अविजित साहनी चिड़चिड़े हो चले हैं: अविनाश मिश्र के ‘अज्ञातवास की कविताएं’

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अविनाश मिश्र मशहूर युवा कवि हैं. वह आलोचना और पत्रकारिता के इलाके में भी सक्रिय हैं. साहित्य अकादेमी से अविनाश की कविताओं की पहली किताब शाया होकर आई है, नाम है   अज्ञातवास की कविताएं.

बकौल अविनाश : ‘इस किताब में शामिल कविताओं का होना उस दरमियान हुआजब साहित्यिक दोस्तियों, पड़ोस और वातावरण से मैं बहुत दूर था. यह 2004 से 2012 के बीच का वक्त है. इस होने का आशय इस कविता-संग्रह के शीर्षक से भी बहुत खुलता हैअज्ञातवास की कविताएं.

 18 की उम्र से लेकर 26 की उम्र तक का यह उस युवा का कविता-संसार है जिसकी उम्र आज 31 बरस है और जिसके पास पर्याप्त साहित्यिक मित्रताएं, पड़ोस और वातावरण है. इस बीच हुई कई कविताएं इस संग्रह में आने से रह भी गई हैं. वे खो गईं और खो भी दी गईं, वे कमजोर थीं और कमजोर मान भी ली गईं. वे अब जहां और जैसी भी हैं, डार से बिछुड़ी हुई और बेघर हैं. कोई बुकमार्क उनके बीच कभी नहीं फंसेगा.’’

समादृत कवि असद ज़ैदी ने इस किताब की भूमिका लिखी है. अविनाश का कहना है कि यह भूमिका उनके लिए सबक की तरह है और रहेगी. विचलनों से बचने के लिए इसे वक्त-वक्त पर पढ़ते रहना होगा.

यह किताब किसी को समर्पित नहीं है, अविनाश के ही शब्दों में कहें तो इसलिए ही यह सबको समर्पित है. 

अविनाश को शुभकामनाएं देते हुए हम आपको पढ़वा रहे हैं, इस कविता-संग्रह से एक कविता :  

 

अविजित साहनी चिड़चिड़े हो चले हैं

मेरे स्वर्गीय पिता के अंतिम मित्र श्री अविजित साहनी
कुछ फिल्में डाइरेक्ट करना चाहते हैं
लेकिन मुझे अब लगने लगा है कि उनकी फिल्में कभी नहीं बनेंगी
इसलिए इस विषय से संबंधित उनका सारा कुछ
मैं अब सार्वजानिक कर देना चाहता हूं
वह एक व्यापक स्क्रीनिंग चाहते थे
‘पहल’ का कविता विशेषांक लेकर जब मैं एक रोज उनके घर गया था
तब मुझे देखकर उन्होंने वायलिन एक तरफ रखते हुए कहा था :
‘‘मैं ज्ञानरंजन की कहानी ‘बहिर्गमन’ पर एक फिल्म बनाना चाहता हूं’’
बाद इसके इस विशेषांक से मैंने उन्हें
वेणु गोपाल की ये कविता-पंक्तियां पढ़कर सुनाई थीं :
‘थकान अगर उपजाऊ हो
तब एक तीर का निशान बनाती है—
जिंदगी इधर है…’
वह सांप्रदायिकता पर भी ‘अपराध काल’ नाम से एक फिल्म बनाना चाहते थे
इसकी कहानी हर वह व्यक्ति जान चुका है
जो उनसे एक बार भी मिला हो
‘निर्दोष’ यह एक और फिल्म थी जिसके बारे सुना जाता है
कि उन्होंने अक्षय कुमार को तब साइन किया था
जब वह ‘खिलाड़ी’ नहीं बना था
इस फिल्म की कहानी एक ऐसे जीवित व्यक्ति के इर्द-गिर्द घूमती है
जिसे मृत मान लिया गया है
इस फिल्म में बाल कलाकार की भी एक खास भूमिका थी
इसके लिए उन्होंने जिन बालकों से वायदा किया
वे अपना रोल सुनते-सुनते बेहद बड़े हो गए
उनके पास जाने पर जब-तब इस फिल्म की स्क्रिप्ट मुझे पढ़नी पड़ती थी
क्योंकि इस फिल्म में एक किरदार मेरा भी था
एक और फिल्म थी… एक और फिल्म थी… और एक फिल्म थी…
नामालूम कितनी पटकथाएं थीं मेरे मददगार उस शख्स के पास
जो वह मुझे सुनाया करता था
तब जब मैं प्रेमचंद की कहानियों-सा यथार्थ जी रहा था
…और फिर कुछ वक्त बाद ऐसा हुआ
कि वे सारी कहानियां उन्हें धोखा दे गईं
जिन्हें वे बचाना चाहते थे
वे भीड़ में दिखाई दीं उनके रूप बदल चुके थे
एक दृश्य में एक तेरह साल के समझदार लड़के ने
खुद को तीस साल के एक बेहूदा दुनियादार आदमी में घटा दिया था…
बदलाव चाहे कितना भी निर्मम क्यों न हो
बदल नहीं पाता कुछ सपने
क्योंकि हम एक जिद में होते हैं
कि इस बेतरह बदलते हुए सब कुछ के बीच
कम से कम इन्हें तो बचा ले जाएं अपरिवर्तित
अपनी आकांक्षाओं के अधर में
लेकिन इस परिवर्तन के बाद अविजित साहनी ने जाना कि जिन कहानियों को उन्होंने रवां किया था अपनी सोच में वे अब रवाना हो गई हैं कहीं और कुछ और होने के लिए। वे अब उन्हें भूल चुकी हैं और इधर वह उन कुछ लोगों के मनोरंजन के केंद्र में हैं जिन्होंने उन्हें नया-नया जाना है। इन नए परिचितों को वह उस रूप में स्वीकार्य नहीं हैं जो उन्होंने उन कहानियों के लिए बना रखा है जिनके विषय में वह सोचते हैं कि वे कभी उसी रूप में लौटेंगी जिस रूप में वे थीं।
वह इन दिनों एक ऐसे जीवित व्यक्ति की तरह हो गए हैं
जिसे मृत मान लिया गया है
कहानियों के कुछ टुकड़े वह अब भी संभाले हुए हैं
मैं उनसे मिलने जाना चाहता हूं
यह जानते हुए भी कि वह अब उस तरह नहीं मिलेंगे
क्योंकि कहानियां कुछ इस कदर बदली हैं इस दरमियान
कि उन्हें सुनाने वाले चिड़चिड़े हो चले हैं
और बनाने वाले अपवाद
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