दिल्ली में 13 से 17 नवंबर तक ‘सम विषम’

0
859

सम-विषम प्रयोग का जो अनुभव रहा वह यह कि प्रदूषण में कोई खास फर्क नहीं पड़ा था, अलबत्ता सड़कों पर कारों की संख्या कम रहने से बाकी लोगों ने यातायात में राहत महसूस की थी

एक बार फिर दिल्ली में आॅड-इवन फार्मूला लागू हो गया है, यानी सम संख्या वाली तारीख के दिन सम संख्या वाली गाड़ियों को चलने की इजाजत होगी और विषम संख्या वाली तारीख पर विषम संख्या वाली गाड़ियों को। यह नियम फिलहाल सिर्फ पांच दिन लागू रहेगा, तेरह नवंबर से सत्रह नवंबर तक, सुबह आठ बजे से रात आठ बजे तक। छूटें व रियायतें मोटे तौर पर पिछली बार की तरह ही होंगी। मसलन, सीएनजी चालित वाहनों, बच्चों को स्कूल ले जाती कारों, एंबुलेंस आदिपर सम-विषम नियम लागू नहीं होगा। यह तीसरी बार है जब दिल्ली में सम-विषम फार्मूला लागू किया गया है, और इसी के साथ इसके औचित्य पर नए सिरे से बहस भी शुरू हो गई है।

इसमें दो राय नहीं कि दिल्ली-एनसीआर में जैसे हालात हैं उनके मद्देनजर कुछ कड़े कदम उठाना अपरिहार्य हो गया है। सम-विषम के पीछे मकसद नेक है, पर क्या यह कदम कारगर या व्यावहारिक भी हो सकता है? पहली बार जब सम-विषम योजना कुछ दिनों के लिए दिल्ली सरकार ने लागू की थी, तो उसे व्यापक समर्थन मिला था, सर्वोच्च न्यायालय के कई न्यायाधीशों ने भी उसकी सराहना की थी। लेकिन दूसरी बार सम-विषम के प्रति वैसा समर्थन या उत्साह नहीं रह गया था। इस बार भी पहली बार जैसा स्वागत का भाव नहीं दिखा है।

दरअसल, सम-विषम प्रयोग का जो अनुभव रहा वह यह कि प्रदूषण में कोई खास फर्क नहीं पड़ा था, अलबत्ता सड़कों पर कारों की संख्या कम रहने से बाकी लोगों ने यातायात में राहत महसूस की थी। मगर उस प्रयोग को क्रियान्वित करने के लिए कितने सारे इंतजाम करने पड़े थे! अतिरिक्त बसों की व्यवस्था करनी पड़ी, मेट्रो के फेरे बढ़ाने पड़े, नियमों के अनुपालन के लिए काफी संख्या में सुरक्षाकर्मी लगाए गए थे। इस बार भी वही सब करना पड़ रहा है। यह सारी कवायद क्या स्थायी रूप से की जा सकती है?

दूसरा सवाल है कि क्या सम-विषम से कारों के इस्तेमाल को स्थायी रूप से कम किया जा सकता है? अगर स्थायी तौर पर या काफी दिनों के लिए सम-विषम लागू हो जाए, तो ज्यादा संभावना यही है कि कार रखने वालों में बहुत-से लोग दूसरी कार खरीदने के बारे में सोचेंगे, जिसका पंजीकरण नंबर उनकी पहले वाली कार से उलट हो। या वे मोटर साइकिल खरीदेंगे। वैसी सूरत में निजी वाहनों की संख्या अस्वाभाविक रूप से बढ़ भी जा सकती है। लिहाजा, दिल्ली में वायु प्रदूषण से निपटने के लिए सम-विषम से आगे सोचने की जरूरत है। दिल्ली सरकार के प्रयोग की सीमाएं जाहिर हैं तो केंद्र की काहिली भी। केंद्र को संबंधित राज्यों के मुख्यमंत्रियों की बैठक बुलानी चाहिए थी, पर उसने यह पहल अब तक नहीं की है। जबकि दिल्ली के हालात बड़े भयावह हैं। सांस लेना मुश्किल हो रहा है।

दिवाली के बाद शीत ऋतु के आगमन के समय प्रदूषण और धुंध की मिश्रित मार सालाना कहर बनती जा रही है। पेट्रोल-डीजल चालित वाहनों से निकलने वाले प्रदूषण के अलावा दिल्ली-एनसीआर में निर्माण-कार्यों के चलते वातावरण में फैलने वाली धूल और पड़ोसी राज्यों में पराली जलाने को मौजूदा पर्यावरणीय संकट के मुख्य कारणों के तौर पर चिह्नित किया गया है। इसके मद््देनजर दिल्ली सरकार ने बुधवार को निर्माण-कार्यों पर फिलहाल रोक लगा दी, और पार्किंग की दरें काफी बढ़ा दीं। दूसरी तरफ राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने केंद्र और दिल्ली तथा पंजाब व हरियाणा की सरकारों को नोटिस भेजा है। संबंधित सरकारों को तलब करके आयोग ने एक तरह से मानवाधिकार को पर्यावरणीय आयाम दिया है। हमारे संविधान के अनुच्छेद इक्कीस में जीने के अधिकार की गारंटी दी हुई है। पर इस अधिकार का क्या अर्थ है, जब सांस लेना दूभर हो!

स्वास्थ्य के अधिकार के बगैर जीने के अधिकार का कोई अर्थ नहीं हो सकता। हमारी सरकारें अब यह तो मानती हैं कि पर्यावरण की अनदेखी नहीं की जानी चाहिए, मगर नीति-निर्माण में पर्यावरण को जैसी प्राथमिकता मिलनी चाहिए, अब भी नहीं दी जा रही है। प्रदूषण कोई आपदा नहीं है, जो अचानक आ गया हो। वायु प्रदूषण, जल प्रदूषण, ध्वनि प्रदूषण दिनोंदिन बढ़ते जा रहे हैं। लिहाजा, इनसे निपटने के लिए फौरी नहीं, बल्कि टिकाऊ अभियान चलना चाहिए। विडंबना यह है कि स्वच्छ भारत अभियान ने अभी तक पर्यावरणीय स्वच्छता से आंख चुरा रखी है।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here