मेरा अमृता प्रीतम साहित्य से प्रेम

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वीरेन्द्र जैन

यह कालेज के अंतिम वर्ष थे जब मैं अमृता प्रीतम के कथा साहित्य नीरज के गीत और आचार्य रजनीश के भाषणों पर आधारित साहित्य को भीतर तक उतार कर पढता था। एक रूमान बुरी तरह हावी था जो मुझे अपने हम उम्रों से अलग करता था और गम्भीर लोगों से, जो अक्सर ही मुझ से उम्र में बड़े होते थे, से जोड़ता था। बाकी संस्मरण तो बहुत सारे हैं किंतु जब अमृता प्रीतम का निधन हुआ तब मैंने लोकमत समाचार और नई दुनिया में जो लेख लिखे उसमें से एक नेट की दुनिया में अमृता प्रीतम के दीवानों के लिये पुनर्प्रस्तुत कर रहा हूं। आप जिस भी अमृता प्रीतम को पसन्द करने वाले को जानते हों उस तक अवश्य पहुँचाने के लिये कुछ श्रम करें तो मुझे खुशी होगी।


स्मृति शेष: अमृता प्रीतम
अनाम रिश्तों की चितेरी

जैसे कोई कटी पतंग बिजली के तारों में अटक जाती है ठीक वैसे ही अमृता प्रीतम पिछले कई महीनों से बिस्तर पर अटकी पड़ी हुयी थीं। मरीजों से सवाल दर सवाल करने वाले डाक्टरों ने जबाब दे दिया था। वे अचल और लगभग अचेत हो गयी थीं। जीवन के लक्षण कम से कम हो गये थे, केवल उनका दिल था जो धड़क रहा था और सांसे थीं जो आ जा रही थीं। ऐसा शायद इसलिये क्योंकि अमृता प्रीतम ने पूरा जीवन इन्हीं दो क्रियाओं के सहारे जिया था।
वे कवियत्री और कथा लेखिका के रूप में जानी जाती थीं पर उनके पाठकों के लिए इन विधाओं में भेद करना सम्भव नहीं था क्योंकि उनकी कथायें भी कवितायें ही होती थीं। उनकी रचनायें दिल से दिल के बारे में दिल के लिए लिखी जाती थीं। वे जीवन को गणित के सरल सवालों की तरह नहीं मानती थीं और ना ही वैसे सवाल उनकी रचनाओं के विषय होते थे। जीवन उनके लिये एक संश्लिष्ट प्रक्रिया थी तथा उसके सवाल हल होने की जगह नये सवाल पैदा करते हैं। भावनाओं को शब्द देने में उन्हें महारत हासिल थी पर शब्द दे देने से भावनाओं का रूप परिवर्तित नहीं होता था अपितु वे शब्दाकार में आकर भी वैसी ही बनी रहती थीं। उनके उपन्यास -एस्कीमो स्माइल- का यह प्रारम्भिक वाक्य देखिये-
एकता को अपना आप एक औरत की तरह नहीं एक सड़क की तरह लगा, सड़क, जो जो हमेशा एक ही जगह पर रहती है, पर फिर भी कहीं से आती है और कहीं जाती है। एकता के मन की हालत भी एक ही जगह पर थी, पर यह हालत इंसान की उस तवारीख की तरफ से आ रही लगती थी जो आज तक लिखी गयी है और उस तवारीख की तरफ जा रही लगती थी जो आज तक नहीं लिखी गयी।
अमृता प्रीतम ने आम प्रचलित रिश्तों से जन्मी कहानियाँ नहीं लिखीं अपितु इंसानी रिश्तों के नए-नए आयाम तलाशे और उन अनाम रिश्तों की भावनाओं को पूरी गहराई से चित्रित किया। एक जगह वे लिखती हैं कि जिस राजेन्द्र सिंह बेदी की कहानियाँ पंजाब से चल कर लन्दन, पेरिस तक पहुँच जाती हैं पर उसके मन की बात वहीं की वहीं खड़ी रहती है तथा सड़क पार करके सामने रहने वाली तक नहीं पहुँच पाती।
एक जगह वे लिखती हैं- लोग समय की दीवार पर अपना नाम नहीं लिख पाते, लोग दिलों की दीवार पर अपना नाम नहीं लिख पाते इसलिये ऎतिहासिक इमारतों की दीवारों पर अपना नाम लिख देते हैं।
अमृता प्रीतम के उपन्यास की एक नायिका जब अपना रिश्ता तोड़ कर उस स्टेशन पर उतरती है जहाँ से उसे हमेशा गाड़ी बदलना होती है तो वह निकट के होटल में बैठ कर काफी पिया करती है। वर्षों से उसे एक खास बैरा उसे काफी सर्व करता है पर उस बार जब एक नया बैरा काफी ले जाने लगता है तो पुराना बैरा उससे काफी की ट्रे छीन कर अपने वर्षों पुराने काफी पिलाने के रिश्ते की दुहाई देकर कहता है कि मैं इन्हें तब से काफी पिला रहा हूँ जब ये छोटी सी बच्ची थी। नायिका इस रिश्ते और तोड़ कर आये रिश्ते की तुलना करते हुये सोचती है कि कौन सा रिश्ता सच्चा था। उन्होंने अपने जीवन से भी रिश्तों की व्यापकता को दर्शाया है। वे साहिर लुधियानवी से प्रेम करती थीं और जीवन की वह रात उनके जीवन की सबसे बहुमूल्य रात्रि रही जब जुकाम से पीड़ित साहिर के सीने पर गर्म तेल की मालिश की। साहिर का छूट गया गन्दा रूमाल उनकी सबसे बड़ी धरोहर रही। अपने अंतिम वर्ष उन्होंने चित्रकार इमरोज़ के साथ बिताये तथा अपने रिश्ते को कभी परिभाषा में बांधने की कोई कोशिश नहीं की। यह रिश्ता दुनिया के सारे रिश्तों से ऊपर रहा।
डाक्टर देव, नीना, नागमणि, अशु, एक सवाल, बन्द दरवाज़ा, हीरे की कनी, रंग का पन्ना, धरती सागर और सीपियाँ, एक थी अनिता, सब में उनकी नायिकाएँ अपने रिश्तों की गहराइयों को सामने लाकर समाज से सवाल करती हैं कि जो रिश्ते तुमने बना दिये हैं वे कितने थोथे और अधूरे हैं। मनुष्य मनुष्य के बीच रिश्तों के अनगिनित आयाम हैं।
उनके लिये तो गुलज़ार की वे पंक्तियाँ ही सटीक बैठती हैं कि प्यार को प्यार ही रहने दो कोई नाम न दो।