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    Home»धर्म»Spirituality

    रामायण काल से जुड़ा है मेरठ का मनसा देवी मन्दिर

    ShagunBy ShagunMay 29, 2026Updated:May 29, 2026 Spirituality No Comments12 Mins Read
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    Mansa Devi Temple in Meerut is associated with the Ramayana period.
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    देवेश पांडेय ‘देश’

    मेरठ नगर में अनगिनत ऐसी धरोहरें हैं जो सैकड़ों से हजारोंं वर्ष प्राचीन हैं। इन्हीं में से एक है मेरठ का मनसा देवी मन्दिर। ऐसी मान्यता है कि यह मन्दिर न सिर्फ महाभारत काल से जुड़ा है, बल्कि इसका जुड़ाव रामायण काल से भी है। मेरठ के कलियागढ़ क्षेत्र की जागृति विहार कालोनी के अन्तर्गत आने वाला मनसा देवी मन्दिर नगर के सबसे प्राचीन और प्रमुख धार्मिक स्थलों में से एक है।

    ऐसा माना जाता है कि असुर सम्राट मय की बेटी एवं लंकाधिपति रावण की पत्नी मंदोदरीे भी इस मन्दिर में पूजा-अर्चना करती थीं। पौराणिक कथाओं के अनुसार माँ मनसा देवी को ऋषि कश्यप और कद्रू की पुत्री तथा नागराज वासुकी की बहन माना जाता है। इसलिए मान्यता है कि यहाँ पूजा करने से सर्पदंश का भय, राहु-केतु के दोष और कालसर्प दोष से मुक्ति मिलती है। कालियागढ और इसके आस-पास के दर्जनों गांवों के लोग माँ मनसा देवी को अपनी कुलदेवी के रूप में पूजते हैं। ऐसा कहा जाता है कि प्राचीन समय में रावण की पत्नी मंदोदरी विवाह से पूर्व पास ही स्थित सूरजकुण्ड में स्नान करने के बाद यहां माता रानी की पूजा-अर्चना करने आती थीं। यह प्रथा आज भी जस की तस चली आ रही है।

    कहा जाता है कि एक समय इस स्थान पर घनघोर अरण्य क्षेत्र (जंगल) हुआ करता था। हिंसक वन्य जीवों का यहां पर साम्राज्य रहता था। सैकड़ों वर्षों तक यहां आम लोग जाने तक से कतराते थे। रामायण काल और महाभारत काल अर्थात त्रेता एवं द्वापर युग में यह अत्यन्त विशाल एवं भव्य मन्दिर हुआ करता था। इन दोनों युगों में स्थानीय राजाओं के सैकड़ों सैनिक इसकी सुरक्षा में रात-दिन लगे रहते थे। समय बदला, साम्राज्य बदला फिर आया मुगल काल। मुगलों ने इसे बुरी तरह से तोड़ा और लूटा, यहां तक की इस मन्दिर की प्रतिमाओं को खण्डित करने से भी उन्होंने तनिक भी संकोच नहीं किया। इस मन्दिर के स्थान पर इसके चारों ओर के एक बार फिर जंगल का साम्राज्य हो गया। मुख्य प्रतिमा किसी प्रकार से मन्दिर के पुजारियों ने यहां से हटा दी और पास ही स्थित सूर्य कुण्ड में छिपा दी थी। जब इस स्थान से मुस्लिम शासकों का ध्यान हट गया तो उन्हीं पुजारियों के वशंजों ने निकट के कुण्ड में छिपायी गयी माँ मनसा देवी की प्रतिमा को निकालकर एक छोटी सी मठिया बनाकर उसमें पुन: प्राण-प्रतिष्ठिïत कर दी। मंदोदरी काल में यह सूर्य कुण्ड और आज सूरज कुण्ड के नाम से पुकारा जाता है। लेकिन तब बहुत कम लोग ही इस मठिया में पूजा करते थे, अधिकतर लोग घना जंगल होने के कारण हिंसक वन्य पशुओं के भय से यहां आने तक से कतराते थे।

    समय के साथ-साथ जंगल कटते गये और आस-पास के गाँवों के लोग यहां अपने घर-खानदान के लोगों की अन्त्येष्टि करने लगे, परिणाम स्वरूप कुछ समय बाद यह स्थान श्मशान भूमि में परिवर्तित हो गया। इसी कारण मेरठ के गढ़ रोड स्थित जागृति विहार के सूरजकुण्ड क्षेत्र में स्थित प्राचीन मनसा देवी मन्दिर स्थानीय स्तर पर ‘मरघट वाली माता का मन्दिर’ के नाम से भी पुकारा जाने लगा। एक किवदन्ती यह भी प्रचलित है कि पुराने समय में इस घने जंगल के पास ही ‘औरंगशाहपुर डिग्गी’ की श्मशान भूमि (मरघट) हुआ करती थी। इसी श्मशान भूमि के बीच में माता की यह प्राचीन मूर्ति स्थापित कर दी गयी थी। इसी वजह से आज भी बुजुर्ग लोग इसे ‘मरघट वाली माता का मन्दिर’ के नाम से भी संबोधित करते हैं। फिर इसके आस-पास पहले गाँव बसे और इसके बाद यहां का नगरीकरण होता गया। माता मनसा देवी मन्दिर की सेवा और देख-रेख ‘गिरी’ गोस्वामी परिवार की कई पीढिय़ां करती आ रही हैं। बाबा रामगिरी से शुरू हुई इस परम्परा का निर्वहन आज उनकी चौथी और पांचवीं पीढ़ी कर रहीं हैं।

    ‘गिरी’ गोस्वामी परिवार के पुजारी भगवत गिरी, अनिल गिरी आदि पूरे तन-मन से अपने कर्तव्यों का निर्वहन कर रहे हैं। मन्दिर परिसर में ही पुराने पुजारियों की समाधियां भी बनी हुई हैं। देवी के चरणों में भक्ति करने वाले पुजारी बाबा रामगिरी की कई पीढिय़ां निरन्तर देवी का पूजन कर रही है। बतातें हैं कि काफी पहले कालियागढ़ी के जंगलों से एक रास्ता औरंगशाहपुर डिग्गी को निकलता था। इसी रास्ते से होकर बाबा रामगिरी माँ के दरबार में अपनी उपस्थिति लगाने आते थे। उसके बाद इन्हीं के वंशज चनुवा गिरि, बिशंबर गिरि और उनके बाद अब भगवत गिरि और लक्ष्मण गिरि देवी माँ की आराधना करते हैं। एक परिवार माँ मनशा देवी तो दूसरा सन्तोषी माता का पूजन-अर्चन करते हैं।

    पुराने समय की भांति ही इस मन्दिर की मान्यता भी पुन: स्थापित होती गयी। आज लगभग साढ़े चार बीघा जमीन में फैले इस मन्दिर का अब पूरी तरह से नवीनीकरण हो चुका है। मुख्य मनसा देवी मन्दिर के अतिरिक्त मन्दिर परिसर में लगभग पच्चीस अन्य छोटे-बड़े मन्दिर बने हुए हैं। अन्य मन्दिरों में में प्रमुख रूप से संतोषी माता, भगवान शिव और हनुमान जी की प्रतिमाएं शामिल हैं। मनसा देवी मन्दिर की एक विशेषता यह भी है कि इसके अन्दर कुछ छोटे-छोटे द्वार बने हैं, जिनमें श्रद्धालुओं को झुककर प्रवेश करना पड़ता है, जो वैष्णो देवी की गुफा का अहसास कराता है। सामान्यत: भगवान के सामने आंखें बन्द करके प्रार्थना की जाती है, वहीं इस मन्दिर के बारे में मान्यता है कि श्रद्धालु माँ की प्रतिमा को निहारते हुए, आंखें खोलकर अपनी मनोकामनांएं पूर्ण करने की माँ से प्रार्थना करते हैं और माँ उनकी ‘मंशा’ (इच्छा) पूरी करती हैं। यदि इसके भवन की वास्तुकला और पारम्परिक वास्तु नियमों के प्रभाव को समझें, तो इसकी बनावट में उत्तर भारतीय मन्दिरों की निर्माण पद्धतियों की झलक मिलती है।Mansa Devi Temple in Meerut is associated with the Ramayana period.

    वर्ष 1990 और उसके बाद के समय में इस परिसर का जीर्णोद्धार किया गया था, इसके बाद इसे वर्तमान भव्य स्वरूप मिला। इस मन्दिर का मुख्य भवन पारम्परिक मठनुमा आकृति और नागर शैली के मिश्रण पर आधारित है। गर्भगृह के ठीक ऊपर एक शंक्वाकार अथवा टॉवर जैसी संरचना बनी है, जिसे शिखर कहा जाता है। उत्तर भारतीय मन्दिरों में यह शिखर ब्रह्माण्ड की ऊर्जा को केन्द्रित करने का मुख्य केन्द्र माना जाता है। वास्तु शास्त्र के अनुसार किसी भी मन्दिर या पवित्र भवन का मुख्य प्रवेश द्वार पूर्व या उत्तर-पूर्व दिशा अर्थात ईशान कोण में होना सबसे शुभ माना जाता है। मनसा देवी मन्दिर परिसर का मुख्य लेआउट भी सूर्य की पहली किरणों और सकारात्मक ऊर्जा के प्रवाह को ध्यान में रखकर बनाया गया है, जिससे प्रवेश करते ही भक्तों को शान्ति का अनुभव होता है। मन्दिर के प्रवेश भाग पर एक ऊंचा द्वार बना है। प्राचीन भारतीय वास्तुकला में इसे ‘ड्रम हाउस’ या नागरखाना भी कहा जाता है, जो मुख्य परिसर की सुरक्षा और पवित्रता को बनाए रखने के लिए एक घेरे के रूप में कार्य करता है। मुख्य भवन के प्रांगण को इस तरह विभाजित किया गया है कि मुख्य देवी के साथ-साथ अन्य देवी-देवताओं को भी वास्तु सम्मत स्थान मिल सके।

    वर्तमान में इस परिसर में पांच मुख्य दरबार स्थित हैं। परिसर में शिव परिवार, संतोषी माता और रामभक्त हनुमान जी के अलग-अलग उप-मन्दिर बने हुए हैं। वास्तु शास्त्र के ‘देवता विन्यास’ के नियम के अनुसार शिव परिवार और हनुमान जी के विग्रहों को मुख्य गर्भगृह के आसपास इस प्रकार स्थान दिया गया है ताकि पूरे परिसर में ऊर्जा का संतुलन बना रहे। मन्दिर परिसर में प्राकृतिक तत्वों को भी उचित महत्व दिया गया है। मन्दिर परिसर में एक बहुत प्राचीन वटवृक्ष (बरगद का पेड़) स्थित है, जहां भक्त मनोकामनाओं का धागा बांधते हैं। वास्तु और हिन्दू संस्कृति में मन्दिर परिसर के भीतर उत्तर या पूर्व दिशा में बड़े और पूजनीय वृक्षों का होना पर्यावरण और आध्यात्मिक ऊर्जा लिए अत्यंत शुभ माना जाता है। मुख्य प्रतिमा में सजीवता का समावेश है। मन्दिर की दीवारों और स्तम्भों पर बारीक नक्काशी की गयी है। गर्भगृह में माता मनसा देवी की मूर्ति की आँखें विशेष रूप से बड़ी और सजीव बनायी गयींं हैं।

    मान्यता और वास्तु दर्शन के अनुसार विग्रह (मूर्ति) के नेत्र सीधे भक्त की दृष्टि से मिलने पर सकारात्मक तरंगों का आदान-प्रदान होता है। मन्दिर के मूल गर्भगृह में माता मनसा देवी प्राचीन पिण्डी रूप में स्थापित हैं। वास्तु शास्त्र के अनुसार भूमि स्तर या उससे थोड़े निचले तल पर पिण्डी की स्थापना भूमि की प्राकृतिक और सकारात्मक ऊर्जा को सीधे गर्भगृह से जोड़ती है। स्थानीय इतिहास और मान्यताओं के अनुसार इस क्षेत्र का सम्बन्ध रामायण काल (रावण की पत्नी मंदोदरी का मायका मेरठ माना जाता है) और महाभारत काल से भी जोड़ा जाता है। समय-समय पर अर्थात मराठा काल से लेकर 1990 के दशक तक हुए पुनर्निर्माणों के कारण इस मन्दिर में प्राचीन आस्था और आधुनिक स्थापत्य कला का एक सुन्दर समन्वय देखने को मिलता है।

    मनसा देवी को भगवान् शिव की मानस पुत्री कहा जाता है। इन्हें काफी गुस्से वाली देवी समझा जाता है क्योंकि इन्हें परिवार से काफी उपेक्षित होना पड़ा था, लेकिन इन्हें अपने माता-पिता से यह वरदान मिला था कि इनकी पूजा करने वाले की मनोकामना अवश्य पूरी होगी। मनसा देवी सर्प और कमल पर विराजमान होती हैं। कहीं-कहीं ये हंस पर भी विराजमान है। कथा के अनुसार सात नाग इनकी सदैव रक्षा करते हैं। कई जगह इनकी गोद में एक बालक को भी दिखाया जाता है, जो इनका पुत्र आस्तिक है और जिसने नाग वंश की रक्षा भी की थी। सर्प पर विराजित होने के कारण इन्हें सर्पों की देवी भी कहा जाता है और इसी कारण सांप काटने अथवा इससे जुड़ी अन्य परेशानी का समाधान पाने के लिए लोग मनसा देवी की अराधना करते हैं। इनके सात नामों जरत्कारु, जगद्गौरी, मनसा, सिद्धयोगिनी, वैष्णवी, नागभगिनी, शैवी, नागेश्वरी, जरत्कारुप्रिया, आस्तिकमाता और विषहरी के जाप से नाग का भय नहीं रहता।

    मनसा का एक नाम वासुकी भी है। कद्रू और कश्यप के पुत्र वासुकी की बहन होने के कारण मां मनसा का नाम वासुकी भी पड़ा था। मनसा देवी के जन्म से जुड़ी कई पौराणिक कहानियां प्रचलित हैं। मनसाविजय के अनुसार वासुकि नाग की माता ने एक कन्या की प्रतिमा का निर्माण किया, जो शिव वीर्य से स्पर्श होते ही एक नागकन्या बन गयी और मनसा देवी कहलायी। जब शिव की मनसा पर दृष्टिï पडी, तो मनसा ने बताया कि वह उनकी बेटी है। भगवान शिव मनसा को लेकर कैलाश गये, लेकिन माता पार्वती ने जब शिवजी को एक पराई स्त्री के साथ देखा, तो उन्होंने चण्डी रूप धारण कर लिया और मनसा पर हमला करने के लिए आगे बढी, लेकिन भगवान शंकर ने उन्हें रोका और बताया कि यह मनसा है और उनकी और पार्वती की ही बेटी हैं। एक अन्य कथा के अनुसार जब समुद्र मंथन के दौरान विष निकला था और भगवान शिव ने जन कल्याण के लिए उसे स्वयं पी लिया था, तो उस विष के जलन से शिवजी का कण्ठ नीला पड़ गया था। तब शिवजी ने अपने मानस से एक विषकन्या को जन्म दिया था जिसने भगवान शिव का सारा ज़हर निकाला और उनके गले को आराम दिया। यही विष कन्या को माँ मनसा देवी का कहा गया, जिनको भगवान् शिव की पुत्री के तौर पर भी जाना जाता है।

    ब्रह्मवैवर्त पुराण के अनुसार एक नागकन्या भगवान शिव तथा कृष्ण की भक्त थी। उसने कई युगों तक तप किया तथा शिव से वेद तथा कृष्ण मंत्र का ज्ञान प्राप्त किया, जो मंत्र आगे जाकर कल्पतरु मंत्र के नाम से प्रचलित हुआ। उस कन्या ने पुष्कर में तप कर कृष्ण के दर्शन किए तथा उनसे सदैव पूजित होने का वरदान प्राप्त किया। कुछ पौराणिक धार्मिक ग्रन्थों के अनुसार माँ मनसा का जन्म कश्यप ऋषि के मस्तक से हुआ। कश्यप ऋषि की पत्नी का नाम कद्रू था। कहते हैं कि भगवान शिव से ही मनसा देवी ने शिक्षा-दीक्षा ग्रहण की।

    मां मनसा देवी के दरबार में पूजा करने की विधि बहुत ही सरल और लोक-परम्पराओं पर आधारित है। इस मन्दिर की सबसे अनोखी परम्परा यह है कि यहाँ भक्त अपनी आँखें बन्द करके नहीं, बल्कि आँखें खोलकर माँ की प्रतिमा को सीधे निहारते हुए अपनी इच्छा या ‘मंशा’ माँ के समक्ष प्रकट करते हैं। माना जाता है कि ऐसा करने से मां भक्त की पुकार तुरन्त सुनती हैं। मां मनसा देवी को प्रसन्न करने के लिए श्रद्धालु मुख्य रूप से मुरमुरे (लइया), बताशे और हलवा-पूड़ी का भोग लगाते हैं। मनोकामना पूर्ण होने पर बहुत से लोग यहाँ भण्डारा भी करवाते हैं।

    मन्दिर में अपनी मनोकामना पूर्ति के लिए पवित्र धागा (मौली) बांधने की परम्परा है। इसके साथ ही कई श्रद्धालु अपनी इच्छाओंं को कागज पर लिखकर भी माँ के चरणों में प्रार्थना लगाते हैं। मंशा देवी को कालिया गढ़ी और आसपास के दर्जनों गांवों के लोग कुल देवी मानते हैं। बच्चों के संस्कार आदि देवी की छत्र-छाया में सम्पन्न करते हैं। मुरमुरे और बताशे के भोग से देवी प्रसन्न हो जाती हंै। नवरात्र में विशेष पूजा-अर्चना होती है। जागृति विहार (कालियागढ़ी) स्थित मां मनसा देवी मंदिर के खुलने-बंद होने का समय और दर्शन की विधि मन्दिर समिति की ओर से निर्धारित है। मनसा देवी मन्दिर के द्वार श्रद्धालुओं के लिए सप्ताह के सातों दिन खुले रहते हैं। लेकिन मन्दिर की व्यवस्थओं एवं मन्दिर परिसर की सफाई के लिए दर्शन के लिए समय निर्धारित किया गया है। इसके अनुसार मन्दिर प्रात:काल सुबह 05:00 बजे खुलता हैं और रात्रि 09:00 बजे बन्द हो जाता है।

    शारदीय एवं वासन्तिक नवरात्रों में नवरात्र के दौरान इस मन्दिर की आभा देखने लायक होती है। नौ दिनों तक माता का अलग-अलग रंगों के चोलों (जैसे बुधवार को हरा, गुरुवार को पीला, शनिवार को नीला) से विशेष श्रृंगार किया जाता है। इन दिनों यहाँ लगातार भण्डारे चलते हैं और श्रद्धालुओं का भारी तांता लगा रहता है। दानों नवरात्रों के पूरे नौ दिनों भक्तों की भारी भीड़ को देखते हुए मन्दिर के कपाट तडक़े सुबह खोल दिये जाते हैं और रात्रि में देर तक खुले रहते हैं। हर रविवार को यहाँ विशेष मेला लगता है, इसलिए रविवार के दिन आम दिनों की तुलना में भक्तों की संख्या काफी अधिक होती है। मुख्य मन्दिर परिसर में कुछ छोटे और गुफा जैसे द्वार बने हुए हैं।

    दर्शन की विधि का एक भाग यह भी है कि श्रद्धालुओं को यहाँ झुककर प्रवेश करना होता है, जो विनय और श्रद्धा का प्रतीक माना जाता है। ?यदि कोई कालसर्प दोष, राहु-केतु दोष या सर्प भय से मुक्ति के लिए आ रहा है, तो वे मन्दिर में गिरी गोस्वामी परिवार पुजारियों की देखरेख में विशेष रूप से रविवार के दिन विशेष अर्चना करते हैं। यदि आप पहली बार जा रहे हैं, तो रविवार या नवरात्रि के दिनों में सुबह जल्दी पहुँचना दर्शन के लिहाज से सबसे उत्तम रहेगा।

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