नैतिकता शेष हो तो कृपया करके अपने-अपने पुरस्कार लौटा दें, हिंदी कविता न सही, स्त्री-सम्मान के पक्ष में ही सही

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एक पटाखा रॉकेट था जो कुछ ऊपर तक गया और उसने कुछ रोशनी फैलाई।

अब अंधकार पूर्ववत है और मैं इस अंधकार से कुछ बोल रहा हूं।

इस अंधकार में जहां प्रत्येक 14वें मिनट पर एक बलात्कार होता है. जहां पानी लेने के लिए 16 किलोमीटर तक स्त्रियों को पैदल चलना पड़ता है और इससे कुछ कम पैदल रोज सुबह-शाम शौच के लिए।

बाकी स्त्रियों के सारे संभव और असंभव अपमान साहित्य और पत्रकारिता के संसार में दर्ज हैं ही और हो रहे हैं।

यहां मैं जो कुछ कह रहा हूं, पूर्णतः अभिधा में और खुद को बेहद निर्विशेष मानकर कह रहा हूं.

मैं यह सब कुछ काव्यात्मक प्रतिस्पर्द्धाओं की बहुत गैरजरूरी और मामूली लड़ाइयों से बाहर आकर कह रहा हूं.

यह सब कुछ सबसे पहले खुद से कहा गया है, बाद में इसे सबसे कहा जा रहा है।

मैं एक बार वहां से पुन: सब कुछ देखना चाहता हूं, जहां से यह सब कुछ शुरू हुआ था. जहां सहिष्णुता लुप्त हो चुकी है, इसलिए क्षमा के कोई मायने नहीं है. जहां अनुताप में देर तक जलने और क्षमा में गले तक डूबने के बाद भी आपका अपमान जारी रहता है. जहां सबसे प्रियजन एक झटके में दिल से उतारकर अदालतें लगाते और सजाएं देते हैं. जहां हत्या जो आत्महत्या जैसी लग सकती है, वे रातों-रात उसके लिए पूरा माहौल तैयार कर देते हैं।

वे जो लेखकों-कवियों को पादरी बना देना चाहते हैं, ध्यान से सुनें कि आपकी चुनी हुई और खोखली नैतिकता का बिल्कुल भी डर नहीं है मुझमें. मैं अपनी जगह से रत्ती भर भी नहीं हिलूंगा और आपमें और आपकी सूचियों में इतनी ताकत भी नहीं कि मुझे हिला सकें।

मूल मुद्दा था एक औसतपन द्वारा दूसरे औसतपन को बढ़ावा देने का— जनसंपर्कवाद की बुनियाद पर. आखिरकार अनामिका कैसे नजरिए, सौंदर्यबोध और तटस्थता के साथ हिंदी में वर्ष की सर्वश्रेष्ठ युवा कविता का चुनाव करती हैं कि उनकी चूक और चतुराई जाहिर हो जाती है. दरअसल, वह एकदम निर्णय देने के मौके पर अपने जैसे ही औसत रचनाकारों से संपर्क करती हैं और उनके सुझाए किसी औसत नाम पर मुहर लगा देती हैं।

यह औसतपन संघर्षविहीनता और दुरभिसंधियों से उपजता है. यह प्रतिकार की प्रामाणिक युक्तियों को संदेहास्पद मानता है।

निर्णायक का यह निर्णय अगर निरपेक्ष निर्णय है और राग-द्वेष से ऊपर है, तब हिंदी कविता के उस सामूहिक विवेक का क्या करें जिसमें एक शिशु-आस्वादक भी यह जानता है कि साल 2016 की सर्वश्रेष्ठ कविता सुधांशु फ़िरदौस ने लिखी है— ‘कालिदास का अपूर्ण कथागीत’. यह कविता गए साल के नवंबर में पहले ‘तद्भव’ के 34वें अंक में और बाद में ‘समालोचन’ पर प्रकाशित और वायरल हुई. इस बरस अप्रैल में आयोजित ‘वाक् : भारतीय कविता की रज़ा द्वैवार्षिकी’ में हिंदी की युवा कविता से शामिल एकमात्र नाम सुधांशु फ़िरदौस का था. वहां उन्होंने इस कविता का पाठ भी किया. इसका वीडियो बहुत आसानी से इंटरनेट पर मिल जाएगा।

अच्युतानंद मिश्र की पुरस्कृत कविता ‘बच्चे धर्मयुद्ध लड़ रहे हैं’ और सुधांशु फ़िरदौस की कविता ‘कालिदास का अपूर्ण कथागीत’ को आमने-सामने रखकर किसी विवेकनिष्ठ आलोचक-रचनाकार से इस पर फैसला करवा लीजिए कि कौन-सी कविता योग्य है।

सुधांशु फ़िरदौस की कविता अनामिका ने न सिर्फ सुनी है, पढ़ी है, बल्कि खुद पुरस्कार देने से कुछ दिन पूर्व बहुत आग्रह करके उनसे अपने ई-मेल पर भी मंगवाई है।

यह भी ध्यान देने योग्य है कि सुधांशु फ़िरदौस की आयु अभी 32 वर्ष ही है, जबकि अच्युतानंद मिश्र जिन्हें बहुत मासूम और निर्दोष और नवांकुर बनाकर पेश किया जा रहा है, वह 36 साल 6 महीने के हो चुके हैं. इस फरेब की जानकारी ‘हिंदी समय’ पर मौजूद है, जिसे बकौल अच्युतानंद मिश्र उन्हें बदलवाने का वक्त नहीं मिला.

विवादित पुरस्कार जिसका नाम तक लेने में अब मुझे शर्म आती है और जिसे अच्युतानंद मिश्र ने ग्रहण कर लिया है, 35 वर्ष तक के आयु के कवि के लिए ही है. लेकिन यह संयोग नहीं तो और क्या है कि खुद अनामिका को यह पुरस्कार 36 की उम्र में ही मिला था और यह भी संयोग नहीं तो और क्या है कि अनामिका ने इससे पहले साल 2011 में मोनिका कुमार जो कि एक बेहतर स्त्री-कवि हैं, की कविता को महज इसलिए नहीं चुना था क्योंकि मोनिका कुमार 36 वर्ष की हो चुकी थीं।

35 वर्ष से कुछ ऊपर होने की वजह से ही यह पुरस्कार अशोक वाजपेयी ने साल 2015 में प्रकाश को नहीं दिया. प्रकाश की आत्महत्या भी अब महज एक तथ्य है।

कहने का आशय यह है कि यह औसतपन को बढ़ावा देने का मुद्दा है, जिसे नकली नैतिकता की आड़ में गए एक सप्ताह तक गुम रखा गया।

अब अगर पुरस्कृत कवि और निर्णायक कवयित्री में जरा-सा भी विवेक और नैतिकता शेष हो तो कृपया करके अपने-अपने पुरस्कार लौटा दें— हिंदी कविता न सही, स्त्री-सम्मान के पक्ष में ही सही।

इससे शायद हिंदी कविता के प्रति जारी अंधी कार्रवाइयों में थोड़ी कमी आ जाए और फालतू की पर्चेबाजी छोड़कर हमारे काबिल वरिष्ठ साहित्यिक, स्त्रीवादी और लेखक संगठन जरूरी मुद्दों की तरफ ध्यान दे पाएं…

और शायद इससे ही तमाम युवा रचनाकार इस त्रासकारी समय में अपनी असल भूमिका पहचान कर उस ओर सक्रिय हो पाएं, जिस ओर उन्हें हर हाल में होना ही चाहिए।

(अविनाश मिश्र, साभार)

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