादसों का शिकार होने वाले लगभग 70 प्रतिशत लोग 18 से 45 वर्ष के आयु वर्ग के होते हैं, जो अपने परिवार के एकमात्र कमाऊ सदस्य होते हैं। उत्तर प्रदेश जैसे सर्वाधिक आबादी वाले राज्य में जहां एक्सप्रेसवे पर रफ्तार का कहर लोगों की जान ले रहा है, वहीं तमिलनाडु और महाराष्ट्र जैसे आर्थिक रूप से समृद्ध राज्यों में वाहनों की सघनता और नियमों की अनदेखी के चलते सबसे ज्यादा दुर्घटनाएं दर्ज की जा रही हैं।\
उत्तरी राज्यों से लेकर दक्षिणी राज्यों तक, पहाड़ी मोड़ों से लेकर मैदानी हाईवे तक, इस तबाही का मुख्य कारण इंसानी लापरवाही, ओवरस्पीडिंग और सुरक्षा मानकों की घोर अनदेखी है। भारत में होने वाले कुल सड़क हादसों में से लगभग 70 प्रतिशत से अधिक हादसे केवल ओवरस्पीडिंग यानी तय सीमा से अधिक रफ्तार के कारण होते हैं। इसके बाद गलत दिशा में गाड़ी चलाना, शराब पीकर वाहन चलाना और गाड़ी चलाते समय मोबाइल फोन का इस्तेमाल करना, नींद पूरी न होने के बावजूद गाड़ी चलाना मौत को सीधा आमंत्रण दे रहा है। एक्सप्रेसवे पर होने वाले हादसों का एक बड़ा कारण ड्राइवरों को आने वाली हाईवे हिप्नोटिसिस यानी एक जैसी सड़क पर लगातार गाड़ी चलाने से आने वाली झपकी भी है। जब तक हम इन व्यावहारिक कारणों को वैज्ञानिक और तथ्यात्मक तरीके से नहीं समझेंगे, तब तक हम इस लहूलुहान होती व्यवस्था को नहीं बदल पाएंगे।
इस महाविभीषिका से पार पाने और असमय मौतों पर अप्रत्याशित रूप से रोक लगाने के लिए हमें एक बहुआयामी और कठोर रणनीति की आवश्यकता है। इसके लिए हम सब की जागरूकता, प्रबल इच्छा शक्ति और कठोर किंतु उचित सड़क नियमों के द्वारा ही इस पर काबू पाया जा सकता है। सबसे पहला और बुनियादी कदम आत्म-अनुशासन का है। दोपहिया वाहन चलाते समय केवल चालान से बचने के लिए नहीं, बल्कि अपनी खोपड़ी को सुरक्षित रखने के लिए आईएसआई मार्का हेलमेट पहनना अनिवार्य होना चाहिए, और यह नियम पीछे बैठने वाली सवारी पर भी उतनी ही कड़ाई से लागू हो। चार पहिया वाहनों में सीट बेल्ट का उपयोग एयरबैग को सही समय पर खुलने में मदद करता है, जिससे जान बचने की संभावना 50 प्रतिशत तक बढ़ जाती है। रफ्तार की एक सीमा तय करनी होगी क्योंकि गति से रोमांच आता है, लेकिन वही गति अंततः जान ले लेती है।

इसके साथ ही, जिला प्रशासन को भी अपनी पारंपरिक सुस्ती को छोड़कर आगे बढ़कर आवश्यकतानुसार कुछ स्थानीय नियम बनाकर इन दुर्घटनाओं को नियंत्रण में लाना होगा। प्रशासन को ब्लैक स्पॉट्स यानी जिन जगहों पर बार-बार दुर्घटनाएं होती हैं, उन्हें चिन्हित कर वहां रंबल स्ट्रिप्स, बेहतर रोशनी, स्पष्ट संकेतक और गति अवरोधक लगाने चाहिए। तकनीक का सहारा लेकर हर चौराहे और संवेदनशील मार्ग पर ऑटोमैटिक स्पीड डिटेक्शन कैमरे और सीसीटीवी नेटवर्क को मजबूत करना होगा ताकि नियमों का उल्लंघन करने वालों का सीधे घर पर भारी-भरकम चालान पहुंचे। भय बिनु होइ न प्रीत की तर्ज पर जब तक कानून का डर और जुर्माना बेहद सख्त नहीं होगा, तब तक लोग सड़कों पर मनमानी करने से बाज नहीं आएंगे।
इस पूरी मुहिम को एक जन-आंदोलन बनाने की ज़रूरत है। हर सप्ताह जगह-जगह शिविर लगा लोगों की राय भी ली जा सकती है और उन तमाम उचित सलाहों पर विचार कर त्वरित कार्रवाई की जा सकती है। स्कूल-कॉलेजों, सोसायटियों और व्यापारिक मंडलों के सहयोग से सड़क सुरक्षा कार्यशालाएं आयोजित की जानी चाहिए, जहाँ युवाओं को यातायात नियमों के प्रति संवेदनशील बनाया जा सके। इसके लिए अपने-अपने नगर स्तर पर सबको एकजुट होकर आवाज उठानी चाहिए। यह आवाज हम सबके ही खिलाफ होनी चाहिए जो सड़कों पर होने वाली मौतों को सामान्य घटना मानकर भूल जाते हैं। जब तक नागरिक खुद आगे आकर प्रशासन से सुरक्षित सड़कों, बेहतर इंफ्रास्ट्रक्चर और पारदर्शी ड्राइविंग लाइसेंस प्रक्रिया की मांग नहीं करेंगे, तब तक बुनियादी बदलाव संभव नहीं है।
हॉस्पिटल पहुंचने से पहले के’गोल्डन ऑवर यानी हादसे के ठीक बाद के पहले एक घंटे में यदि घायल को सही प्राथमिक उपचार मिल जाए, तो आधी से ज्यादा जानें बचाई जा सकती हैं। इसके लिए आम जनता को भी गुड समैरिटन यानी मददगार बनना होगा, पुलिसिया कार्रवाई के डर को छोड़कर घायल को तुरंत अस्पताल पहुंचाना होगा। सरकार भी ऐसे कर्मवीरों के प्रोत्साहन के लिए योजनाएं चला रखी है। हमें यह समझना होगा कि इन लापरवाहियों पर कब और किसका नंबर आएगा, यह कोई नहीं जानता। आज जो हादसा किसी अजनबी के साथ हुआ है, कल वह हमारे किसी बेहद करीबी या स्वयं हमारे साथ भी हो सकता है।
समय आ गया है कि हम संवेदनाओं की इतिश्री करने की इस खोखली परंपरा को हमेशा के लिए दफन कर दें। रोना-बिलखना और व्यवस्था को कोसना समाधान नहीं है, समाधान सामूहिक चेतना और कड़े धरातलीय प्रयासों में छिपा है। अपने और अपनों के जीवन के लिए हम सब एक होकर आगे बढ़ेंगे तो सफलताएं और अभय मिलना तय है। सुरक्षित सफर सिर्फ एक अधिकार नहीं, बल्कि हमारी ज़िम्मेदारी भी है। इस ज़िम्मेदारी को निभाएं और देश की सड़कों को सुरक्षित बनाएं।






