कल नामवर सिंह की सालगिरह के मौके पर उन पर हुए आक्रमण का बचाव करने कई ‘सिंह’ सामने आए. इनमें से कुछ घोषित सिंह थे, कुछ अघोषित, कुछ सर्कस के थे, कुछ चिड़ियाघर के, कुछ लाचार थे, कुछ अधेड़… ये सब के सब नामवर सिंह के भ्रष्टाचार को उनकी कहीं बहुत दूर नजर आती अतीतकीर्ति से ढकना चाहते हैं.
बहरहाल, इस प्रसंग से पहले मैंने एक और सिंह का जिक्र किया था— शिव खेड़ा की शैली में ‘जीत का जादू’ टाइप किताब लिखने वाले बिहार के एक अख्यात अलेखक रत्नेश्वर सिंह का, जिनसे उनके अब तक सारी घोषणाओं के बावजूद नहीं लिखे गए उपन्यास के लिए पौने दो करोड़ रुपए का अनुबंध पटना के एक असाहित्यिक प्रकाशक ने किया है. ढाई लाख रुपए उन्हें अग्रिम रॉयल्टी के रूप में मिल भी चुके हैं. यह गौरतलब है कि यह सौभाग्य सुरेंद्र वर्मा, विनोद कुमार शुक्ल, उदय प्रकाश को तो छोड़िए नामवर सिंह तक को नहीं मिला है.
तब एक अलेखक के भाग्य से यह छींका कैसे टूटा, समझ नहीं आ रहा. समझने के लिए इस ‘उत्सव’ में शामिल संजय कुंदन से लेकर अनंत विजय तक कई बिहारी-भूमिहारों, संपादकों-मक्कारों और लेखकों-पत्रकारों को मैंने मेंशन किया, लेकिन मेरी बात को उन्होंने छोटे मुंह बड़ी बात समझा और इस पर सफाई देने से कन्नी काट गए.
लेकिन छोटा मुंह सदा सवालों से भरा होता है और बड़ी बातें ज्यादातर फरेब, कालाबाजारी और झूठे प्रचार से संचालित होती हैं.
अनंत विजय जैसे दिमाग रत्नेश्वर की तुलना अमीष त्रिपाठी से करते हुए एक जगह कहते हैं :
‘‘अभी कुछ साल पहले ही अंग्रेजी के एक प्रकाशक ने शिवा त्रैयी पर उपन्यास लिखने वाले अंग्रेजी के स्टार लेखक अमीष त्रिपाठी के साथ उनके आगामी उपन्यासों के लिए पांच करोड़ रुपए का करार किया था. उस करार में किताब, ऑडियो बुक और ई बुक्स का वैश्विक अधिकार भी शामिल था. अमीष के प्रकाशक ने उनकी किताबों की बिक्री को आधार बनाकर यह करार करने का दावा किया था. अमीष त्रिपाठी पहले से बेस्टसेलर रहे हैं और अंग्रेजी में किताबों का एक बड़ा बाजार पहले से रहा है. अमीष त्रिपाठी के उस करार को लेकर बाद में कई विवादित बातें सामने आई थीं, लेकिन हिंदी में एक किताब के लिए पौने दो करोड़ रुपए का करार परीकथा की तरह लगता है.’’
साजिशों को परिकथा की तरह देखने वाला यह दिमाग बहुत खतरनाक है और आदरणीय कवि आलोकधन्वा की शैली में कहें तो कभी-कभी इससे सीखना भी पड़ सकता है.
इस मसले पर हिंदी में उठी विवादित बातों पर जातिगत, आर्थिक और शक्ति-समीकरणों की वजह से चुप लगा जाने वाला यह पेशेवर दिमाग तो महज एक नमूना है, दरअसल बिहार में ऐसे नमूनों की कोई कमी नहीं जो छद्म को परिघटना में बदल देते हैं.
मेरा आग्रह है कि मेरी बात छोटे मुंह बड़ी बात ही सही, लेकिन व्यापक अर्थों में पढ़ी जाए.
[ होश में न होने के निष्कर्ष ]







