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    लता दीदी की आवाज से मिली अभिनेत्रियों को पहचान

    ShagunBy ShagunFebruary 10, 2022 ब्लॉग No Comments6 Mins Read
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    डॉ दिलीप अग्निहोत्री

    भारतीय संगीत के एक युग का अंत हुआ। स्वर सम्राज्ञी लता मंगेशकर अब हमारे बीच नहीं है। लेकिन अपने गीतों के माध्यम से वह अमर रहेंगी। प्रारंभ में उनके लिए फ़िल्म संगीत में स्थान बनाना आसान नहीं था। तब उनके जीवन संगीत व संघर्ष दोनों एक साथ थे। वह संघर्ष से पीछे नहीं हटी। चलती रही। इसी गति से उनकी स्वर लहरी फिजाओं में गूंजने लगी।

    भारतीय फिल्मों में संगीत पक्ष बेजोड़ रहा है। इस ओर सदैव बड़ी शिद्दत से ध्यान दिया जाता है। अनेक फिल्में गीत व संगीत के चलते सुपर हिट होती रही है। इनके गीत लोगों की जुबान पर रहते है। इस आधार पर लता मंगेशकर की बराबरी करने वाला कोई नहीं है। उन्होंने जब गायन प्रारंभ किया उस समय सुरैया व नूरजहां का जलवा हुआ करता था। दोनों गायिका होने के साथ सुप्रसिद्ध नायिकाएं भी थी। लता के लिए अपना मुकाम बनाना कठिन था। फिर भी लता शिखर पर सुशोभित हुई। उनके गीतों में बेसुमार रंग है। कुछ आनन्द को बढ़ाते है। कुछ उदास मन को सहारा देते है। बहलाते है।

    भारतीय फिल्म संगीत ने लंबी यात्रा तय की है। इसमें सर्वाधिक योगदान लता मंगेशकर का रहा है। इस संगीत यात्रा के अनेक पड़ाव है। प्रत्येक पड़ाव की अलग अलग विशेषताएं रही है। लता मंगेशकर ने अपने को प्रत्येक पड़ाव के लिए उपयुक्त व सामयिक प्रमाणित किया। गीतों की संरचना बोल व संगीत में बदलाव होते रहे। पीढ़ियों के अंतर से पसंद नापंसद भी बदलती रही। लेकिन प्रत्येक दौर में लता मंगेशकर की प्रासंगिकता कायम रही। उनकी आवाज हमेशा दिल की गहराइयों तक उतरती रही। राग अनुरागियों के लिए भी लता के गीतों का महत्व होता है। वह उनके गीतों में उतर कर विश्लेषण करते है। उनमें राग तत्व की तलाश करते है। उनकी समीक्षा करते है। तभी उनको लता बहुत से गीतों में अनेक रागों की झलक दिखाई देती है। इनमें भैरवी, नट भैरवी, पहाड़ी, चमन, पीलूराग मल्हार, मरु विहग, किरवानी, खमाज, शिव रजनी, सारंग, यमन कल्याण, भीम प्लासी दरबारी, भोपाली आदि अनेक शास्त्रीय राग शामिल है।

    1040 तक फिल्मी गीतों की रचना शास्त्रीय आधार पर होती थी। इसलिए पूरे गीत में एक ही राग होती थी। बाद में राग रागनियों के प्रति आग्रह नहीं रहा। तब भी एक गीत में अनेक राग समाहित रहते थे। अब तक की फिल्मों में डेढ़ सौ से अधिक रागों का समावेस देखा गया है। एक गीत को समय समय पर अलग अलग स्वर व विधि से गाया गया। पाकीजा फ़िल्म के गीत-

    इन्हीं लोगों ने
    ले लीन्हा दुप्पटा मेरा

    को लता ने स्वर दिया। यह बहुत लोकप्रिय हुआ था। लेकिन यह पहली बार किसी फिल्म में नहीं आया था। पाकीजा के पहले 1941 की फ़िल्म हिम्मत में यह गीत शमशाद बेगम ने गाया था। 1943 में इस गीत को एक फ़िल्म में पुरुष गायक जी एस दुर्रानी ने स्वर दिया था। लता जी द्वारा गया गया गीत अमर हो गया। इसी प्रकार मुगले आजम का गीत,

    मोहे पनघट पे नन्दलाल
    छेड़ गयो रे,

    लता ने गया था। जबकि 1936 में इंदुबाला ने इसे राग पीलू में गाया था। लता मंगेशकर के गीतों में चमक व स्थायित्व है।

    लता का जीवन केवल संगीत जगत के लिए ही नहीं सभी के लिए प्रेरणा दायक है। उनके परिवार में संगीत का माहौल था। पिता दीनानाथ मंगेशकर गायक थे। नन्हीं लता उनसे प्रेरणा लेती थी। उनसे सीखने का प्रयास करती थी। लेकिन यह संगत ज्यादा नहीं चल सकी। दीनानाथ मंगेशकर का आकस्मिक निधन हो गया। तब लता मात्र तेरह वर्ष की थी। इस अल्प आयु में उनके ऊपर अपनी, चार बहन और एक भाई की जिमेदारी आ गई। लता भाई बहनों में सबसे बड़ी थी। यह उनके विधिवत संगीत शिक्षा ग्रहण करने की अवस्था थी। लेकिन परिवार के भरण पोषण में यह संभव नहीं हो सका। संगीत के साथ साथ उनके जीवन में संघर्ष भी आ गया था।

    एक फ़िल्म के समूह गायन में अवसर मिला था। लेकिन संगीतकार ने कहा कि उनकी आवाज बहुत महीन है। यह आवाज फिल्मी गायन के उपयुक्त नहीं है। वह लता की प्रतिभा को समझने में नाकाम थे। जिस आवाज को वह नकार रहे थे, वह कई दशकों तक लोगों के दिलों पर राज किया। उनके ना रहने के बाद भी यह स्वर जीवंत बना रहेगा। एक साथ कई पीढ़ियों की नायिकाओं को उन्होंने स्वर दिया। पात्र बदलते रहे। समय अपनी गति से आगे बढ़ता रहा। लेकिन लता जी के गायन की ताजगी यथावत बनी रही। प्रारंभ में उन्हें प्रतिकूल परिस्थितियों का सामना करना पड़ा। उत्साह या हौसला बढ़ाने वाला कोई नहीं था। पिता का साया उठ गया था। भाई बहन सब छोटे थे। अपना रास्ता स्वयं बनाना था। इस समय यश वैभव की कामना नहीं थी। परिवार का भरण पोषण ही मुख्य उद्देश्य था। संगीत व फ़िल्म से सम्पर्क था। इस मार्ग पर ही चलना था। अन्य कोई विकल्प नहीं था। इसलिए तेरह वर्ष की आयु में भी लता मंगेशकर संघर्ष से पीछे नहीं हटी।

    एक समय ऐसा भी आया जब उनके गाने रेडियो पर प्रसारित होने लगे। इसके बाद ही उन्होंने अपने परिवार के लिए रेडियो खरीदा था। इसके पहले उनके परिवार की ऐसी स्थिति भी नहीं थी। वह आगे बढ़ती रही। संगीत साधना के साथ ही परिवार की जिम्मेदारी का बखूबी निर्वाह किया। इनके भाई व आशा भोसले सहित अन्य दोनों बहनों ने संगीत में विशेष मुकाम बनाया। लता ने छत्तीस से अधिक भाषाओं में गीत गए हैं। यह अपने में एक कीर्तिमान है।

    उन्होंने पांच वर्ष की अवस्था मे अपने पिता से संगीत सीखना प्रारंभ किया था। अपने पिता के नाटकों में वह अभिनय भी करती थी। बचपन में खूब व्यस्त रहती थी। इसलिए स्कूली शिक्षा नहीं हुई। नवयुग चित्रपट मूवी कंपनी के मालिक मास्टर विनायक उनके पिता के मित्र थे।

    उन्होंने लता को गायन व अभिनय हेतु प्रेरित किया। परिवार की जिम्मेदारी उठाने के लिए उन्होंने कई हिंदी और मराठी फिल्मों में अभिनय किया। इनमें उनकी भूमिका सीमित रहती थी। इसी समय सदाशिवराव नेवरेकर ने एक मराठी फिल्म में उन्हें गाने का अवसर दिया था। लता ने गाना रिकॉर्ड भी किया। लेकिन फिल्म के फाइनल कट से वो गाना हटा दिया गया। 1942 में रिलीज हुई मंगला गौर में लता का गाना शामिल हुआ। इसके तीन वर्ष बाद उनका परिवार मुम्बई आ गया। कुछ समय उन्होंने उस्ताद अमन अली खान से भारतीय शास्त्रीय संगीत सीखा।

    इसी वर्ष फिल्म बड़ी मां फिर आपकी सेवा में लता ने गाना गाया। इससे उन्हें प्रारंभिक पहचान मिली। निर्माता शशधर ने लता को अपनी फिल्म में गाने का मौका नहीं दिया था।
    गुलाम हैदर ने लता को मौका दिया। यहीं से लता की उन्नति का मार्ग प्रशस्त हुआ। 1949 में ‘महल के गीत-

    ‘आएगा आने वाला’

    से संगीत का लता मंगेशकर युग प्रारंभ हुआ था। लता का नाम स्वयं में एक पुरष्कार व सम्मान का प्रतीक बन गया था। सत्तर के दशक में उन्होंने फिल्मफेयर के सर्वश्रेष्ठ गायिका का पुरस्कार लेने से इनकार कर दिया था। उनका कहना था कि उन्हें बहुत सम्मान मिला। अब यह मौका नए लोगों को मिलना चाहिए। उनको भारत रत्न, पद्म भूषण, दादा साहेब फाल्के पुरस्कार, पद्म विभूषण सम्मान से भी सुशोभित किया गया था।

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