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    एक मजबूत लोकतंत्र के लिए आलोचना को हंसकर स्वीकार किया जाए

    ShagunBy ShagunMay 17, 2026 Current Issues No Comments3 Mins Read
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    For a strong democracy, criticism should be accepted with a smile.
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    क्या सच में कार्टून से डर गयी सरकार

    चूंकि मामला गरम है इसलिए इस पर बात किया जाना चाहिए। कुछ दिन पहले शेखर सुमन ने 14 साल बाद टेलीविजन पर धमाकेदार कमबैक किया। अपने नए शो ‘Shekhar Tonite’ में उन्होंने जो कहा, वह न सिर्फ व्यंग्य था बल्कि आज के भारत में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की दयनीय स्थिति का दर्पण भी।

    मामला एक 52 सेकंड के एनिमेटेड कार्टून का है, जिसे न्यूज़ पोर्टल ‘The Wire’ ने प्रकाशित किया था। इसमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का व्यंग्यात्मक चित्रण किया गया था। सरकार ने इसे राष्ट्रीय सुरक्षा (National Security) का खतरा बताते हुए तुरंत ब्लॉक करवा दिया।

    For a strong democracy, criticism should be accepted with a smile.
    एक मजबूत लोकतंत्र के लिए आलोचना को हंसकर स्वीकार किया जाए

    शेखर सुमन ने तंज कसते हुए पूछा कि “56 इंच की छाती के सामने 52 सेकंड का कार्टून भी भारी पड़ गया?” और आगे चुटकी ली कि अगर ऐसा चलता रहा तो आने वाले दिनों में Tom & Jerry और Doraemon भी राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा बन सकते हैं।

    हास्य अब खतरे की श्रेणी में?
    यह घटना अकेली नहीं है। पिछले कुछ वर्षों में राजनीतिक व्यंग्य, मीम्स, कार्टून और यहां तक कि मजाक पर भी सख्ती बढ़ती जा रही है। सत्ता के प्रति कोई भी आलोचना या हल्का-फुल्का तंज “अपमान”, “फेक न्यूज़” या “राष्ट्रीय सुरक्षा” के खांचे में फिट कर दिया जाता है।

    52 सेकंड का एक छोटा सा एनिमेशन, जिसमें कोई हिंसा नहीं, कोई उकसावा नहीं, सिर्फ व्यंग्य है – वह भी इतना खतरनाक माना गया कि उसे ब्लॉक करना जरूरी हो गया।

    सवाल उठता है: क्या सत्ता अब इतनी कमजोर हो गई है कि एक छोटे से कार्टून से भी डर जाती है? या फिर असहमति को बर्दाश्त करने की क्षमता ही खत्म हो गई है?

    लोकतंत्र में व्यंग्य की भूमिका :

    व्यंग्य लोकतंत्र का ऑक्सीजन है। दुनिया भर के महान लोकतंत्रों में कार्टूनिस्ट और कॉमेडियन सत्ता के सबसे बड़े आलोचक रहे हैं। भारत में भी आर.के. लक्ष्मण से लेकर कई नाम इस परंपरा के गवाह हैं। व्यंग्य सत्ता को आईना दिखाता है। जब यह आईना हटा दिया जाता है, तो सत्ता अंधेरे में रह जाती है।

    शेखर सुमन का इशारा सही है। अगर आज 52 सेकंड का कार्टून “राष्ट्रीय सुरक्षा” के लिए खतरा है, तो कल कोई भी हास्य, कोई भी मीम, कोई भी व्यंग्यात्मक पोस्ट उसी श्रेणी में आ सकता है। Tom & Jerry में हिंसा है, Doraemon में जादू है, और सुपरहीरो फिल्मों में सरकारों पर कटाक्ष – क्या ये सब भी अब “अनुपयुक्त” हो जाएंगे?

    सवाल समय का :

    • क्या आलोचना करने वाले हर आवाज को दबाने से देश मजबूत होता है?
    • क्या असहमति को “राष्ट्रीय सुरक्षा” का लेबल लगाकर चुप करा देने से लोकतंत्र सुरक्षित रहता है?
    • और सबसे महत्वपूर्ण – क्या सरकार एक 52 सेकंड के कार्टून के सामने इतनी कमजोर हो जाती है?

    शेखर सुमन की वापसी और उनका यह तीखा व्यंग्य याद दिलाता है कि हास्य अभी भी जिंदा है। लेकिन सवाल यह है कि सत्ता इसे कितना और कितने दिनों तक बर्दाश्त कर पाएगी।

    फिलहाल यह कहना उचित होगा कि एक मजबूत लोकतंत्र वो नहीं होता जहां सत्ता की आलोचना न हो सके, बल्कि वो होता है जहां ऐसी आलोचना को हंसकर स्वीकार किया जाए। 52 सेकंड का कार्टून अगर इतना भारी पड़ रहा है, तो शायद समस्या कार्टून में नहीं, बल्कि उस छाती की संवेदनशीलता में है। अंत में यही कहना है कि हंसना लोकतंत्र का अधिकार है। इसे छीनने की कोशिश न की जाए।

    Shagun

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