क्या आईएएस, आईपीएस,डाक्टर, इंजीनियर,वकील, सीए बिना अंग्रेजी पढ़े बना जा सकता है
ओम माथुर
केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह अगर ये कह रहे हैं तो आज से ही भाजपा नेताओं को अपने बच्चों को इंग्लिश मीडियम स्कूलों से निकाल हिन्दी मीडियम या क्षेत्रीय भाषाओं की स्कूलों में भर्ती कराना चाहिए। साथ ही विदेशों में पढ़ रहे अपने बच्चों को वापस बुला लेना चाहिए। ताकि भविष्य में वो शर्मिंदा ना हो। साथ ही भाजपा को ये नियम भी बना देना चाहिए कि जो ये शपथ लिखकर देंगे कि वो अपने बच्चों को अंग्रेजी स्कूल में नहीं पढ़ाएंगे, उन्हें ही सत्ता और संगठन में पद मिलेंगे। पार्टी की सदस्यता भी उन्हें ही मिलेगी।
क्या कहा गृह मंत्री ने? गुरुवार को एक कार्यक्रम में शाह ने कहा कि वह दिन दूर नहीं जब देश में अंग्रेजी बोलने वालों को शर्मिंदगी महसूस होगी। हम सबके जीवनकाल में इस देश में एक ऐसा समाज बनेगा,जिसमें अंग्रेजी बोलने वालों को शर्म महसूस होगी। यदि हम अपनी भाषाओं को नहीं अपनाते, तो हम अपनी संस्कृति, इतिहास और धर्म को भी नहीं समझ पाएंगे। शाह का अंग्रेजी बोलने से शर्मिंदगी महसूस करने वाला समाज तो पता नहीं कब बनेगा,लेकिन यह कड़वी हकीकत है कि हमारे देश में अंग्रेजी नहीं बोलने से शर्मिंदगी महसूस करने वाला वर्ग सालों से हैं।
पता नहीं देश को चलाने वाले नेता क्या सोचकर ऐसे बयान देते हैं। हिन्दी और क्षेत्रीय भाषाओं का सम्मान होना चाहिए। इन्हें ज्यादा से ज्यादा बढ़ावा देना चाहिए। लेकिन इसके लिए अंग्रेजी से शर्मिंदगी की बात कहां से आ गई। आज भी हमारे देश की सच्चाई है कि अंग्रेजी बोलने वाले को सम्मान की नजरों से देखा जाता है और शिक्षा से लेकर न्यायिक कामों,व्यापार,नौकरी और पेशे तक अंग्रेजी का महत्व कभी कम नहीं हुआ है। तकनीकी शिक्षा तो पूरी तरह से अंग्रेजी में हैं। इसे हिंदी में करना और समझना क्या संभव हो सकेगा? सिविल सर्विस यानि आईएएस, आईपीएस आदि, राज्य प्रशासनिक सेवाओं, डाक्टर, इंजीनियर ,वकील, सीए क्या बिना अंग्रेजी पढ़े बना जा सकता है। इनकी तो प्रारंभिक परीक्षाओं में ही अंग्रेजी का बोलबाला है। हर साल अंग्रेजी स्कूलों में प्रवेश के लिए लगने वाली कतारें और सिफारिशें इस बात की गवाह है कि निम्न मध्यमवर्गीय और मध्यमवर्गीय परिवारों का तो सपना ही ये होता है कि उनके बच्चे को अंग्रेजी स्कूल में एडमिशन मिल जाए। सरकारी स्कूलों के कितने शिक्षक अपने बच्चों को निजी अंग्रेजी स्कूलों में पढाते हैं। कितने अधिकारियों, राजनेताओं, व्यवसायियों, उद्योगपतियों के बच्चे हिन्दी या क्षेत्रीय भाषा माध्यम की स्कूलों में पढ़ते हैं। हमारे यहां तो जिसे अंग्रेजी आती है,उसे नौकरी मिलना भी आसान माना जाता है। देश के सभी बड़े नेताओं,चाहे वो सत्ता पक्ष के हो,या विपक्ष के,के बच्चे अगर विदेशों में पढ़कर डिग्रियां ले रहे हैं,तो क्या उसमें उनका अंग्रेजी में दक्ष होना भी बड़ा कारण है।
गृहमंत्री कह सकते थे कि जिसे अंग्रेजी नहीं आती है,उसे शर्मिंदगी महसूस नहीं करनी चाहिए। ये होना भी चाहिए। जरूरी नहीं, सभी को अंग्रेजी आए। देश में लगभग 11 प्रतिशत और दुनिया में करीब 18 फीसदी लोग इंग्लिश बोलते हैं। लेकिन अंग्रेजी बोलने वाले शर्म महसूस करेंगे, ये मजाक लगता है। इसमें कोई शक नहीं है की अंग्रेजी वैश्विक भाषा है और लगभग अधिकांश देशों में बोली जाती और समझी जाती है। अपने देश की भाषा बोलने वाले नेता भी अंग्रेजी थोड़ी बहुत बोल और समझ लेते हैं। सोशल मीडिया पर ये कहा जा रहा है कि पिछले कुछ दिनों से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विदेश यात्राओं में अंग्रेजी बोलने में हड़बड़ाहट के कारण हो रही ट्रोलिंग के चलते शाह ने ये बात तो नहीं कही। खुद शाह के बेटे और आईसीसी के चेयरमैन जय शाह तो खुद आजकल लिखी हुई अंग्रेजी पढ़कर बोलते हैं। देश में भाषा विवाद के बीच शाह का अंग्रेजी के खिलाफ दिया गया बयान महत्वपूर्ण है। जब तमिलनाडु की डीएमकेनीत सरकार केंद्र पर हिंदी को थोपने का आरोप लगा रही है।







