भारत में वेश्यावृत्ति अब कोई छिपा हुआ मुद्दा नहीं रह गया है। यह शहरों से लेकर कस्बों और गांवों तक फैल चुका है, और इसके पीछे एक संगठित आर्थिक तंत्र काम कर रहा है। दिल्ली के मध्यवर्गीय होटलों से लेकर यूपी-बिहार के छोटे शहरों तक, ‘स्पेशल सर्विस’ का ऑफर अब सामान्य बात हो गई है। कई होटल तो इस धंधे का हिस्सा बन चुके हैं, जहां चेक-इन के कुछ मिनटों में ही सौदा तय हो जाता है।
समस्या देहात तक पहुंच गई है। ‘ऑर्केस्ट्रा’ या ‘लोकल पार्टी’ के नाम पर आयोजित कार्यक्रम अक्सर इस जाल का हिस्सा बन जाते हैं। पुलिस छापे मारती है, गिरफ्तारियां होती हैं, लेकिन कुछ दिनों बाद सब सामान्य हो जाता है। कारण सरल है – मांग बनी हुई है, सप्लाई जारी है, और बीच की कड़ी मजबूत है।
आंकड़े चिंताजनक हैं। उत्तर प्रदेश और बिहार बाल तस्करी के शीर्ष राज्यों में शामिल हैं। दिल्ली में कोविड के बाद बाल तस्करी के मामलों में 68% की वृद्धि दर्ज की गई है। हाल ही में एनआईए ने बिहार, यूपी और दिल्ली में छापे मारे, जहां कंबोडिया से जुड़े मानव तस्करी और साइबर गुलामी के नेटवर्क सामने आए। इससे साफ है कि यह अब सिर्फ स्थानीय धंधा नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय गिरोहों से जुड़ा माफिया तंत्र बन चुका है।
इस व्यापार में फंसने वाली लड़कियों की कहानियां लगभग एक समान हैं। ज्यादातर प्रेम संबंधों में धोखा खाकर घर छोड़ चुकी हैं, लौटने का रास्ता बंद हो गया तो मजबूरी में इस जाल में फंस गईं। कुछ बॉलीवुड या मॉडलिंग का सपना लेकर आईं, लेकिन अंत में exploitation शोषण का शिकार बनीं। बढ़ती महत्वाकांक्षा और तुरंत अमीरी की चाहत वाली नई पीढ़ी भी इसमें शामिल हो रही है-सोशल मीडिया पर दिखने वाली ‘लाइफस्टाइल’ को पाने के लिए आसान रास्ता चुन लिया जाता है।
आर्थिक पक्ष और भी भयावह है। अनुमानों के मुताबिक यह अंडरग्राउंड अर्थव्यवस्था हजारों करोड़ रुपये की है। ग्राहक हर वर्ग से आते हैं-मजदूर से लेकर प्रभावशाली लोग तक। सप्लाई चेन भी विविध है: गांव से लाई गई मजबूर लड़कियां और शहरों की शिक्षित-महत्वाकांक्षी युवतियां। पूरा इकोसिस्टम चलता है-होटल मालिक, दलाल, सुरक्षा देने वाले और विरोध करने वालों को चुप कराने वाले गुंडे।
पटना के बंटी यादव इसी व्यवस्था की भेंट चढ़ गए। पड़ोस में चल रहे इस धंधे के खिलाफ उन्होंने आवाज उठाई। परिणाम? अपहरण और हत्या। ऐसी घटनाएं दिखाती हैं कि विरोध की कीमत जानलेवा हो सकती है। न्याय की उम्मीद कम है, क्योंकि बड़े खिलाड़ी अक्सर पहुंच से बाहर रहते हैं।
कानून अकेला इस समस्या का समाधान नहीं कर सकता। जरूरत है सामाजिक जागरूकता की, परिवारों में खुली बातचीत की, लड़कियों के लिए सुरक्षित रोजगार और स्किल डेवलपमेंट के अवसरों की। शिक्षा प्रणाली में नैतिक मूल्यों को मजबूत करने, सोशल मीडिया पर ग्लैमराइज्ड कंटेंट की जांच और महिलाओं की आर्थिक स्वतंत्रता बढ़ाने की भी।
सरकार को भी सिर्फ छापेमारी से आगे बढ़कर रोकथाम पर फोकस करना होगा—ट्रैफिकिंग रूट्स पर नजर, बॉर्डर सुरक्षा, और पुनर्वास कार्यक्रमों को प्रभावी बनाना। लेकिन सबसे बड़ा बदलाव समाज को लाना है। जब तक हम ‘व्यक्तिगत मामला’ कहकर आंखें मूंदते रहेंगे, तब तक बंटी जैसे साहसी युवा अकेले पड़ते रहेंगे।
समय है चुप्पी तोड़ने का। अगर हम आज नहीं जागे, तो कल हमारी बेटियां, बहनें और समाज का भविष्य और गहरे अंधेरे में खो जाएगा। नैतिक पुनर्जागरण के बिना यह लड़ाई नहीं जीती जा सकती।






