मेरे घर में खाना तो है नहीं

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प्रेरक प्रसंग

एक माहत्मा थे। उन्हें कभी गुस्सा नहीं आता था। उनकी कुटिया के पास एक नौजवान रहता था। उसे यह देखकर बड़ी हैरानी होती थी। आखिर ऐसा आदमी भी क्या कि उसे गुस्सा ही न आये। उसने उनकी परीक्षा लेनी चाही। एक दिन उसने उन्हें खाना खाने के लिए बुलाया। जब वह आये तो उसने कहा, “खाना तो खत्म हो गया।”
महात्मा ने मुस्कराकर कहा, “कोई बात नहीं है।”

इतना कहकर वह चल दिये। थोड़ी दर पहचे कि नौजवान ने उन्हें पुकारा। वह वापस आ गये तो बोला, “आप जैसे साधु बहुत फिरते हैं। वे पेटू होते हैं। मैं ऐसों को खाना नहीं खिलाता।”

महात्मा ने बड़े प्यार से उसकी ओर देखा और बोले, “तुम ठीक कहते हो।” इतना कहकर वह घर से बाहर आ गये कि तभी युवक ने उन्हें फिर पुकारा। वह लौटकर गये तो उसने कहा, “मेरे घर में खाना तो है नहीं, पत्थर हैं। खाना चाहो तो खा लो।”

महात्मा ने बड़ी शान्ति से उसके चेहरे को देखा। बोले, “पत्थर कहीं खाये जाते हैं!” युवक ने देखा कि महात्मा के चेहरे पर खीज या क्रोध का चिन्ह भी नहीं है, अपूर्व वात्सल्य झलक रहा है।

उसने महात्मा के पैर पकड़ लिये। पश्चाताप के स्वर में बोला, “महाराज, आप मेरी उद्दण्डता के लिए क्षमा करें। मेरे कारण आपको बड़ा कष्ट हुआ।”

महात्माजी ने युवक को उठाकर सीने से लगा लिया। बोले, “बेटे, गलती आदमी से ही हो जाती है, पर जो अपनी गलती को मान लेता है और फिर उसे न करने का संकल्प करता है, उसकी गलती उसके जीवन को सफल कर देती है।”

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