“15 अगस्त के आस-पास के अगस्त की अहमियत यह नहीं है कि इस दिन के आस-पास देश आजाद जैसी कोई चीज हुआ बल्कि यह कि मैं पैदा हुआ.
और बातों के अलावा मेरे पास हिंदी साहित्य की नाक में दम करने का कार्यभार भी था.
तमाम लामबंदियों के खिलाफ मेरे पास एक गुलेल थी और नदियों की तरह शहरों और शिल्पों और वस्तुओं को छोड़ देने का वानप्रस्थ.
मेरे पास शाप थे और तिब्बत से सिद्धों की पांडुलिपियां खच्चरों पर लेकर लौटते राहुल की तरह कई खच्चर कविताएं और करीब उतने ही प्रेम-पत्र.
मेरे पास बहुत आदिम क्रोध था और सत्तावानों को घूर कर देखने का हुनर.
मेरे पास यातनाएं थीं और खुशी में मनहूस हो जाने का प्रतिकार.
सलाहों और सत्ताओं का मुझ पर कम असर था — मैं पेंचीदा था — अपनी ही चाबी से खुलने वाला ताला.
मणिकर्णिका की तरह मैं लगातार सुलगता रहता था.”
(यह ‘अगस्त’ है. यह आज से कई साल पहले साल के बारह महीनों पर लिखी गई देवी प्रसाद मिश्र की एक कविता में आया और आज उनके जन्मदिन पर याद आया. )
अविनाश मिश्र की वॉल से







