एक देश में तो 10 हजार लोग ही बचे
नई दिल्ली। यह जाकर आपको अचरज होगा कि वैश्विक आबादी में तेजी से इजाफा हो रहा है, और भारत इस वृद्धि का एक प्रमुख केंद्र बना हुआ है। मीडिया रिपोर्ट और संयुक्त राष्ट्र के अनुमान के अनुसार, 2022 में भारत ने चीन को पीछे छोड़कर दुनिया की सबसे अधिक आबादी वाला देश बनने का गौरव हासिल किया। जहां भारत की जनसंख्या 1.4 अरब को पार कर चुकी है, वहीं दुनिया के कुछ देश ऐसे हैं जहां आबादी तेजी से घट रही है। इनमें यूक्रेन, जापान, ग्रीस जैसे देश शामिल हैं, जबकि प्रशांत महासागर के छोटे से द्वीप देश तुवालु में तो केवल 10 हजार लोग बचे हैं, और वहां जनसंख्या संकट अब अस्तित्व के खतरे में बदल रहा है। यह विडंबना भारत जैसे देश के लिए विचारणीय है, जहां आबादी का दबाव संसाधनों, बुनियादी ढांचे और पर्यावरण पर भारी पड़ रहा है।
वैश्विक आबादी: भारत का योगदान और चुनौतियां
विश्व की आबादी 1804 में 1 अरब थी, जो 2022 में 8 अरब तक पहुंच गई। इस वृद्धि में भारत की भूमिका अहम रही है। भारत की जनसंख्या 1960 में 44 करोड़ थी, जो अब तीन गुना से अधिक हो चुकी है। संयुक्त राष्ट्र का अनुमान है कि 2030 तक वैश्विक आबादी 8.6 अरब, 2050 तक 9.8 अरब और 2100 तक 11.2 अरब हो जाएगी, जिसमें भारत और अन्य एशियाई देशों का योगदान सबसे ज्यादा रहेगा। लेकिन भारत के सामने चुनौती यह है कि बढ़ती आबादी के साथ शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और पर्यावरण संरक्षण जैसे क्षेत्रों में संतुलन बनाए रखना होगा। जहां भारत में जन्मदर अभी भी अपेक्षाकृत अधिक है, वहीं जापान जैसे देशों में कम जन्मदर और बुजुर्ग आबादी के कारण जनसंख्या संकट गहरा रहा है।
भारत के लिए सबक: युवा आबादी को कौशल विकास और रोजगार के अवसरों से जोड़ना होगा
भारत की बढ़ती आबादी जहां एक ओर ‘जनसांख्यिकीय लाभांश’ (demographic dividend) का अवसर प्रदान करती है, वहीं दूसरी ओर यह संसाधनों पर दबाव बढ़ा रही है। जापान और यूरोपीय देशों में घटती आबादी के कारण श्रम शक्ति की कमी और सामाजिक सुरक्षा योजनाओं पर दबाव बढ़ रहा है। भारत को इस स्थिति से सीख लेते हुए अपनी युवा आबादी को कौशल विकास और रोजगार के अवसरों से जोड़ना होगा। साथ ही, जनसंख्या नियंत्रण के लिए प्रभावी नीतियां लागू करना जरूरी है, ताकि संसाधनों का समान वितरण और पर्यावरणीय स्थिरता सुनिश्चित हो सके।
घटती आबादी वाले देश: वैश्विक परिदृश्य
जबकि भारत और अन्य एशियाई देशों में आबादी बढ़ रही है, यूक्रेन, जापान, ग्रीस, सैन मारिनो, कोसोवो, बेलारूस, बोस्निया, अलबानिया, रूस और दक्षिण कोरिया जैसे देशों में जनसंख्या में कमी दर्ज की जा रही है। यूक्रेन में 2022-23 के बीच 8.1% की भारी गिरावट देखी गई, जिसका कारण युद्ध, मौतें और बड़े पैमाने पर पलायन है। जापान में कम जन्मदर के कारण आबादी में 0.5% की कमी आई है। ग्रीस की आबादी 1.6% घटी है और 2100 तक इसके 9 मिलियन रह जाने का अनुमान है। यूरोप एकमात्र महाद्वीप है जहां आबादी में समग्र कमी देखी जा रही है, जबकि एशिया में भारत, चीन, पाकिस्तान और इंडोनेशिया जैसे देशों के कारण जनसंख्या में तेज वृद्धि हो रही है।
भारत और घटती आबादी वाले देशों का तुलनात्मक विश्लेषण
भारत में जहां उच्च जन्मदर और बेहतर स्वास्थ्य सेवाओं के कारण आबादी बढ़ रही है, वहीं जापान जैसे देशों में कम जन्मदर और बढ़ती उम्र की आबादी एक बड़ा संकट बन रही है। भारत को इस स्थिति का लाभ उठाते हुए अपनी युवा आबादी को वैश्विक कार्यबल के रूप में स्थापित करने का अवसर है। साथ ही, भारत को उन नीतियों से प्रेरणा लेनी चाहिए जो जापान और यूरोप में जन्मदर बढ़ाने के लिए अपनाई जा रही हैं, ताकि भविष्य में जनसांख्यिकीय असंतुलन से बचा जा सके।
अचंभित करने वाला तथ्य: पलायन और जलवायु परिवर्तन के कारण तुवालु का अस्तित्व खतरे में
प्रशांत महासागर में ऑस्ट्रेलिया और हवाई के बीच बसा छोटा सा द्वीपीय देश तुवालु दुनिया का चौथा सबसे छोटा देश है, जहां अब केवल 10,000 लोग बचे हैं। 2022-23 में इसकी आबादी में 1.8% की गिरावट दर्ज की गई, और अब यह 9,000 से कुछ अधिक रह गई है। कम जन्मदर, पलायन और जलवायु परिवर्तन के कारण बढ़ते समुद्र स्तर से तुवालु का अस्तित्व खतरे में है। यदि यही स्थिति रही, तो यह देश लुप्त होने की कगार पर पहुंच सकता है। तुवालु की इस स्थिति से भारत को भी सबक लेना चाहिए, जहां तटीय क्षेत्र जलवायु परिवर्तन के खतरे का सामना कर रहे हैं।
भारत की बढ़ती आबादी जहां एक अवसर है, वहीं यह संसाधनों और पर्यावरण पर दबाव भी डाल रही है। दूसरी ओर, तुवालु जैसे देशों में घटती आबादी और जलवायु परिवर्तन के कारण अस्तित्व का संकट गहरा रहा है। भारत को अपनी जनसांख्यिकीय ताकत का उपयोग करते हुए शिक्षा, रोजगार और पर्यावरण संरक्षण पर ध्यान देना होगा। साथ ही, वैश्विक स्तर पर जनसंख्या संकट से निपटने के लिए सहयोग और नीतिगत नवाचार जरूरी हैं। यह समय है कि भारत अपनी जनसंख्या को एक संपत्ति के रूप में स्थापित करे और वैश्विक चुनौतियों का सामना करने के लिए तैयार रहे।







