कथक केन्द्र में हुआ प्रदर्शनात्मक व्याख्यान

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त्रिनिदाद सहित कई देशों ने सहेजी है रामलीला


भारत में यहां की विविधता भरी संस्कृति और परम्पराओं के दर्शन हर अंचल में होते हैं। यही संस्कृति लगभग डेढ़ सौ साल पहले त्रिनिदाद पहुंची और आज तक सहेजी जा रही है। रामायण, महाभारत ग्रंथों के साथ ही रामचरित मानस के संग रामलीला का महत्व बरकरार है।

ये बातें आज यहां उत्तर प्रदेश संगीत नाटक अकादमी गोमतीनगर के कथक केन्द्र के विद्यार्थियों के समक्ष त्रिनिदाद से आई पंडिता इन्द्रानी रामप्रसाद ने प्रदर्शनात्मक व्याख्यान देते हुए बतायीं। उनके साथ ही अयोध्या शोध संस्थान के निदेशक डाॅ.वाई.पी.सिंह ने भी भारतीय व अन्य देशों की रामलीला परम्परा के प्रसंग व चित्र आदि दर्शाते हुए वक्तव्य रखा।

उत्तर भारत और माॅरीशस की रामलीला पर शोध करने वाली सुश्री इन्द्रानी ने बताया कि यहां की तरह त्रिनिदाद में भी लोग रामचरित मानस और रामलीला बहुत जुड़े हुए हैं। वहां 1880 में मैदानी रामलीला शुरू हुई और आज भी देवताओं का आह्वान कर व्रत-उपवास कर भक्तिभाव के संग अनुष्ठान की तरह होती है। वहां पहले मंदिर नहीं था। लीला स्थल एक तीर्थस्थल जैसा बन जाता है। मैदान के चारों तरफ बांस का घेरा बनाकर बीच में लीला का प्रदर्शन किया जाता है। चारों ओर दर्शक बैठते हैं। मैंने पाया कि उत्तर भारत की मैदानी रामलीला का परम्परागत स्वरूप मिटता जा रहा है।

उस पर प्रोसिनियम थियेटर और पारसी रंगमंच का प्रभाव आ गया है। रामनगर की रामलीला जरूर विशिष्ट और एकदम अलग है। थाईलैण्ड और इण्डोनेशिया की रामलीला भी रंगमंचीय ज्यादा है। जयपुर के सम्मेलन से लौटी सुश्री इन्द्रानी ने बताया कि लीला में कथक के कुछ पद संचालन भी इस्तेमाल होते हैं, जिसे हम रामलीला नृत्य कहते हैं।

निदेशक डाॅ.वाई.पी.सिंह ने अमेरिका, दक्षिण एशियाई देशों समेत कई देशों की लीला के चित्र दिखाते हुए फिलीपींस, सूरिनाम, लाओस, श्रीलंका आदि देशों की रामलीला के बारे में सहज रूप में बताया। इस अवसर पर अकादमी की अध्यक्ष पूर्णिमा पाण्डे व सचिव तरुण राज भी उपस्थित रहे।

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